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बैक्टीरिया की मदद से डिज़ाइनर प्रोटीन का निर्माण

संदर्भ

  • हाल के शोध में वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया की प्राकृतिक प्रोटीन निर्माण प्रणाली का उपयोग करते हुए विशेष प्रकार के प्रोटीन बनाने की एक अभिनव तकनीक विकसित की है। इस तकनीक में बैक्टीरिया की कोशिका झिल्ली पर स्थित पोषक तत्व प्रवेश द्वार (ट्रांसपोर्टर) को इस प्रकार संशोधित किया गया कि वह कृत्रिम अमीनो अम्लों को कोशिका के भीतर पहुँचा सके। इन कृत्रिम अमीनो अम्लों की सहायता से ऐसे प्रोटीन बनाए जा सकते हैं जिनमें नई कार्यात्मक विशेषताएँ मौजूद हों।
  • यह शोध स्विट्ज़रलैंड के ईटीएच ज्यूरिख और जर्मनी के म्यूनिख तकनीकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया तथा इसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में प्रकाशित किया गया।

प्रोटीन और अमीनो अम्ल : पृष्ठभूमि 

  • सभी जीवित प्राणियों के प्रोटीन मूलतः 20 प्राकृतिक अमीनो अम्लों के विभिन्न संयोजनों से बनते हैं। हालाँकि, प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक हजारों प्रकार के कृत्रिम अमीनो अम्ल तैयार कर चुके हैं जिनके गुण प्राकृतिक अमीनो अम्लों से भिन्न और कभी-कभी बिल्कुल नए होते हैं।
  • उदाहरण के लिए p-azido-L-phenylalanine नामक कृत्रिम अमीनो अम्ल को यदि किसी प्रोटीन में जोड़ा जाए तो वैज्ञानिक उस प्रोटीन के किसी विशेष स्थान पर दवा को सटीक रूप से जोड़ सकते हैं। इससे रोग उपचार की नई संभावनाएँ खुलती हैं, जैसे लक्षित औषधि वितरण (Targeted Drug Delivery)।

मुख्य चुनौती : कृत्रिम अमीनो अम्लों को कोशिका में पहुँचाना 

  • यद्यपि वैज्ञानिकों ने प्रोटीन निर्माण की मशीनरी को कृत्रिम अमीनो अम्लों का उपयोग करने के लिए काफी हद तक अनुकूलित कर लिया है किंतु सबसे बड़ी समस्या यह रही कि इन अमीनो अम्लों को कोशिका के अंदर पर्याप्त मात्रा में पहुँचाया कैसे जाए।
  • अधिकांश कृत्रिम अमीनो अम्ल कोशिका झिल्ली को पार करके कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) तक पहुँचने में असमर्थ होते हैं जबकि यहीं राइबोसोम प्रोटीन का निर्माण करते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि इन अमीनो अम्लों की पार्श्व श्रृंखलाएँ पानी को आकर्षित करती हैं जबकि कोशिका झिल्ली का आंतरिक भाग जल को प्रतिकर्षित करता है।

समस्या से निपटने के लिए पहले तीन प्रमुख तरीके अपनाए गए थे—

  • अधिक मात्रा में कृत्रिम अमीनो अम्ल जोड़ना, ताकि वे निष्क्रिय रूप से झिल्ली पार कर सकें।
  • झिल्ली प्रोटीन को इंजीनियर करना, जिससे वे छोटे पेप्टाइड को कोशिका के अंदर ले जाएँ और बाद में उन्हें अमीनो अम्लों में तोड़ा जा सके।
  • कोशिकीय चयापचय मार्गों को बदलना, ताकि कोशिका स्वयं कृत्रिम अमीनो अम्ल बना सके।
  • हालाँकि, इन तरीकों से कुछ सफलता मिली किंतु ये सीमित प्रकार के अमीनो अम्लों तक ही प्रभावी रहे और व्यापक रूप से लागू नहीं किए जा सके।

नए अध्ययन का दृष्टिकोण 

  • नवीन शोध में वैज्ञानिकों ने उस विशिष्ट अणु की पहचान की जो पेप्टाइड को कोशिका के भीतर पहुँचाता है। जब इस ट्रांसपोर्टर प्रणाली को निष्क्रिय कर दिया गया तो कोशिका पेप्टाइड से जुड़े कृत्रिम अमीनो अम्लों का उपयोग लगभग बंद कर देती थी। इससे स्पष्ट हुआ कि यही प्रणाली इन अणुओं को कोशिका के भीतर लाने में मुख्य भूमिका निभाती है।
  • कोशिका के भीतर पहुँचने के बाद प्राकृतिक पेप्टाइड-विभाजक एंजाइम इन पेप्टाइड्स को अलग-अलग अमीनो अम्लों में तोड़ देते हैं जिससे कृत्रिम अमीनो अम्ल राइबोसोम के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। 

बैक्टीरिया में इंजीनियरिंग : एक उन्नत प्रणाली 

  • वैज्ञानिकों ने इस विचार को अधिक विकसित किया। उन्होंने बैक्टीरिया Escherichia coli में ABC ट्रांसपोर्टर नामक झिल्ली प्रोटीन को निर्देशित विकास (Directed Evolution) की तकनीक से संशोधित किया।
  • सामान्यतः यह ट्रांसपोर्टर ट्राइपेप्टाइड (तीन अमीनों अम्ल) और टेट्रापेप्टाइड (चार अमीनो अम्ल) को पोषक तत्व के रूप में कोशिका में प्रवेश कराता है। शोधकर्ताओं ने ऐसे पेप्टाइड डिज़ाइन किए जिनमें दो प्राकृतिक अमीनो अम्लों के बीच एक कृत्रिम अमीनो अम्ल छिपा दिया गया। परिणामस्वरूप ट्रांसपोर्टर इन्हें सामान्य पोषक तत्व समझकर कोशिका के अंदर ले गया।
  • कोशिका के भीतर पहुँचने के बाद एंजाइमों ने पेप्टाइड को तोड़ दिया और कृत्रिम अमीनो अम्ल मुक्त हो गए, जिन्हें राइबोसोम ने नए प्रोटीन बनाने में प्रयोग किया।
  • शोधकर्ताओं ने ट्रांसपोर्टर के उन अमीनो अम्ल अवशेषों की पहचान की जो कार्गो अणु से जुड़ते हैं और उनमें परिवर्तन करके ऐसे उत्परिवर्ती संस्करण तैयार किए जो सामान्य ट्रांसपोर्टर की तुलना में लगभग दस गुना अधिक मात्रा में कृत्रिम अमीनो अम्ल ग्रहण कर सकते थे।

प्रयोगशाला उपयोग के लिए अधिक व्यावहारिक प्रणाली

  • प्रयोगशाला में उपयोग किए जाने वाले पोषक माध्यमों में पहले से ही अनेक प्राकृतिक पेप्टाइड मौजूद रहते हैं जो ट्रांसपोर्टर के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। इस समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने ट्रांसपोर्टर को कई चरणों में विकसित किया और उन जीवाणु कोशिकाओं का चयन किया जो कृत्रिम अमीनो अम्ल वाले पेप्टाइड को सबसे प्रभावी ढंग से अंदर ले जा सकती थीं।
  • इसके बाद इस उन्नत ट्रांसपोर्टर को सीधे बैक्टीरिया के जीनोम में शामिल कर दिया गया। इससे यह प्रणाली नियमित प्रयोगशाला परिस्थितियों में भी आसानी से कार्य करने लगी।

संभावित उपयोग

  • इस तकनीक से ऐसे डिज़ाइनर प्रोटीन बनाए जा सकते हैं जिनमें अतिरिक्त कार्यात्मक गुण हों। उदाहरण के लिए—
    • ऐसी एंटीबॉडी जो किसी विशेष स्थान पर दवा को जोड़कर लक्षित उपचार प्रदान कर सके।
    • ऐसे प्रोटीन जिनमें एक साथ दो अलग-अलग कृत्रिम अमीनो अम्ल शामिल हों, जिससे उनमें दो इंजीनियर विशेषताएँ मौजूद हों।
  • भविष्य में वैज्ञानिक इसी प्रकार की प्रणाली मानव कोशिकाओं में विकसित करने पर कार्य कर रहे हैं। यदि इसमें सफलता मिलती है तो कृत्रिम मानव-सदृश प्रोटीनों का उत्पादन संभव होगा जो नई प्रकार की चिकित्सीय दवाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

निष्कर्ष

यह शोध जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है। बैक्टीरिया की प्राकृतिक पोषक परिवहन प्रणाली को संशोधित कर कृत्रिम अमीनो अम्लों को कोशिका के भीतर पहुँचाने की यह तकनीक भविष्य में उन्नत दवाओं, लक्षित उपचार व जटिल रासायनिक यौगिकों के उत्पादन के नए मार्ग खोल सकती है। https://www.sanskritiias.com/uploaded_files/images/Designer_Protein.jpg

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