पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के माध्यम से स्थिरता

संदर्भ 

पंचायती राज संस्थाएं (पीआरआई) स्थानीय योजना और सामुदायिक स्वामित्व के माध्यम से चक्रीय आजीविका को बढ़ावा देती हैं। गांधीवादी ग्राम स्वराज आत्मनिर्भरता को संसाधन पुनर्प्राप्ति से जोड़ता है, जिसे स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और ग्राम संस्थाओं द्वारा समर्थन दिया जाता है। 

स्थानीय शासन ढांचा

  • 73वें संवैधानिक संशोधन ने त्रिस्तरीय पंचायती राज की स्थापना की; ग्यारहवीं अनुसूची में स्वास्थ्य और स्वच्छता सहित 29 विषयों का प्रावधान है।
  • सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में 17 लक्ष्य शामिल हैं, जिन्हें नौ स्थानीयकरण सतत विकास लक्ष्य (एलएसडीजी) विषयों में विभाजित किया गया है।  
  • थीम 2 - स्वच्छ एवं हरा-भरा गाँव और थीम 5 - स्वच्छ जल और स्वच्छता राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कारों का आधार है।  
  • ग्राम पंचायत विकास योजनाएँ (जीपीडीपी) मंत्रालय के जन योजना अभियान के माध्यम से अपशिष्ट, ऊर्जा, जल और कृषि को एकीकृत करती हैं।  
  • कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) बुनियादी ढाँचे, कौशल और आजीविका को सहायता प्रदान करता है; ग्राम सभाएं, महिला मंडल/युवा मंडल सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करते हैं।       

कार्यक्रमों का समन्वय 

  • स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (एसबीएम-जी) अपशिष्ट प्रबंधन का समर्थन करता है; जल जीवन मिशन (जेजेएम) पेयजल आपूर्ति, अपशिष्ट जल प्रबंधन और संरक्षण को एकीकृत करता है।  
  • वीबी जीरामजी गड्ढे खोदने, कटाई और वनरोपण का समर्थन करता है; राष्ट्रीय संसाधन दक्षता नीति (एनआरईपी) सामग्री दक्षता/पुनर्चक्रण को बढ़ावा देती है। 
  • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) लकड़ी पर निर्भरता कम करता है; साथ ही प्रधानमंत्री कुसुम योजना कृषि सौर पंपों का समर्थन करती है।  
  • राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम)) महिलाओं के अपशिष्ट-से-धन उद्यमों का समर्थन करती है; तथा अटल भूजल योजना भूजल संरक्षण और सतत उपयोग को बढ़ावा देती है।   
  • फसल बीमा योजना और परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) सतत कृषि को समर्थन देने वाले कार्यक्रम समन्वय में शामिल हैं।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का वाटरशेड घटक मृदा/जल संरक्षण, भूमि सुधार और भूजल पुनर्भरण का समर्थन करता है, जिससे संसाधन प्रबंधन मजबूत होता है।  

उद्यम मार्ग और स्थानीय मॉडल 

  • खाद बनाना/वर्मीकम्पोस्टिंग के जरिए रसोई, बाजार और खेत के कचरे को उर्वरकों में परिवर्तित करता है; बायोगैस खाना पकाने के लिए ईंधन और मिट्टी को बेहतर बनाने वाले अपशिष्ट पदार्थ की आपूर्ति करती है।  
  • प्लास्टिक रीसाइक्लिंग से सड़क निर्माण और अन्य रीसाइक्लिंग उद्योगों को कच्चा माल मिलता है; चीड़ की पत्तियों (pine-needle) से हस्तशिल्प बनाए जाते हैं, जिन्हें पंचायत की देखरेख में इकट्ठा और प्रोसेस किया जाता है। 
  • फसल अवशेषों से बने ब्रिकेट (briquettes) या बायोचार (biochar) से आय सृजित होती है; उपचारित ग्रे-वॉटर (साफ किया गया घरेलू अपशिष्ट जल) का उपयोग बागवानी और लैंडस्केपिंग में किया जाता है, जिससे संसाधनों की रिकवरी होती है और पानी की कमी भी दूर होती है। 
  • किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) बायोमास, खाद बनाने और जल प्रबंधन संसाधनों का संग्रहण करना, उर्वरकों और पुनर्चक्रित उत्पादों के लिए बाजार संबंध स्थापित करने में सहयोग करते हैं।   
  • लाना भालता ग्राम पंचायत हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में स्थित एक संस्थान, एसबीएम-जी/जेजेएम अभिसरण के माध्यम से प्लास्टिक प्रसंस्करण, सोख गड्ढे (घरेलू गंदे पानी (Greywater) को जमीन में सोखने ) और खाद बनाने की प्रक्रिया को एकीकृत करता है।  
  • हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के पशोग में स्थित 'शी हाट' (She Haat), स्वयं सहायता समूहों (SHGs) द्वारा बनाए गए खाद्य पदार्थों, स्थानीय उत्पादों और कपड़े/जूट के थैलों के लिए प्रशिक्षण और मार्केटिंग की सुविधा देता है।  

निष्कर्ष 

  • सामुदायिक स्वामित्व, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और सामाजिक लेखापरीक्षा इन प्रणालियों को बनाए रख सकती हैं; किसान, युवा और स्कूली इको क्लब पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और व्यवहार परिवर्तन को मजबूत करते हैं।
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