संदर्भ
हाल ही में कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने कहा कि मेकेदातु जलाशय परियोजना के लिए 2,500 एकड़ भूमि की पहचान की गई है, जिसमें से केवल किसानों की 500 एकड़ निजी भूमि का अधिग्रहण करना होगा।
मेकेदातु परियोजना के बारे में
- यह एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन करना है।
- इसके तहत कर्नाटक के रामनगर जिले में कनकपुरा के पास एक संतुलन जलाशय (Balancing Reservoir) का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है।
- यह परियोजना बेंगलुरु से लगभग 90 किलोमीटर दूर तथा तमिलनाडु की सीमा से लगभग 4 किलोमीटर पहले स्थित है।
- यह परियोजना कावेरी नदी और उसकी सहायक नदी अर्कावती के संगम स्थल पर प्रस्तावित है।
परियोजना में शामिल निर्माण कार्य:
- 99 मीटर ऊँचा और 735 मीटर लंबा कंक्रीट ग्रेविटी बांध।
- भूमिगत विद्युत गृह (Underground Powerhouse)।
- जल संवहन प्रणाली (Water Conductor System)।
- इस जलाशय की जल भंडारण क्षमता 67 टीएमसी (TMC) होगी।
परियोजना की उपयोगिता:
- परियोजना के तहत प्रतिवर्ष 4.75 टीएमसी पानी का उपयोग बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति के लिए किया जाना प्रस्तावित है।
- इसके अतिरिक्त, इससे लगभग 400 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन होने की संभावना है।
- बांध के निर्माण के बाद कावेरी वन्यजीव अभयारण्य (Cauvery Wildlife Sanctuary) के 5,000 हेक्टेयर से अधिक संरक्षित क्षेत्र के जलमग्न होने की आशंका है।
मेकेदातु परियोजना की पृष्ठभूमि और विवाद
- मेकेदातु जलाशय और पेयजल परियोजना का प्रस्ताव मूल रूप से 1980 के दशक के आरंभ में रखा गया था। कर्नाटक ने रामनगर जिले में स्थित मेकेदातु में कावेरी नदी पर एक संतुलन जलाशय के निर्माण की परिकल्पना की थी, जिसका उद्देश्य नदी के प्रवाह को नियंत्रित करना, जल प्रबंधन में सुधार करना, बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराना और पनबिजली उत्पन्न करना था।
- इस परियोजना को लेकर विवाद कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर चल रहे व्यापक संघर्ष से जुड़ा है। 2007 में, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (सीडब्ल्यूडीटी) ने बेसिन के जल का तटवर्ती राज्यों के बीच आवंटन करते हुए अपना अंतिम निर्णय जारी किया।
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (सीडब्ल्यूडीटी) के बारे में
- सीडब्ल्यूडीटी भारत सरकार द्वारा 2 जून 1990 को स्थापित एक कानूनी निकाय है।
- इसका गठन अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी के बीच कावेरी नदी पर लंबे समय से चले आ रहे जल बंटवारे के विवाद को सुलझाने के लिए किया गया था। यह निर्णय बाद में वह ढाँचा बन गया जिसके अंतर्गत कावेरी से संबंधित नई परियोजनाओं पर विचार किया जाना था।