संदर्भ
हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान की है। हरीश राणा वर्ष 2013 में हुई एक दुर्घटना के बाद से पिछले 13 वर्षों से पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में थे। यह निर्णय महत्वपूर्ण इसलिए माना जा रहा है क्योंकि इसे भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित कानूनी ढांचे के पहले वास्तविक अनुप्रयोग के रूप में देखा जा रहा है, जो पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णयों के आधार पर विकसित हुआ था।
संपूर्ण मामले की पृष्ठभूमि
- वर्ष 2013 में बालकनी से गिरने के कारण हरीश राणा को गंभीर मस्तिष्क चोट लगी थी। इस दुर्घटना के बाद वे लंबे समय तक पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में रहे तथा उन्हें पूर्ण क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों का पक्षाघात) हो गया।
- 2024 में उनके पिता ने जीवनरक्षक उपचार हटाने की अनुमति के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, किंतु अदालत ने इस याचिका को अस्वीकार कर दिया।
- इसके पश्चात परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले की चिकित्सा स्थिति का आकलन करने के लिए दो मेडिकल बोर्ड गठित किए। दोनों बोर्डों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि मरीज के स्वस्थ होने की संभावना लगभग नहीं के बराबर है।
- इन निष्कर्षों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जीवनरक्षक चिकित्सा सुविधाओं को हटाने की अनुमति प्रदान की। यह निर्णय भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की न्यायिक व्यवस्था के व्यावहारिक क्रियान्वयन का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
इच्छामृत्यु : अर्थ और प्रकार
इच्छामृत्यु के प्रकार
सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)
- सक्रिय इच्छामृत्यु में मरीज की मृत्यु सीधे चिकित्सकीय हस्तक्षेप के माध्यम से कराई जाती है, जैसे कि घातक इंजेक्शन देना या किसी दवा की जानबूझकर घातक मात्रा देना।
- भारत में इस प्रकार की इच्छामृत्यु कानूनी रूप से प्रतिबंधित है और इसे आपराधिक कानून के अंतर्गत हत्या या आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में रखा जा सकता है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु के अंतर्गत मरीज को दिए जा रहे जीवनरक्षक उपचार जैसे वेंटिलेटर, कृत्रिम पोषण या अन्य चिकित्सा सहायता को बंद या वापस ले लिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप मृत्यु सीधे किसी चिकित्सकीय कार्रवाई से नहीं बल्कि बीमारी की प्राकृतिक प्रगति के कारण होती है।
- भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के अंतर्गत वैध माना गया है।
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लागू करने की प्रक्रिया को भारत में सावधानीपूर्वक विनियमित किया गया है ताकि इसका दुरुपयोग न हो और रोगी की गरिमा सुरक्षित रह सके। यह प्रक्रिया मुख्यतः Common Cause (2018) के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और उसके बाद किए गए संशोधनों पर आधारित है।
प्रक्रिया के प्रमुख चरण
- रोगी की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए दो मेडिकल बोर्ड गठित किए जाते हैं।
- पहला बोर्ड संबंधित अस्पताल के चिकित्सकों से मिलकर बनता है।
- दूसरा बोर्ड बाहरी विशेषज्ञ चिकित्सकों का होता है।
- दोनों बोर्ड रोगी की जांच कर यह सुनिश्चित करते हैं कि स्वस्थ होने की संभावना अत्यंत कम या समाप्त हो चुकी है।
- यदि रोगी स्वयं निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है, तो परिवार या कानूनी अभिभावक की सहमति आवश्यक होती है।
- प्रारंभिक दिशानिर्देशों में हाई कोर्ट की अनुमति या न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचना देना अनिवार्य था।
- वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए संशोधन में इस प्रक्रिया को सरल बनाया गया और न्यायालय की प्रत्यक्ष भूमिका को सीमित किया गया।
- अनुमति मिलने के बाद रोगी को पैलियेटिव केयर (Palliative Care) सुविधा में स्थानांतरित किया जा सकता है, जहाँ जीवनरक्षक उपचार को मानवीय और गरिमापूर्ण ढंग से समाप्त किया जाता है।
- पूरी प्रक्रिया के दौरान लिए गए निर्णयों तथा मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों का संपूर्ण दस्तावेजीकरण अनिवार्य होता है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का संवैधानिक आधार
- भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की वैधानिकता का आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 है, जो प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।
- सुप्रीम कोर्ट ने अपनी व्याख्या में स्पष्ट किया है कि यह अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा के साथ जीवन जीने और गरिमा के साथ मृत्यु प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है।
इच्छामृत्यु से संबंधित प्रमुख न्यायिक निर्णय
भारत में इच्छामृत्यु से संबंधित विधिक व्यवस्था मुख्यतः सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है।
1. अरुणा शानबाग मामला (2011)
- Aruna Ramchandra Shanbaug v. Union of India (2011) में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अवधारणा को मान्यता दी। अरुणा शानबाग मुंबई की एक नर्स थीं, जो 1973 में एक क्रूर हमले के बाद पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में चली गई थीं।
- हालाँकि अदालत ने उनकी जीवन समाप्त करने की याचिका को स्वीकार नहीं किया, लेकिन यह कहा कि असाधारण परिस्थितियों में जीवनरक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते कि इसके लिए हाई कोर्ट की अनुमति तथा कड़े सुरक्षा उपाय अपनाए जाएँ।
2. कॉमन कॉज मामला (2018)
- Common Cause v. Union of India (2018) में सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने निर्णय दिया कि गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
- इस निर्णय में लिविंग विल (Living Will) या एडवांस डायरेक्टिव की अवधारणा को भी मान्यता दी गई। इसके अनुसार व्यक्ति पहले से लिखित रूप में यह निर्देश दे सकता है कि यदि वह भविष्य में असाध्य रोग या पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में चला जाए तो जीवनरक्षक उपचार हटा दिया जाए।
3. 2023 के संशोधन
- वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Common Cause के दिशानिर्देशों में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए। इन संशोधनों के अंतर्गत—
- मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट से संबंधित औपचारिकताओं को सरल बनाया गया।
- इन परिवर्तनों का उद्देश्य अस्पतालों और परिवारों के लिए अंत-जीवन चिकित्सा निर्णयों को अधिक व्यावहारिक और सुलभ बनाना था।
4. रेबीज़ रोगियों से संबंधित याचिका (2019)
- वर्ष 2019 में All Creatures Great and Small नामक गैर-सरकारी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। इसमें मांग की गई कि रेबीज़ जैसी अत्यंत पीड़ादायक बीमारी के मामलों में रोगियों या उनके अभिभावकों को गरिमा के साथ मृत्यु का विकल्प दिया जाना चाहिए।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर विचार करने की सहमति दी थी और यह मामला अभी भी विचाराधीन है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु के नैतिक आयाम
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़े मुद्दे केवल कानूनी नहीं बल्कि गहरे नैतिक और दार्शनिक प्रश्नों से भी जुड़े हैं।
- एक ओर यह स्वायत्तता (Autonomy) के सिद्धांत को महत्व देता है, जिसके अनुसार व्यक्ति या उसका परिवार जीवन के अंतिम चरण से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार रखता है।
- दूसरी ओर यह जीवन की पवित्रता (Sanctity of Life) की धारणा से भी टकराता है, जो चिकित्सा नैतिकता और सामाजिक मूल्यों का महत्वपूर्ण आधार है।
- नैतिक दृष्टि से ऐसे निर्णयों को निम्न सिद्धांतों के आधार पर लिया जाना चाहिए—
- करुणा (Compassion)
- हितकारिता (Beneficence)
- अहानिकारिता (Non-maleficence)
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशानिर्देश इन नैतिक चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं। इनमें चिकित्सकीय मूल्यांकन, कानूनी सुरक्षा उपाय तथा परिवार की सहमति को शामिल किया गया है।
- इस प्रकार यह व्यवस्था रोगी की मानवीय गरिमा को बनाए रखते हुए अंत-जीवन देखभाल सुनिश्चित करने और साथ ही संभावित दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक संतुलित ढांचा प्रदान करती है।