प्रारंभिक परीक्षा: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009, विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (UDID), PM-DAKSH योजना।मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन पेपर II – शिक्षा से संबंधित मुद्दे, सरकारी नीतियाँ एवं हस्तक्षेप, समाज के कमजोर वर्ग, समावेशी शिक्षा और सामाजिक न्याय। Keywords: PRASHAST स्क्रीनिंग टूल, दिव्यांगता की पहचान, समावेशी शिक्षा, प्रारंभिक हस्तक्षेप, डिजिटल शिक्षा, दिव्यांग बच्चे, RPwD Act 2016, UDID कार्ड, NEP 2020, शैक्षिक सुगम्यता। |
चर्चा में क्यों?
- शिक्षा मंत्रालय (MoE) ने PRASHAST नामक डिजिटल, विद्यालय-आधारित स्क्रीनिंग टूल के माध्यम से संभावित दिव्यांगता वाले विद्यार्थियों की पहचान करने के लिए लगभग 72 लाख शिक्षकों को 60,000 तक स्कूलों में प्रशिक्षित किया है।
- इस पहल का उद्देश्य दिव्यांगता से जुड़ी आवश्यकताओं की शुरुआती पहचान करना, विशेषज्ञों द्वारा आकलन के लिए रेफरल की सुविधा देना तथा शैक्षिक सहायता और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच बेहतर बनाना है।

PRASHAST क्या है?
- PRASHAST एक विद्यालय-आधारित डिजिटल स्क्रीनिंग टूल है, जिसे दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) के अंतर्गत आने वाली दिव्यांगताओं की संभावित पहचान में सहायता के लिए तैयार किया गया है।
- कई दिव्यांगताएँ, विशेषकर विशिष्ट अधिगम अक्षमता (Specific Learning Disability), ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर तथा कुछ संवेदी और विकासात्मक स्थितियाँ, तुरंत दिखाई नहीं देतीं। व्यवस्थित स्क्रीनिंग के अभाव में ऐसे विद्यार्थियों की पहचान नहीं हो पाती और उन्हें समय पर शैक्षिक सहायता नहीं मिलती।
- PRASHAST का उद्देश्य विद्यार्थियों के साथ शिक्षकों की नियमित बातचीत और कक्षा में उनके व्यवहार के अवलोकन के माध्यम से दिव्यांगता के संभावित संकेतों को पहचानना तथा बच्चों को उचित आकलन और सहायता सेवाओं से जोड़ना है।
PRASHAST स्क्रीनिंग टूल की प्रमुख विशेषताएँ
शिक्षा मंत्रालय ने समावेशी शिक्षा की समझ बढ़ाने के लिए सामान्य शिक्षकों के बीच जागरूकता और प्रशिक्षण गतिविधियाँ आयोजित की हैं।
- लगभग 72 लाख शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया है।
- इस पहल के अंतर्गत 60,000 तक स्कूलों को शामिल किया गया है।
- यह विद्यार्थियों के सीखने, संवाद करने, चलने-फिरने और सामाजिक व्यवहार के व्यवस्थित अवलोकन को बढ़ावा देता है।
- प्रशिक्षण के माध्यम से विद्यालयों में सम्मानजनक और समावेशी व्यवहार को प्रोत्साहित किया जाता है।
21 दिव्यांगता श्रेणियों की पहचान
PRASHAST को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में सूचीबद्ध 21 दिव्यांगता श्रेणियों से संबंधित स्थितियों की पहचान में सहायता के लिए तैयार किया गया है।
इनके कुछ उदाहरण हैं:
- चलने-फिरने संबंधी दिव्यांगता (Locomotor Disability) और सेरेब्रल पाल्सी।
- दृष्टिहीनता और अल्प दृष्टि।
- श्रवण बाधिता।
- वाणी एवं भाषा संबंधी दिव्यांगता।
- विशिष्ट अधिगम अक्षमता।
- ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर।
- बौद्धिक दिव्यांगता।
- मल्टीपल स्क्लेरोसिस और पार्किंसन रोग।
- हीमोफीलिया और थैलेसीमिया।
- कुष्ठ रोग से उपचारित व्यक्ति और बौनापन।
इस अधिनियम में अन्य निर्दिष्ट दिव्यांगताएँ भी शामिल हैं। स्क्रीनिंग का उद्देश्य संभावित सहायता आवश्यकताओं की पहचान करना है, न कि केवल कक्षा में देखे गए व्यवहार के आधार पर विद्यार्थियों को दिव्यांग घोषित करना।
PRASHAST कैसे कार्य करता है?
यह प्रक्रिया कक्षा में किए गए अवलोकन को विशेषज्ञों के आकलन और शैक्षिक सहायता से जोड़ती है।
चरण 1: शिक्षक प्रशिक्षण: शिक्षकों और विद्यालय के अन्य कर्मचारियों को दिव्यांगता के प्रति जागरूकता, स्क्रीनिंग के संकेतकों तथा समावेशी व्यवहार के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है।
चरण 2: विद्यालय-आधारित स्क्रीनिंग: शिक्षक PRASHAST चेकलिस्ट का उपयोग करके ऐसे दिखाई देने वाले संकेतों को दर्ज करते हैं, जो दिव्यांगता से संबंधित आवश्यकता की ओर संकेत कर सकते हैं।
चरण 3: विशेष शिक्षकों द्वारा समीक्षा: विशेष शिक्षक स्क्रीनिंग के निष्कर्षों की समीक्षा करते हैं, संभावित दिव्यांगता श्रेणियों की पहचान में सहायता करते हैं और यह तय करते हैं कि आगे आकलन या रेफरल की आवश्यकता है या नहीं।
चरण 4: विशेषज्ञ आकलन और प्रमाणन: आवश्यकता होने पर विद्यार्थियों को चिकित्सा विशेषज्ञों या अन्य अधिकृत संस्थानों के पास आकलन के लिए भेजा जाता है। दिव्यांगता प्रमाणपत्र निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से जारी किया जाता है।
चरण 5: सहायता और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच: पात्र विद्यार्थियों को उनकी पात्रता के अनुसार शैक्षिक सुविधाओं, छात्रवृत्तियों और दिव्यांगता संबंधी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा जा सकता है।
PRASHAST पहल का महत्त्व
- दिव्यांगता की प्रारंभिक पहचान: शुरुआती स्क्रीनिंग से उन बच्चों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जिनकी आवश्यकताएँ अन्यथा अनदेखी रह जातीं। समय पर पहचान से परिवार और विद्यालय विशेषज्ञों की सलाह तथा उचित सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
- समावेशी शिक्षा को बढ़ावा: यह पहल ऐसी शिक्षा व्यवस्था का समर्थन करती है, जिसमें दिव्यांग बच्चे अपने अन्य साथियों के साथ पढ़ सकें और उन्हें आवश्यक सुविधाएँ तथा उपयुक्त सहायता मिल सके।
- गलत पहचान और सामाजिक कलंक में कमी: व्यवस्थित स्क्रीनिंग से बिना पर्याप्त आधार के किसी विद्यार्थी को दिव्यांग मान लेने के बजाय प्रमाण-आधारित रेफरल को बढ़ावा मिल सकता है। उचित आकलन से सीखने की अलग-अलग कठिनाइयों और अन्य संभावित कारणों के बीच अंतर करने में सहायता मिलती है।
- सीखने के परिणामों में सुधार: शुरुआती स्तर पर उचित सहायता प्राप्त करने वाले विद्यार्थी कक्षा की गतिविधियों में बेहतर भागीदारी कर सकते हैं, आवश्यक कौशल विकसित कर सकते हैं और अपनी शिक्षा जारी रख सकते हैं।
- विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय: स्क्रीनिंग को आकलन, प्रमाणन और सहायता सेवाओं से जोड़ने से विद्यालयों, विशेष शिक्षकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर हो सकता है।
UDID और कल्याणकारी योजनाओं से संबंध
- स्क्रीनिंग के निष्कर्ष दिव्यांगता प्रमाणन और विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (Unique Disability ID—UDID) प्रणाली से जुड़ने में सहायता कर सकते हैं। UDID दिव्यांग व्यक्तियों को संबंधित लाभों और सेवाओं तक पहुँचने में मदद करता है।
- पात्रता की शर्तें पूरी होने पर यह जानकारी PM-DAKSH जैसी योजनाओं और राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल के माध्यम से छात्रवृत्तियों तक पहुँच बनाने में भी सहायक हो सकती है।
- केवल स्क्रीनिंग से दिव्यांगता प्रमाणपत्र या किसी सरकारी योजना का लाभ स्वतः प्राप्त नहीं होता।
कार्यान्वयन की रूपरेखा
शिक्षा मंत्रालय द्वारा वर्णित योजना के अनुसार:
- जुलाई–सितंबर: आवश्यक शिक्षक प्रशिक्षण पूरा करना।
- अक्टूबर: आकलन और आवश्यक सहायता के लिए हस्तक्षेप शिविर आयोजित करना।
- दिसंबर: विद्यार्थियों की प्रगति और किए गए हस्तक्षेपों के आधार पर परिणामों का मूल्यांकन करना।
ये समय-सीमाएँ घोषित कार्ययोजना को दर्शाती हैं। इनके वास्तविक कार्यान्वयन और परिणामों का आकलन बाद में जारी होने वाले आधिकारिक अपडेट के आधार पर किया जाना चाहिए।
कार्यान्वयन की प्रमुख चुनौतियाँ
- विशेष शिक्षकों की कमी: कई विद्यालयों में स्क्रीनिंग के परिणामों की समीक्षा करने और पहचाने गए विद्यार्थियों की सहायता के लिए पर्याप्त विशेष शिक्षक उपलब्ध नहीं हो सकते हैं।
- गलत पहचान का जोखिम: किसी व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, पढ़ने में कठिनाई का कारण अलग-अलग अधिगम आवश्यकताएँ, भाषा संबंधी बाधाएँ या पर्याप्त शिक्षण सहायता का अभाव हो सकता है। इसलिए स्क्रीनिंग के बाद उचित आकलन आवश्यक है।
- डिजिटल पहुँच और आधारभूत संरचना: उपकरणों, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल साक्षरता की असमान उपलब्धता, विशेषकर दूरस्थ एवं वंचित क्षेत्रों में, इस पहल के कार्यान्वयन को प्रभावित कर सकती है।
- सामाजिक कलंक और जागरूकता का अभाव: दिव्यांगता के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण परिवारों को आकलन कराने या सहायता स्वीकार करने से रोक सकता है। विद्यालयों को संवेदनशीलता के साथ जानकारी साझा करनी चाहिए और विद्यार्थियों को भेदभाव से बचाना चाहिए।
- डेटा की गोपनीयता और निजता: दिव्यांगता से संबंधित जानकारी संवेदनशील होती है। इसके संग्रह, भंडारण, साझा करने और उपयोग में लागू गोपनीयता नियमों तथा उचित सुरक्षा उपायों का पालन आवश्यक है।
- सहायता की निरंतरता: केवल पहचान कर लेना समावेशी शिक्षा सुनिश्चित नहीं करता। विद्यार्थियों को सुलभ कक्षाओं, आवश्यक सहायक उपकरणों, प्रशिक्षित कर्मचारियों, उचित शैक्षिक सुविधाओं और निरंतर अकादमिक सहायता की भी आवश्यकता होती है।
आगे की राह
- विशेष शिक्षकों का नेटवर्क मजबूत करना: विद्यालयों को नियुक्तियों, संसाधन केंद्रों या साझा विशेषज्ञ सेवाओं के माध्यम से प्रशिक्षित विशेष शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।
- समय पर विशेषज्ञ आकलन: विद्यालयों और अधिकृत आकलन केंद्रों तथा संबंधित स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच स्पष्ट रेफरल व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
- शिक्षकों की क्षमता बढ़ाना: प्रशिक्षण के साथ पुनश्चर्या पाठ्यक्रम, व्यावहारिक मार्गदर्शन और नियमित परामर्श की व्यवस्था होनी चाहिए।
- सुलभ विद्यालयी आधारभूत संरचना: विद्यालयों में भौतिक पहुँच, सुलभ शिक्षण सामग्री, संवाद संबंधी सहायता और सहायक तकनीकों की उपलब्धता बेहतर बनाई जानी चाहिए।
- विद्यार्थियों की निजता की सुरक्षा: स्क्रीनिंग रिकॉर्ड तक पहुँच केवल अधिकृत उद्देश्यों के लिए सीमित होनी चाहिए। अनधिकृत जानकारी साझा करने और भेदभावपूर्ण उपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।
- अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी: परिवारों को स्क्रीनिंग, विशेषज्ञ आकलन, उपलब्ध सेवाओं और बच्चों के शैक्षिक अधिकारों के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए।
- परिणामों की निगरानी: मूल्यांकन में केवल स्क्रीनिंग किए गए विद्यार्थियों की संख्या ही नहीं, बल्कि आकलन में लगने वाला समय, सहायता की उपलब्धता, उपस्थिति, सहभागिता और सीखने में प्रगति को भी शामिल किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- PRASHAST दिव्यांग बच्चों की आवश्यकताओं के प्रति विद्यालयों को अधिक संवेदनशील बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। शिक्षकों को संभावित संकेत पहचानने का प्रशिक्षण देना और स्क्रीनिंग को विशेषज्ञ आकलन से जोड़ना, सहायता की पहचान में होने वाली देरी को कम करने में मदद कर सकता है।
- हालाँकि, इसकी दीर्घकालिक सफलता विशेष शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता, प्रभावी रेफरल व्यवस्था, निजता की सुरक्षा और सुलभ शिक्षण वातावरण पर निर्भर करेगी। इसका अंतिम उद्देश्य केवल दिव्यांगता की पहचान करना नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे को सम्मान के साथ सीखने, भाग लेने और आगे बढ़ने के लिए आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना है।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
PRASHAST के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह संभावित दिव्यांगता वाले बच्चों की प्रारंभिक पहचान में सहायता करने के लिए बनाया गया विद्यालय-आधारित टूल है।
- इसका संबंध दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 से है।
- PRASHAST के माध्यम से स्क्रीनिंग करने पर बच्चे को स्वतः दिव्यांगता प्रमाणपत्र और UDID कार्ड मिल जाता है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
भारत में समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने में PRASHAST जैसे डिजिटल स्क्रीनिंग टूल की भूमिका पर चर्चा कीजिए। इनके कार्यान्वयन की प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए दिव्यांग बच्चों को प्रभावी सहायता सुनिश्चित करने के उपाय सुझाइए।
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FAQs
प्रश्न 1. PRASHAST क्या है?
PRASHAST एक विद्यालय-आधारित डिजिटल स्क्रीनिंग टूल है, जिसे संभावित दिव्यांगता वाले बच्चों की पहचान करने और उन्हें आगे के आकलन या शैक्षिक सहायता से जोड़ने के लिए विकसित किया गया है।
प्रश्न 2. PRASHAST पहल किस मंत्रालय से संबंधित है?
यह भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय से संबंधित पहल है।
प्रश्न 3. PRASHAST कितनी दिव्यांगता श्रेणियों को कवर करता है?
इसे दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में सूचीबद्ध 21 दिव्यांगता श्रेणियों से संबंधित स्थितियों की स्क्रीनिंग में सहायता के लिए तैयार किया गया है।
प्रश्न 4. इसमें विशेष शिक्षकों की क्या भूमिका है?
विशेष शिक्षक स्क्रीनिंग के निष्कर्षों की समीक्षा करते हैं, संभावित दिव्यांगता श्रेणियों की पहचान में सहायता करते हैं और आगे के आकलन के लिए रेफरल की प्रक्रिया को सुगम बनाते हैं।
प्रश्न 5. PRASHAST का समावेशी शिक्षा से क्या संबंध है?
यह विद्यालयों को ऐसे विद्यार्थियों की पहचान करने में मदद कर सकता है, जिन्हें अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को उपयुक्त सेवाओं, शैक्षिक सुविधाओं और सीखने में सहायक हस्तक्षेपों से जोड़ा जा सकता है।
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