1 फरवरी, 2026 को वित्त मंत्रालय द्वारा जारी सोलहवें वित्त आयोग के व्याख्यात्मक ज्ञापन को केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज के रूप में नहीं देखा जा सकता है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें किन प्रस्तावों को स्वीकार किया गया है और किन मुद्दों को टाल दिया गया है क्योंकि दोनों से सरकार की राजकोषीय प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती हैं।
केंद्र सरकार ने सोलहवें वित्त आयोग (FC-16) की कई प्रमुख सिफारिशों को स्वीकार किया है। इनमें राज्यों के लिए विभाज्य कर पूल में 41% हिस्सेदारी, राज्यों के बीच संसाधन वितरण के लिए क्षैतिज सूत्र, स्थानीय निकायों को अनुदान तथा आपदा प्रबंधन कोष से जुड़ी सिफारिशें शामिल हैं।
हालाँकि, कुछ महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधारों, जैसे- राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून में संशोधन, बजट से बाहर के उधारों पर नियंत्रण, विद्युत वितरण कंपनियों में सुधार और सब्सिडी के तर्कसंगतकरण को फिलहाल आगे के विचार के लिए टाल दिया गया है। यह केवल नौकरशाही सतर्कता नहीं है बल्कि एक प्रकार का नीतिगत समझौता प्रतीत होता है।
41% हिस्सेदारी का वास्तविक अर्थ
पहली दृष्टि में राज्यों के लिए 41% हिस्सेदारी बनाए रखना निरंतरता का संकेत देता है। परंतु यह समझना आवश्यक है कि यह हिस्सा सकल कर राजस्व का नहीं बल्कि विभाज्य कर पूल का होता है।
वास्तव में उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) जैसे कर, जिन्हें केंद्र सरकार पूर्ण रूप से अपने पास रखती है, इस विभाज्य पूल में शामिल नहीं होते हैं। विगत वर्षों में इनका अनुपात लगातार बढ़ा है जिससे राज्यों के हिस्से का वास्तविक आधार घटता गया है।
सोलहवेंवित्तआयोगकीरिपोर्टकेअनुसार,
तेरहवें वित्त आयोग की अवधि में विभाज्य पूल, सकल कर राजस्व का औसतन 89.2% था।
चौदहवें वित्त आयोग के दौरान यह घटकर 82.1% रह गया।
पंद्रहवें वित्त आयोग के समय यह और कम होकर 78.3% हो गया।
इस प्रकार 41% हिस्सेदारी एक घटते हुए आधार पर निर्धारित की जा रही है जिससे राज्यों को मिलने वाला वास्तविक संसाधन अपेक्षाकृत कम हो जाता है।
अनुदानों की संरचना में परिवर्तन
16वें वित्त आयोग ने कुछ ऐसे अनुदानों को समाप्त कर दिया है जो पहले राज्यों को लक्षित वित्तीय सहायता प्रदान करते थे। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
राजस्व घाटा अनुदान
क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान
राज्य-विशिष्ट अनुदान
आयोग का अनुमान है कि संयुक्त सामान्य सरकारी ऋण 2026-27 में जी.डी.पी. के 77.3% से घटकर 2030-31 तक 73.1% रह जाएगा। कागज़ पर यह परिदृश्य संतुलित दिखाई देता है किंतु वास्तविक बहस तब उभरती है जब राज्य वित्त की आंतरिक स्थितियों को देखा जाए।
संरचनात्मक समस्याओं को टालना
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कई वित्तीय कमजोरियों की पहचान की है परंतु उन्हें सुधारने के लिए कोई बाध्यकारी तंत्र नहीं दिया गया।
विशेष रूप से जून 2022 में समाप्त हुए जी.एस.टी. मुआवजा तंत्र ने राज्यों के लिए एक नई चुनौती पैदा की है। पहले राज्यों को SGST राजस्व में 14% वार्षिक वृद्धि की गारंटी प्राप्त थी, लेकिन अब इसके स्थान पर कोई स्थायी व्यवस्था नहीं की गई है।
उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु को 2024-25 में लगभग ₹20,000 करोड़ के संभावित राजस्व अंतर का अनुमान है। आयोग ने कुल SGST वृद्धि को सुधार का संकेत माना है परंतु राज्यों के बीच असमान प्रभाव अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ है।
बजट से बाहर उधार और राजकोषीय नियम
एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा बजट से बाहर उधार (Off-Budget Borrowing) का है। कई राज्य सरकारें अपने नियंत्रण वाले सार्वजनिक उपक्रमों या संस्थाओं के माध्यम से ऋण लेती हैं और बाद में उनका भुगतान बजट से करती हैं। इससे वास्तविक ऋण और घाटे की स्थिति आधिकारिक आंकड़ों में स्पष्ट नहीं हो पाती।
वित्त आयोग ने सुझाव दिया कि इस प्रथा को समाप्त किया जाए और राजकोषीय उत्तरदायित्व विधायी ढाँचे में सुधार किया जाए।
हालाँकि, व्याख्यात्मक ज्ञापन में यह कहा गया है कि इन विषयों—जैसे ऑफ-बजट उधार नियंत्रण, राजकोषीय नियमों में संशोधन और केंद्र के राजकोषीय घाटे की रूपरेखा—पर अलग से विचार किया जाएगा। भारतीय वित्तीय प्रशासन की भाषा में इसका अर्थ प्रायः यही होता है कि यह निर्णय अभी के लिए टाल दिया गया है।
राज्यों की वित्तीय स्थिति के कुछ उदाहरण
वित्त आयोग के अंतर-राज्यीय आंकड़े कई राज्यों की वित्तीय स्थिति को स्पष्ट करते हैं:
पंजाब का ऋण-से-GSDP अनुपात 2023-24 में 42.9% था, जबकि राजस्व घाटा GSDP का 3.7% रहा।
राजस्थान की बकाया देनदारियाँ 37.9% GSDP थीं।
पश्चिम बंगाल में यह अनुपात 38.3% था।
आंध्र प्रदेश में यह लगभग 34.6% रहा।
इन सभी राज्यों में राजकोषीय नियम मौजूद हैं परंतु आयोग के अनुसार उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हुआ है।
क्षैतिज वितरण सूत्र में महत्वपूर्ण बदलाव
संसाधन वितरण की व्यवस्था में भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया है।
पंद्रहवें वित्त आयोग के समय राज्यों को कर एवं राजकोषीय प्रयास के आधार पर 2.5% भार दिया जाता था, जिससे वे अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप अधिक कर संग्रह के लिए प्रेरित होते थे।
सोलहवें वित्त आयोग ने इसके स्थान पर राष्ट्रीय जीडीपी में राज्य के योगदान को नया मानदंड बनाया है और इसे 10% भारांश दिया है। यह राज्य के GSDP के वर्गमूल के आधार पर मापा जाता है।
इस बदलाव से महाराष्ट्र, गुजरात एवं कर्नाटक जैसे बड़े और उच्च आय वाले राज्यों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलता है, जबकि बिहार, झारखंड व उत्तर प्रदेश जैसे कम आय वाले राज्यों को इससे सीमित लाभ मिल सकता है। इस प्रकार यह परिवर्तन समता की पारंपरिक अवधारणा से हटकर आर्थिक आकार को अधिक महत्व देता है।
स्थानीय निकाय अनुदान की शर्तें
स्थानीय निकायों के लिए लगभग ₹7,91,493 करोड़ के अनुदान की सिफारिश की गई है। इसे दो भागों में विभाजित किया गया है—
मूल (Basic) अनुदान
प्रदर्शन आधारित (Performance) अनुदान
इन अनुदानों को प्राप्त करने के लिए कई शर्तें निर्धारित की गई हैं, जैसे—
स्थानीय निकायों का विधिवत गठन
लेखा-परीक्षित वित्तीय विवरण
राज्य वित्त आयोगों का समय पर गठन
स्वयं के राजस्व संग्रह के मानक
ये शर्तें सिद्धांततः उचित हैं परंतु कमजोर प्रशासनिक क्षमता वाले राज्यों के लिए इन्हें पूरा करना कठिन हो सकता है। पंद्रहवें वित्त आयोग की अवधि में इसका उदाहरण देखने को मिला, जब शहरी स्थानीय निकायों को अनुशंसित राशि का केवल 62.6% ही प्राप्त हुआ।
निष्कर्ष
सोलहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट और वित्त मंत्रालय के ज्ञापन को साथ पढ़ने पर एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है। केंद्र सरकार ने उन सिफारिशों को स्वीकार किया है जो बजटीय स्थिरता और पूर्वानुमान सुनिश्चित करती हैं—जैसे 41% हिस्सा और वितरण सूत्र।
इसके विपरीत, जिन मुद्दों के लिए संरचनात्मक सुधार, अधिकारों का पुनर्वितरण या राजकोषीय अनुशासन के कड़े उपाय आवश्यक थे, उन्हें फिलहाल टाल दिया गया है।
यह स्थिति उस समय उत्पन्न हुई है जब कई राज्यों की वित्तीय स्थिति पहले से ही दबाव में है। उदाहरण के लिए—
पंजाब में उधार का बड़ा हिस्सा वेतन और मौजूदा ऋण चुकाने में उपयोग हो रहा है।
आंध्र प्रदेश अभी भी राज्य पुनर्गठन से जुड़ी देनदारियों से जूझ रहा है।
राजस्थान का राजस्व घाटा लंबे समय से बना हुआ है।
इन परिस्थितियों में यदि संघीय वित्तीय ढाँचा आर्थिक क्षमता को वित्तीय आवश्यकता से अधिक महत्व देता है और संरचनात्मक सुधारों को लगातार टालता है, तो इससे केंद्र-राज्य असमानता अतिरिक्त रूप से गंभीर हो सकती है।
इसलिए दीर्घकालिक दृष्टि से भारत के राजकोषीय संघवाद को संतुलित एवं स्थिर बनाए रखने के लिए केवल संसाधन वितरण ही नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधारों पर भी गंभीरता से कार्य करना आवश्यक होगा।