संदर्भ
भारत के आर्थिक विकास में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देते हैं। इस विकास यात्रा को अधिक समावेशी बनाने के लिए अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के उद्यमियों को वित्त, कौशल, प्रौद्योगिकी और बाजारों तक बेहतर पहुँच प्रदान करना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय एससी-एसटी हब (एनएसएसएच) योजना उद्यमियों को व्यवसाय स्थापित करने, विकसित करने और सार्वजनिक खरीद के अवसरों का लाभ उठाने में सहायता कर रही है।
राष्ट्रीय एससी-एसटी हब: उद्यम विकास को प्रोत्साहन
- 18 अक्टूबर 2016 को शुरू की गई एनएसएसएच योजना राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (एनएसआईसी) के माध्यम से कार्यान्वित की जाती है।
- इसका उद्देश्य एससी/एसटी स्वामित्व वाले उद्यमों के सामने आने वाली प्रमुख बाधाओं को दूर करना और सरकारी खरीद में उनकी भागीदारी बढ़ाना है।
- योजना के अंतर्गत प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, व्यवसाय विकास, नेटवर्किंग और ज्ञान संबंधी सहायता उपलब्ध कराई जाती है, जिससे उद्यमियों की व्यावसायिक क्षमताएँ मजबूत होती हैं और नए बाजारों तक उनकी पहुँच बढ़ती है।
- 31 जुलाई 2026 तक योजना के अंतर्गत 1,90,414 लाभार्थियों को सहायता प्रदान की गई, जबकि 54,499 अभ्यर्थियों को प्रशिक्षित किया गया। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और असम इसके प्रमुख राज्यों के रूप में उभरे हैं।
सार्वजनिक खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि
- एनएसएसएच का प्रभाव सार्वजनिक खरीद में एससी/एसटी उद्यमों की बढ़ती भागीदारी से स्पष्ट होता है। इन उद्यमों से खरीद का मूल्य वर्ष 2015-16 में 99.37 करोड़ रुपये था, जो लगभग 39 गुना बढ़कर वर्ष 2025-26 में 4,013.42 करोड़ रुपये हो गया।
- वर्ष 2025-26 के दौरान 12,524 सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (एमएसई) से इतनी राशि की सार्वजनिक खरीद दर्ज की गई। इसी अवधि में 24 आकांक्षी जिलों सहित 27 राज्यों के 47 संस्थानों के माध्यम से 10,717 अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षित अभ्यर्थियों में 55 प्रतिशत महिलाएँ थीं।

- प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सार्वजनिक खरीद और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) के अवसरों के अनुरूप तैयार किया गया। इनमें कैफेटेरिया प्रबंधन एवं खाद्य उत्पादन, वेल्डिंग, कंप्यूटर-एडेड डिजाइन (सीएडी) और मैन्युफैक्चरिंग (सीएएम), लॉन्ड्री सेवाएँ, फैशन डिजाइनिंग, सिलाई तथा बाँस आधारित कार्य शामिल थे।
वित्तीय सहायता और तकनीकी उन्नयन
- विशेष ऋण-संबद्ध पूंजी सब्सिडी योजना (एससीएलसीएसएस) के तहत नई और मौजूदा एससी/एसटी स्वामित्व वाली एमएसई को संयंत्र, मशीनरी और उपकरणों में निवेश के लिए संस्थागत ऋण से वित्तपोषित खरीद पर 25 प्रतिशत पूंजीगत सब्सिडी मिलती है। इसकी अधिकतम सीमा 25 लाख रुपये है। विनिर्माण और सेवा, दोनों क्षेत्रों के उद्यम इसके पात्र हैं। स्थापना से मार्च 2026 तक 3,160 एमएसई को कुल 356.10 करोड़ रुपये की सहायता दी गई और योजना 27 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 233 जिलों तक पहुँची।
- एकल बिंदु पंजीकरण योजना (एसपीआरएस) के माध्यम से एनएसआईसी में पंजीकृत एमएसई को सरकारी खरीद में भाग लेने के लिए निःशुल्क निविदा दस्तावेज और बयाना राशि (ईएमडी) से छूट जैसे लाभ मिलते हैं। सार्वजनिक खरीद नीति के अनुसार, केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों और केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) को अपनी वार्षिक खरीद का 25 प्रतिशत एमएसई से करना होता है। इसमें 4 प्रतिशत खरीद एससी/एसटी स्वामित्व वाले एमएसई के लिए निर्धारित है।
विपणन, प्रशिक्षण और बाजार विस्तार
- विशेष विपणन सहायता योजना (एसएमएएस) प्रदर्शनियों, व्यापार मेलों, विक्रेता विकास कार्यक्रमों और कार्यशालाओं के जरिए उद्यमों की बाजार में दृश्यता बढ़ाती है। पंजीकृत उद्यम प्रत्येक वित्तीय वर्ष में अधिकतम चार घरेलू और दो अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भाग ले सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों के लिए सूक्ष्म उद्यमों को 3 लाख रुपये, लघु उद्यमों को 2.5 लाख रुपये और मध्यम उद्यमों को 1.5 लाख रुपये तक सहायता मिल सकती है। इसके लिए उद्यम पंजीकरण पोर्टल और एमएसएमई डेटा बैंक पर पंजीकरण आवश्यक है।
- वर्ष 2025-26 में 141 एससी/एसटी एमएसई को चार घरेलू प्रदर्शनियों में भाग लेने की सुविधा दी गई। इसके अतिरिक्त, सीपीएसई के साथ 247 विशेष विक्रेता विकास कार्यक्रम, 197 ई-निविदा कार्यशालाएँ और सीपीएसई एवं सरकारी विभागों के साथ 230 जागरूकता कार्यशालाएँ आयोजित की गईं।
लागत में कमी और व्यावसायिक क्षमता का विकास
- एनएसएसएच के अंतर्गत कई प्रतिपूर्ति योजनाएँ उद्यमों की लागत घटाती हैं। बैंक ऋण प्रसंस्करण शुल्क, निष्पादन बैंक गारंटी शुल्क और पात्र उत्पाद परीक्षण एवं प्रमाणन शुल्क पर लागू करों को छोड़कर 80 प्रतिशत राशि या 1 लाख रुपये (जो भी कम हो) की प्रतिपूर्ति की जाती है। परीक्षण के लिए एनएबीएल/बीआईएस से मान्यता प्राप्त, सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की प्रयोगशालाओं का उपयोग आवश्यक है।
- निर्यात संवर्धन परिषद सदस्यता शुल्क योजना के तहत पात्र शुल्क की 80 प्रतिशत राशि या 20,000 रुपये तक प्रतिपूर्ति मिलती है। इसके लिए वैध आयात-निर्यात कोड (आईईसी) और पंजीकरण-सह-सदस्यता प्रमाणपत्र (आरसीएमसी) जरूरी हैं। क्षमता निर्माण योजना में एनआईआरएफ के शीर्ष 50 प्रबंधन संस्थानों में 1 से 30 दिनों के प्रशिक्षण के लिए प्रति वर्ष अधिकतम दो पाठ्यक्रमों पर 90 प्रतिशत शुल्क या 1 लाख रुपये तक प्रतिपूर्ति दी जाती है।
- जीईएम, ई-खादी, ट्राइफेड, ट्राइब्स इंडिया और एमएसएमई मार्ट जैसे सरकार द्वारा प्रवर्तित ई-कॉमर्स पोर्टलों की सदस्यता के लिए भी पात्र शुल्क का 80 प्रतिशत या 25,000 रुपये तक प्रतिपूर्ति उपलब्ध है।
सहायता से बाजार में सफलता तक
- बिजनेस एक्सेलेरेटर प्रोग्राम (बीएपी) के माध्यम से उद्यमियों को व्यवसाय रणनीति, मूल्य निर्धारण, परिचालन दक्षता और बाजार में स्थिति निर्धारण के संबंध में संरचित मार्गदर्शन मिलता है। इससे उन्हें डेटा-आधारित निर्णय लेने, बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यवसाय विकसित करने और बड़े व्यावसायिक अवसरों का लाभ उठाने में मदद मिलती है।
- राष्ट्रीय एससी-एसटी हब वित्तीय सहायता, कौशल विकास, विपणन और सार्वजनिक खरीद को एकीकृत करके उद्यमियों के लिए विकास के नए रास्ते खोल रहा है। इसकी पहलें एससी/एसटी समुदायों की उद्यमिता को सशक्त बनाने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और भारत में अधिक समावेशी, विविधतापूर्ण तथा प्रतिस्पर्धी एमएसएमई इकोसिस्टम के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।