केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) डेटा लीक मामला

संदर्भ  

  • केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के ई-सिनेप्रमाण पोर्टल से जुड़े कथित डेटा लीक ने फिल्म उद्योग में सुरक्षा और गोपनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। द हिंदू की पड़ताल के अनुसार, 500 से अधिक फिल्मों और अन्य शीर्षकों से जुड़े दस्तावेज इंटरनेट पर सार्वजनिक हो गए थे। इनमें दर्जनों फीचर फिल्मों की जानकारी भी शामिल थी। लीक हुए दस्तावेजों में शूटिंग की पटकथाएं, सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए कट्स का विवरण और फिल्म वितरण से संबंधित व्यावसायिक समझौते शामिल थे। 
  • रिपोर्ट के मुताबिक, ये रिकॉर्ड दिसंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच के हैं। दस्तावेज गैर-लाभकारी संस्था इंटरनेट आर्काइव की वेबसाइट पर अपलोड किए गए थे, जहां कई दिनों तक कोई भी व्यक्ति उन्हें देख और डाउनलोड कर सकता था। हालांकि, सीबीएफसी ने कहा है कि शुरुआती जांच में कथित रूप से उजागर किए गए प्रमाणन संबंधी दस्तावेजों का पता नहीं चला है। 

ई-सिनेप्रमाण पोर्टल से कैसे उजागर हुआ डेटा? 

  • ई-सिनेप्रमाण पोर्टल का इस्तेमाल फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों को प्रमाणन के लिए प्रस्तुत करने और आवेदन जमा करने में करते हैं। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, इसी पोर्टल से संबंधित 500 से अधिक शीर्षकों के दस्तावेज इंटरनेट आर्काइव पर उपलब्ध हो गए थे। 
  • लीक हुए दस्तावेजों में फिल्म की कॉपी को छोड़कर उससे संबंधित लगभग सभी महत्वपूर्ण जानकारियां मौजूद थीं। अधिकांश दस्तावेज अक्टूबर की शुरुआत में अपलोड किए गए थे और 12 अक्टूबर को हटा दिए गए। इन्हें अपलोड करने वाले उपयोगकर्ता ने अपना खाता भी मिटा दिया। हालांकि, अब तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि दस्तावेज किस तरह सार्वजनिक हुए और क्या इसके पीछे किसी बाहरी साइबर हमले की भूमिका थी। 

शूटिंग स्क्रिप्ट और संवादों की जानकारी भी उजागर 

  • लीक हुए दस्तावेजों में फिल्मों की शूटिंग स्क्रिप्ट शामिल थीं। इनमें हर शॉट का विस्तृत अनुवाद, संवादों से संबंधित टिप्पणियां और अन्य स्पष्टीकरण दर्ज थे। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ पटकथाएं विशेष रूप से सेंसर बोर्ड की समीक्षा के लिए तैयार की गई थीं।
  • एक पटकथा में फिल्म के दौरान इस्तेमाल किए गए अपशब्दों को भी चिह्नित किया गया था। इससे पता चलता है कि लीक में केवल आवेदन संबंधी सामान्य जानकारी ही नहीं, बल्कि फिल्मों की समीक्षा के लिए तैयार की गई विस्तृत सामग्री भी शामिल थी।
  • इस तरह की जानकारी फिल्म निर्माताओं के लिए संवेदनशील हो सकती है, क्योंकि इसमें फिल्मों के संवाद, दृश्य और रचनात्मक पहलुओं से जुड़े विवरण मौजूद रहते हैं। 

सेंसर बोर्ड के कट्स का विवरण भी लीक

  • लीक हुए डेटा में उन कट्स का सारांश भी शामिल था, जिन्हें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने फिल्मों के प्रमाणन के दौरान सुझाया था। रिपोर्ट के अनुसार, सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 5ए(2) के तहत प्रमाणन से संबंधित कुछ जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। हालांकि, संबंधित जानकारी बोर्ड की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं थी और वहां रखरखाव से जुड़ा संदेश दिखाई दे रहा था। 
  • इस मामले ने सार्वजनिक जानकारी की उपलब्धता और संवेदनशील दस्तावेजों की सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

फिल्म वितरण समझौतों में लाइसेंस फीस उजागर 

  • इस डेटा लीक का सबसे संवेदनशील पहलू फिल्म वितरण समझौतों का सार्वजनिक होना है। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें भारत में फिल्में वितरित करने वाले अंतर्राष्ट्रीय निर्माताओं के अनुबंध और भारतीय फिल्म निर्माताओं द्वारा फिल्मों के डब संस्करणों को अधिकृत करने से संबंधित समझौते शामिल थे।
  • कम से कम तीन समझौतों में भारत में फिल्म वितरण के लिए चुकाई गई लाइसेंस फीस की जानकारी बिना छिपाए या अपर्याप्त रूप से छिपाकर रखी गई थी। व्यावसायिक संवेदनशीलता को देखते हुए द हिंदू ने इन समझौतों का विशिष्ट विवरण प्रकाशित नहीं किया। 
  • वेरम लीगल की प्रबंध साझेदार वसुंधरा एस. ने बताया कि फिल्म उद्योग के समझौतों में रचनात्मक नियंत्रण, कलाकारों का चयन, पारिश्रमिक, मुनाफे में हिस्सेदारी, बौद्धिक संपदा अधिकार और प्रचार संबंधी दायित्वों जैसी शर्तें शामिल हो सकती हैं। ऐसी जानकारी सार्वजनिक होने से संबंधित पक्षों की सौदेबाजी की स्थिति कमजोर हो सकती है और भविष्य के अनुबंधों पर बातचीत प्रभावित हो सकती है।
  • दिल्ली के वाणिज्यिक मामलों के वकील अभिनव हंसरामन के अनुसार, किसी प्रतिस्पर्धी पक्ष को यह जानकारी मिलना कि कोई कंपनी किन शर्तों पर समझौता करने को तैयार है, भविष्य की व्यावसायिक बातचीत में उसे फायदा पहुंचा सकता है। 

इंटरनेट आर्काइव से हटाए गए दस्तावेज 

  • रिपोर्ट के मुताबिक, दस्तावेज अपलोड करने वाले उपयोगकर्ता की पहचान में रूसी भाषा में पूर्व सीबीएफसी अध्यक्ष प्रसून जोशी का नाम लिखा हुआ था। 12 अक्टूबर को दस्तावेज हटा दिए गए और उपयोगकर्ता ने अपना खाता भी मिटा दिया। हालांकि, केवल इस नाम के आधार पर संबंधित व्यक्ति की वास्तविक पहचान की पुष्टि नहीं होती।
  • इंटरनेट आर्काइव ने द हिंदू को बताया कि संबंधित खाता उपयोगकर्ता ने स्वयं हटाया था। यह भी स्पष्ट नहीं है कि दस्तावेजों के सार्वजनिक होने की जानकारी किसी संबंधित पक्ष को पहले से थी या नहीं।

सीबीएफसी और सर्ट-इन कर रहे जांच

  • सीबीएफसी अध्यक्ष शशि शेखर वेम्पति ने बयान में कहा कि बोर्ड ने कथित अनधिकृत पहुंच से संबंधित जानकारी की समीक्षा की है। अब तक जांचे गए तथ्यों के आधार पर कथित रूप से उजागर किए गए प्रमाणन संबंधी दस्तावेजों का कोई पता नहीं चला है।
  • बोर्ड ने साइबर अपराध से संबंधित शिकायत दर्ज कराने और भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (सर्ट-इन) को जानकारी देने की पुष्टि की है। तकनीकी टीम ने सर्वरों और डेटाबेस का विश्लेषण भी किया है, ताकि पता लगाया जा सके कि किसी बाहरी हमले के कारण सुरक्षा प्रभावित हुई थी या नहीं। 
  • रिपोर्ट के अनुसार, 4 अक्टूबर को ई-सिनेप्रमाण पोर्टल कई घंटों तक उपलब्ध नहीं था। इसके कुछ समय बाद संबंधित उपयोगकर्ता ने दस्तावेज अपलोड करना बंद कर दिया।
  • सीबीएफसी ने कहा कि किसी व्यक्तिगत फिल्म निर्माता के खाते से छेड़छाड़ किए जाने के संकेत नहीं मिले हैं। बोर्ड ने पोर्टल का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराने की प्रतिबद्धता भी जताई। उसके अनुसार, इस अवधि में फिल्म प्रमाणन का कामकाज जारी रहा और प्रणाली की अनुपलब्धता को लेकर किसी उपयोगकर्ता की शिकायत नहीं मिली।
  • फिलहाल जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि दस्तावेज किस तरह सार्वजनिक हुए और क्या पोर्टल की सुरक्षा में कोई खामी थी। जांच और सुरक्षा ऑडिट के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही इस घटना की वास्तविक प्रकृति और फिल्म उद्योग पर इसके संभावित प्रभावों का स्पष्ट आकलन हो सकेगा।
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