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रामानुजाचार्य : विशिष्टाद्वैत दर्शन

(प्रारंभिक परीक्षा : भारत का इतिहास और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-1 : भारतीय संस्कृति प्राचीन से आधुनिक काल तक कला रूपों, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू)

संदर्भ

18 अप्रैल, 2021 को श्री रामानुजाचार्य की 1004वीं जयंती मनाई गई। इनकी जयंती की तिथि तमिल सौर कैलेंडर के आधार पर तय की जाती है। इन्होंने आम जनमानस में समानता और भक्ति-भाव का संचार किया था।

रामानुजाचार्य का परिचय

  • रामानुजाचार्य का जन्म 1017ई. में तमिलनाडु के श्रीपेरूम्बुदूर गाँव में हुआ था। इन्हें ‘इलाया पेरूमल’ (Ilaya Perumal) के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ होता है– ‘प्रकाशमान’। ये यमुनाचार्य जी के शिष्य थे।
  • इन्हें वैष्णववादी दर्शन का सबसे सम्मानित आचार्य माना जाता है। ये वेदांत दर्शन परंपरा में ‘विशिष्टाद्वैत’ के प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध हैं। रामानुज सगुण ईश्वर के उपासक थे। उन्होंने अपने विचारों के माध्यम से प्राचीन भागवत (वैष्णव) धर्म की परंपरा को आगे बढ़ाया तथा उसे दार्शनिक आधार प्रदान किया।
  • उन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की तथा भगवद् गीता पर भाष्य लिखा। इनकी सभी रचनाएँ संस्कृत भाषा में हैं।
  • रामानुजाचार्य ने अस्पृश्यों के साथ भेदभाव न करने की बात करते हुए कहा कि विश्व-रचयिता ने कभी किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया। इन्होंने जन्म या जाति की बजाय व्यक्ति के आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर सम्मान की बात की तथा वेदों के गोपनीय और सर्वोत्कृष्ट ज्ञान को मंदिरों से निकाल कर आमजन तक पहुँचाया।
  • इनके भक्तिवादी दार्शनिक तत्त्वों का भक्ति आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा। ऐसा माना जाता है कि 120 वर्ष की आयु में 1137 ई. में तमिलनाडु के श्रीरंगम में इनका निधन हो गया।

विशिष्टाद्वैत

  • मध्यकालीन विभूति रामानुजाचार्य ने बौद्धिक आधार पर आदिशंकराचार्य के ‘अद्वैतवाद’ को कड़ी चुनौती दी तथा ‘विशिष्टाद्वैतवाद’ का प्रतिपादन किया। इसमें तीन तत्त्वों यथा– ईश्वर (ब्रह्म),जीव (आत्मा) तथा प्रकृति को नित्य माना गया है।
  • इस मत के अनुसार, यद्यपि जगत् और जीवात्मा दोनों ब्रह्म से भिन्न हैं, तथापि वे ब्रह्म से ही उद्भूत हैं और वे ब्रह्म से उसी प्रकार संबद्ध हैं, जैसे सूर्य से उसकी किरणें संबद्ध होती हैं। अतः ब्रह्म एक होने पर भी अनेक है।
  • इसके अंतर्गत आदिशंकराचार्य के मायावाद का खंडन किया गया है। शंकराचार्य ने ‘जगत को माया’ करार देते हुए इसे मिथ्या बताया है। लेकिन रामानुज के अनुसार, जगत का निर्माण भी ब्रह्म ने ही किया है, अतः यह मिथ्या नहीं हो सकता है। उनके अनुसार, माया का अर्थ ईश्वर की अद्भुत रचना-शक्ति से तथा अविद्या का अर्थ जीव की अज्ञानता से है। रामानुज ने शंकराचार्य के मायावाद का खंडन करने के लिये सात तर्क दिये हैं, जिन्हें ‘सप्तानुपत्ति’ कहा जाता है।
  • रामानुज ‘ज्ञान को द्रव्य’ मानते हैं तथा इसकी प्राप्ति के तीन सधान – प्रत्यक्ष, अनुमान व शब्द – बताते हैं। विशिष्टाद्वैत के ज्ञान विषयक विचारों में सबसे महत्त्वपूर्ण है– ‘सभी विज्ञान यथार्थ हैं।’
  • रामानुज के अनुसार, ब्रह्म या ईश्वर एक सगुण तत्त्व है। आत्मा तथा ब्रह्म में कुछ विशिष्ट अंतर हैं। आत्मा अणु है तथा ब्रह्म विभु (सर्वव्यापी) है। आत्मा के विपरीत, ब्रह्म पूर्ण तथा अनंत है, आत्मा ब्रह्म का अंश तथा उसी पर निर्भर है। जिस प्रकार अंश कभी पूर्ण नहीं हो सकता, गुण कभी द्रव्य नहीं हो सकता, ठीक उसी प्रकार आत्मा कभी ब्रह्म नहीं हो सकती है।
  • इस मत के अनुसार, जीवात्मा के तीन प्रकार– बद्ध आत्मा, मुक्तात्मा तथा नित्यात्मा हैं। ‘बद्ध आत्मा’ से तात्पर्य भौतिक जगत में विद्यमान शरीर-बद्ध जीव से, ‘मुक्तात्मा’ का तात्पर्य ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करने से तथा ‘नित्यात्मा’ का तात्पर्य ईश्वर के साथ बैकुंठ में निरंतर उनकी सेवा में लीन रहने से है। इनका पुनर्जन्म नहीं होता है।
  • रामानुज के दर्शन में तीसरा तत्त्व ‘प्रकृति’ है, जो जड़ अथवा अचेतन है। यह ज्ञानरहित तथा विकारी द्रव्य है। प्रकृति रूपी बीज से तथा जीवात्माओं के पूर्व संचित कर्मों से ईश्वर संसार की रचना करता है। ‘सत्व, रज तथा तम’ प्रकृति के तीन गुण हैं और सभी सांसारिक वस्तुओं में इन तीनों गुणों का मिश्रण होता है।
  • रामानुज ने भक्ति को मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन बताया है, जो सभी के लिये सदैव सुलभ है। इनके अनुसार, मोक्ष की अवस्था में आत्मा का परमात्मा (ब्रह्म) में विलय नहीं होता, अपितु वह ब्रह्म के सदृश (ब्रह्मप्रकार) हो जाता है।
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