संदर्भ
हाल ही में दिल्ली पुलिस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा प्रस्तावित प्रदर्शनों से पहले अनुमति देने से इनकार कर दिया और नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के बारे में
- यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अंतर्गत एक वैधानिक निवारक एवं आपातकालीन कानूनी प्रावधान है, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की औपनिवेशिक कालीन धारा 144 का स्थान लिया है।
- यह कार्यपालक मजिस्ट्रेट को कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने या संपत्ति के उपयोग को विनियमित करने के लिए बाध्यकारी लिखित आदेश जारी करने का अधिकार प्रदान करता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- बीएनएसएस, 2023 की धारा 163 ने सीआरपीसी (CrPC) की धारा 144 का स्थान लिया है। इसके तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेट सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और गैरकानूनी जमावड़े से उत्पन्न तात्कालिक खतरों को रोकने के लिए निवारक आदेश जारी कर सकते हैं।
- सामान्यतः ऐसे आदेश दो महीने की अवधि समाप्त होने पर प्रभावहीन हो जाते हैं। हालांकि, राज्य सरकार अधिसूचना जारी करके इनकी अवधि को अधिकतम छह महीने तक और बढ़ा सकती है।
- विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगाने के अतिरिक्त, धारा 163 का उपयोग किरायेदारों के सत्यापन, सीसीटीवी कैमरे लगाने की अनिवार्यता और व्यावसायिक सुरक्षा संबंधी उपायों के लिए भी किया जाता है। इसके नियमित प्रशासनिक उपयोग को लेकर चिंताएँ व्यक्त की जाती रही हैं।
न्यायपालिका द्वारा अनुपातिकता का सिद्धांत:
- उच्चतम न्यायालय ने बाबूलाल पराते, रामलीला मैदान और एमकेएसएस (MKSS) से संबंधित मामलों में आवश्यकता, आनुपातिकता तथा मनमाने प्रतिबंधों से सुरक्षा के सिद्धांतों पर जोर दिया है। इन सिद्धांतों का उद्देश्य शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने के अधिकार पर कार्यपालिका द्वारा लगाए जाने वाले अनुचित प्रतिबंधों से संरक्षण प्रदान करना है।
धारा 163 लागू करने के मानदंड:
कार्यपालक मजिस्ट्रेट धारा 163 के तहत कानूनी रूप से तभी आदेश जारी कर सकते हैं, जब निम्नलिखित सभी आवश्यक शर्तें पूरी होती हों:
- पर्याप्त आधार और तात्कालिकता का होना: मजिस्ट्रेट को उपलब्ध सामग्री और तथ्यों के आधार पर यह संतुष्टि होनी चाहिए कि कार्रवाई करने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं तथा तत्काल रोकथाम या शीघ्र उपचार आवश्यक है।
- विशिष्ट और आसन्न खतरे की मौजूदगी: निषेधात्मक आदेश से निम्नलिखित में से कम-से-कम किसी एक वैधानिक जोखिम को रोकने की संभावना स्पष्ट रूप से स्थापित होनी चाहिए:
- कानूनन कार्यरत किसी व्यक्ति के काम में बाधा डालना, उसे परेशान करना या उसे क्षति पहुँचाना।
- मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न होना।
- सार्वजनिक शांति भंग होने, दंगा होने या मारपीट अथवा हिंसक झड़प होने की आशंका।
- खतरे की निकटता और गंभीरता: संवैधानिक न्यायालयों द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, खतरा वास्तविक, तात्कालिक और पर्याप्त रूप से गंभीर होना चाहिए। केवल काल्पनिक या दूरस्थ आशंकाओं अथवा प्रशासनिक सुविधा के आधार पर धारा 163 लागू नहीं की जा सकती।