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LGBTQIA++ समुदाय में मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान व निकाय)

संदर्भ 

हाल ही में, भारत सहित विश्व के अन्य देशों में LGBTQIA++ समुदाय द्वारा ‘प्राइड मंथ’ (Pride Month) का आयोजन किया गया। इस वर्ग में शामिल महिला, पुरुष या तीसरे लिंग के व्यक्तियों की मनोवृति के कारण इन लोगों का लैंगिक व्यवहार सामान्य अवधारणा से कुछ अलग होता है।

क्या है ‘LGBTQIA++’ समुदाय

  • L- ‘लेस्बियन’ (महिला समलैंगिक)- उन महिलाओं को कहते हैं, जो शारीरिक और भावनात्मक रूप से महिलाओं को पसंद करती हैं।
  • G- ‘गे’ (पुरुष समलैंगिक)- उन पुरुषों को कहते हैं, जो शारीरिक और भावनात्मक रूप से पुरुषों को पसंद करते हैं।
  • B- ‘बाइसेक्सुअल’ (उभयलिंगी)- उन व्यक्तियों को कहते है, जिन्हें महिला और पुरुष दोनों पसंद होते हैं।
  • T- ‘ट्रांसजेंडर’ (लिंग-परिवर्तन वाले)- उन व्यक्तियों को कहते हैं, जो अपने जन्म के समय के मूल लिंग में परिवर्तन कर लेते हैं, अर्थात पुरुष से महिला या महिला से पुरुष बनने वाले लोग।
  • Q- ‘क्वीर’ (Queer)- उन व्यक्तियों को कहते हैं, जो अपनी पसंद को लेकर अनिर्णय की स्थति में होते हैं।
  • I- ‘इंटरसेक्स’- उन व्यक्तियों को कहते हैं, जिनके शरीर दोनों लिंगों (स्त्री या पुरुष) की तय परिभाषा के अनुसार नहीं होते हैं। कभी-कभी ऐसे व्यक्तियों में दोनों के गुण भी दिखाई पड़ते हैं।
  • A- ‘एसेक्सुअल’ (अलैंगिक)- उन व्यक्तियों को कहते हैं, जिन्हें किसी से भी शारीरिक लगाव नहीं होता है।
  • पहले इन सभी के एकीकृत वर्ग को एल.जी.बी.टी.क्यू. के नाम से जाना जाता था, किंतु वर्तमान में इसमें कुछ नई श्रेणियों को शामिल करके इसे एल.जी.बी.टी.क्यू.आई.ए.++ के रूप में विस्तारित कर दिया गया है।

मानसिक समस्याओं का कारण 

  • पश्चिमी देशों में एल.जी.बी.टी.क्यू.आई.ए.++ लोगों को समाज का अभिन्न अंग स्वीकार किया जा चुका है और इन्हें भी अन्य लोगों के समान सभी अधिकार एवं अवसर प्राप्त हैं।
  • भारतीय समाज में इस समुदाय से सम्बंधित लोगों को हीन भावनाओं से देखा जाता है, जिस कारण इन्हें सामाजिक समानता से वंचित रहना पड़ता है और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  • इन्हें सामाजिक तिरस्कार, पारिवारिक बहिष्कार, विभिन्न स्थलों एवं अवसरों में भेदभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विभिन्न सामाजिक समस्याओं से पीड़ित इस समुदाय के लोग सामान्यत: आत्मग्लानि व तनाव के शिकार हो जाते हैं।
  • नकारात्मक व्‍यवहार इनके मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालता है, जिससे कई बार यह नकारात्मक कदम उठाने को विवश हो जाते हैं। विभिन्न सामाजिक समस्याओं व तिरस्कार के कारण इनके जीवन में अवसरों का अभाव होता है, जिसके परिणामस्वरुप ये लोग शैक्षिक एवं आर्थिक रूप से अन्य लोगों की तुलना में पिछड़ जाते हैं।

अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा 

  • समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता की कमी के कारण मनोविकार को किसी बीमारी के रूप में नहीं देखा जाता है।
  • सरकारी एजेंसियों द्वारा स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं में इन वर्गों की उपेक्षा एक प्रमुख मुद्दा है।
  • सरकार और अन्य एजेंसियों द्वारा इन समुदायों को प्राथमिकता के तौर पर चिन्हित नहीं किया जाता है।
  • अधिकांश एल.जी.बी.टी.क्यू.आई.ए.++ समुदाय सामाजिक भेदभाव के कारण सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति उदासीन रहते हैं और निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेना पसंद करते हैं। 
  • कोविद-19 की समस्या ने एल.जी.बी.टी.क्यू.आई.ए.++ समुदाय के मनोविकारों में और भी वृद्धि कर दी है।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 14 में समानता का अधिकार दिया गया है।
  • अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध करता है।
  • अनुच्छेद 19(1)(a) भारत के सभी नागरिकों को वाक्‌ एवं अभिव्यक्ति की स्वातंत्रता का अधिकार देता है।

एल.जी.बी.टी.क्यू.आई.ए.++ समुदाय के पक्ष में विभिन्न फैसले

  • नाज़ फाउंडेशन बनाम दिल्ली सरकार वाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने आपसी सहमति से स्थापित यौन संबंधों (समलैंगिकता सहित) के अपराधीकरण को भेदभावपूर्ण, चिंताजनक और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के विरुद्ध माना था। 
  • वर्ष 2013 में सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया था
  • न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ वाद (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना। 
  • सर्वोच्च न्यायालय ने नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ वाद (2018) में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। 
  • संवैधानिक पीठ ने दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 से बाहर कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत चुनाव को सम्मान देने की बात कही है। 

आगे की राह

 आज 21वीं सदी में भी एल.जी.बी.टी.क्यू.आई.ए.++ समुदाय के लोगों को मानसिक यातनाओं का सामना करता पड़ता है। साथ ही, विश्व के कई देश इस समुदाय को अपने समाज का हिस्सा मानने से भी इंकार कर देते हैं, ऐसे में सरकार तथा सामाजिक स्तर पर जागरूकता फैलाकर एल.जी.बी.टी.क्यू.आई.ए.++ समुदाय के लोगों के लिये एक समतामूलक समाज के निर्माण हेतु प्रयास किया जाना चाहिये। शैक्षणिक संस्थानों, स्वास्थ्य संस्थानों, सामुदायिक केन्द्रों, शासन एवं प्रशासन के स्तर पर इस समुदाय के प्रति जागरूकता फैलायी जानी चाहिये।

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