संदर्भ
भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों, बढ़ते ऊर्जा उपभोग और आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करने के लिए देश नवीकरणीय ऊर्जा के नए विकल्पों पर काम कर रहा है। इसी दिशा में हरित हाइड्रोजन एक महत्वपूर्ण ऊर्जा विकल्प बनकर उभरा है। यह न केवल औद्योगिक क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम करने की क्षमता रखता है, बल्कि भारत को स्वच्छ ऊर्जा के वैश्विक बाजार में अग्रणी बनाने में भी मदद कर सकता है। इसी उद्देश्य से केंद्र सरकार ने जनवरी 2023 में 19,744 करोड़ रुपये के बजट के साथ राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) को मंजूरी दी थी।
हरित हाइड्रोजन के बारे में
- हाइड्रोजन एक ऊर्जा वाहक है, जो ऊर्जा को संग्रहित करके विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग के लिए उपलब्ध कराता है। जब हाइड्रोजन का उपयोग ईंधन सेल में किया जाता है, तो यह ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके बिजली उत्पन्न करता है। इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से जल और ऊष्मा उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होते हैं।
- हालांकि, हाइड्रोजन का पर्यावरणीय प्रभाव उसके उत्पादन की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। पारंपरिक तरीकों में जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन होता है। इसके विपरीत, जब सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय बिजली की मदद से जल का विद्युत अपघटन करके हाइड्रोजन तैयार किया जाता है, तो उसे हरित हाइड्रोजन कहते हैं। इस प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन काफी कम होता है।
- भारत के पास सौर और पवन ऊर्जा के पर्याप्त संसाधन हैं, जिनका उपयोग बड़े पैमाने पर हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए किया जा सकता है। इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने के राष्ट्रीय लक्ष्य को भी समर्थन मिलेगा।
हरित हाइड्रोजन का उत्पादन
- हरित हाइड्रोजन का उत्पादन मुख्य रूप से इलेक्ट्रोलिसिस यानी जल के विद्युत अपघटन से किया जाता है। इस प्रक्रिया में नवीकरणीय बिजली का इस्तेमाल करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है।
- रासायनिक अभिक्रिया: 2H2O→2H2+O2
- इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रोलाइजर नामक उपकरण का उपयोग होता है। इसमें कैथोड और एनोड नाम के दो इलेक्ट्रोड होते हैं, जो विद्युत स्रोत से जुड़े रहते हैं। विद्युत प्रवाह होने पर कैथोड पर हाइड्रोजन और एनोड पर ऑक्सीजन का उत्पादन होता है। इसके बाद दोनों गैसों को अलग-अलग एकत्र कर लिया जाता है। इस प्रकार नवीकरणीय बिजली और पानी से कम उत्सर्जन वाला ईंधन तैयार होता है।
हरित हाइड्रोजन के प्रमुख उपयोग
हरित हाइड्रोजन उन औद्योगिक क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जहां कार्बन उत्सर्जन कम करना चुनौतीपूर्ण है। इसके प्रमुख अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:
- उर्वरक उद्योग: अमोनिया और यूरिया जैसे उर्वरकों के निर्माण में हाइड्रोजन की आवश्यकता होती है। हरित हाइड्रोजन प्राकृतिक गैस से बनने वाली हाइड्रोजन का विकल्प बनकर हरित अमोनिया के उत्पादन में मदद कर सकता है।
- पेट्रोलियम रिफाइनरी: रिफाइनरियों में पेट्रोल और डीजल से सल्फर हटाने तथा भारी तेल को हल्के ईंधनों में बदलने के लिए हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता है। हरित हाइड्रोजन अपनाने से इस क्षेत्र का कार्बन उत्सर्जन घट सकता है।
- इस्पात उद्योग: पारंपरिक इस्पात निर्माण में कोयले का इस्तेमाल होता है। इसकी जगह हरित हाइड्रोजन का उपयोग करके कम उत्सर्जन वाली इस्पात निर्माण प्रक्रिया विकसित की जा सकती है।
- परिवहन और रेलवे: हाइड्रोजन आधारित फ्यूल सेल वाहन बिजली उत्पन्न करके इलेक्ट्रिक मोटर चलाते हैं। ये विशेष रूप से लंबी दूरी तय करने वाली बसों, ट्रकों और ट्रेनों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
- शिपिंग: हरित हाइड्रोजन से तैयार हरित अमोनिया और हरित मेथनॉल का इस्तेमाल जहाजों के ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
- निर्यात: भारत हरित हाइड्रोजन, हरित अमोनिया और हरित मेथनॉल का निर्यात करके वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ा सकता है।
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के प्रमुख घटक
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है। इसके प्रमुख घटक इस प्रकार हैं:
- एसआईजीएचटी कार्यक्रम: स्ट्रेटेजिक इंटरवेंशंस फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (SIGHT) के तहत घरेलू इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण और हरित हाइड्रोजन उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इसके लिए 2029-30 तक 17,490 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित है।
- पायलट परियोजनाएं: इस्पात, भारी परिवहन और शिपिंग जैसे क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए पायलट परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इनका उद्देश्य नई तकनीकों का परीक्षण करना और बड़े पैमाने पर इनके व्यावसायिक उपयोग का रास्ता तैयार करना है।
- हरित हाइड्रोजन हब: उत्पादन, खपत और परिवहन संबंधी बुनियादी ढांचे को एक स्थान पर विकसित करने के लिए हाइड्रोजन हब बनाए जा रहे हैं। दीनदयाल पोर्ट, वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट और पारादीप पोर्ट को इसके लिए मान्यता दी गई है। इसके अतिरिक्त, जोधपुर, ओडिशा, पुणे और केरल में चार हाइड्रोजन वैली इनोवेशन क्लस्टर को मंजूरी दी गई है।
- अनुसंधान एवं विकास: हरित हाइड्रोजन को अधिक किफायती, सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए अनुसंधान एवं विकास पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए 400 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। साथ ही, इस क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप्स को भी वित्तीय सहायता दी जा रही है।
नीतिगत सुधार और सुरक्षा मानक
- हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई नीतिगत सुविधाएं प्रदान की हैं। इनमें पात्र परियोजनाओं को 25 वर्षों तक अंतर-राज्य ट्रांसमिशन शुल्क से छूट, 15 दिनों के भीतर ओपन एक्सेस और अतिरिक्त नवीकरणीय बिजली की 30 दिनों तक बैंकिंग की सुविधा शामिल है।
- इसके अलावा, भारत ने हरित हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए राष्ट्रीय मानक भी अधिसूचित किया है। इसके तहत उत्पादन स्तर पर प्रति किलोग्राम हाइड्रोजन के लिए 2 किलोग्राम CO₂ के बराबर अधिकतम उत्सर्जन सीमा निर्धारित की गई है। अप्रैल 2025 में ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन स्कीम ऑफ इंडिया शुरू की गई, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और उत्सर्जन मानकों के अनुपालन को प्रमाणित किया जा सके।
रोजगार, निवेश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन केवल ऊर्जा परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के नए अवसर भी उपलब्ध कराता है। मिशन के तहत वर्ष 2030 तक छह लाख से अधिक रोजगार पैदा करने का लक्ष्य है। अब तक 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 8,149 उम्मीदवारों को प्रशिक्षण दिया गया है, जबकि 7,248 उम्मीदवार प्रमाणित किए जा चुके हैं।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। इसके अलावा, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों ने अपनी हरित हाइड्रोजन नीतियां भी लागू की हैं।
निष्कर्ष
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भारत को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके माध्यम से वर्ष 2030 तक 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित करने, छह लाख से ज्यादा रोजगार पैदा करने और सालाना लगभग 50 मिलियन मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम करने की उम्मीद है।
- हरित हाइड्रोजन का व्यापक उपयोग आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और औद्योगिक क्षेत्र को कम कार्बन वाला बनाने में सहायक होगा। यह पहल न केवल भारत के 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को गति देगी, बल्कि 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।