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बुद्ध की सिरविहीन मूर्ति और रॉक कट गुफाओं की खोज

(प्रारंभिक परीक्षा : प्राचीन भारत का इतिहास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य व वास्तुकला के मुख्य पहलू)

संदर्भ 

कर्नाटक के मंगलुरु में किए गए पुरातात्विक अन्वेषण के दौरान बुद्ध की एक सिरविहीन मूर्ति और तीन अत्यंत महत्वपूर्ण चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं का एक समूह प्राप्त हुआ है।

बुद्ध की मूर्ति से संबंधित प्रमुख बिंदु 

यह मूर्ति सिरविहीन है और दाहिना हाथ पूरी तरह नष्ट हो चुका है। इसके बावजूद इस मूर्ति की शांत एवं सुंदर आभा बरकरार है, जो इसकी कलात्मक व आध्यात्मिक उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है।

  • खोज स्थल : यह मूर्ति काद्री मंजूनाथ मंदिर के पास एक जल निकाय में पाई गई थी।
  • मूर्ति की मुद्रा : मूर्ति में बुद्ध के दोनों हाथ पैरों के केंद्र के ऊपर रखे हुए हैं जो ध्यान मुद्रा (ध्यानमुद्रा) को दर्शाता है। यह मुद्रा बौद्ध दर्शन में मन की एकाग्रता एवं आंतरिक शांति का प्रतीक है।
  • वस्त्र का विवरण : मूर्ति के बाएँ कंधे से गुजरने वाला ऊपरी वस्त्र (उत्तरासंग) छाती पर सपाट रूप में दिखाई देता है।

  • आकार एवं संरचना : मूर्ति की ऊँचाई लगभग 68 सेमी. और चौड़ाई 48 सेमी. है जिसमें इसका आधार भी शामिल है। यह आकार इसे मंदिर की मुख्य मूर्ति के रूप में उपयुक्त बनाता है।
  • काल निर्धारण : शैलीगत विशेषताओं के आधार पर मूर्ति को 4वीं से 6वीं सदी ईस्वी के बीच का माना गया है। 
    • इस अवधि में महायान बौद्ध धर्म का दक्षिण भारत में विशेष प्रभाव था और यह मूर्ति उसी परंपरा का हिस्सा है।
  • समानता : यह मूर्ति गोवा के कोलवाले में मुशिरा वाडो में मिली बुद्ध मूर्ति से शैलीगत समानता रखती है, जो वर्तमान में मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज के हेरास इंस्टीट्यूट में प्रदर्शित है। यह समानता कद्री एवं अन्य क्षेत्रीय बौद्ध केंद्रों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को इंगित करती है।
  • कलात्मक उत्कृष्टता : मूर्ति की बनावट, कमल पीठ एवं ध्यान मुद्रा उस समय के शिल्पकारों की उच्च कलात्मक कुशलता को दर्शाती है। यह मूर्ति उस समय की बौद्ध कला एवं संस्कृति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

रॉक कट गुफाओं के बारे में 

  • स्थान : गुफाएँ कद्री जलाशय के पूर्वी हिस्से में ऊँचाई पर स्थित हैं जो मंदिर परिसर से निकट हैं। ये जमीन से ऊपर लेटराइट चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं।
  • सामग्री : गुफाओं का निर्माण लेटराइट पत्थर से किया गया है जो दक्षिण भारत में प्राचीन निर्माण के लिए आमतौर पर उपयोग किया जाता था। यह पत्थर मुलायम होने के कारण काटने में आसान होता है, जिससे गुफा निर्माण सुविधाजनक था।
  • आवासीय उपयोग : गुफाओं की संरचना व सुविधाएँ (जैसे- दीप स्थान एवं साधारण कमरे) स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि इनका उपयोग बौद्ध भिक्षुओं के लिए आवासीय उद्देश्य से किया जाता था। ये गुफाएँ ध्यान, अध्ययन एवं साधना के लिए उपयुक्त थीं।
  • वास्तुकला : गुफाओं की सादगी व कार्यक्षमता महायान बौद्ध वास्तुकला की विशेषता है। ये गुफाएँ उस समय के बौद्ध मठों (विहारों) के समान हैं जो भिक्षुओं के लिए निवास व साधना स्थल के रूप में बनाए जाते थे।
  • छत एवं जल निकासी : सभी गुफाओं में ढलानदार छत (स्लोपिंग कैनोपी) है जिसमें वर्षा जल को निकालने के लिए छिद्र बनाए गए हैं। यह डिज़ाइन गुफाओं को नमी व जलभराव से बचाने के लिए बनाया गया था, जो दक्षिण भारत की अधिक वर्षा को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण था।
  • गुफाओं की संरचना : गुफाएँ तीन अलग-अलग इकाइयों में हैं जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएँ हैं:
    • पहली गुफा (दाहिनी ओर) : यह गुफा लगभग 8 फीट ऊंची है जिसमें एक अर्धवृत्ताकार प्रवेश द्वार है। यह डिज़ाइन मेगालिथिक डोलमेन (प्रागैतिहासिक कब्र संरचनाओं) से प्रेरित प्रतीत होता है। इसका मेगालिथिक प्रभाव इसे पुरातात्विक दृष्टिकोण से विशेष बनाता है।
    • दूसरी एवं तीसरी गुफा (मध्य व बाईं ओर) : इन गुफाओं में एक ऊँचा चबूतरा (प्लिंथ) है जो इन्हें पहली गुफा से अलग करता है। ऊँचा चबूतरा संभवतः बाढ़ या नमी से बचाव के लिए बनाया गया था। 

खोज का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व

  • इतिहासकारों के अनुसार यह मूर्ति कद्री मंदिर की मुख्य मूर्ति (प्रधान देवता) रही होगी। मंदिर के बाहरी प्राकार में एक स्तंभ पर कमल के आधार पर ध्यान बुद्ध की अन्य मूर्तियों की उपस्थिति इसकी पहचान को पुष्ट करती है।
  • यह खोज कद्री के एक प्रमुख बौद्ध केंद्र होने के दशकों पुराने विवाद को समाप्त करती है। कद्री मंदिर में मिले अलुपा राजा कुंदवर्मा के शिलालेख (लोकेश्वर मूर्ति पर) से पता चलता है कि कद्री 10वीं सदी तक एक महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्र था।
  • मूर्ति व इसके साथ मिली गुफाएँ महायान बौद्ध धर्म से संबंधित हैं। बाद में 10वीं सदी तक वज्रयान बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा और 11वीं सदी में नाथ संप्रदाय ने इसे प्रतिस्थापित कर दिया।
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