संदर्भ
उत्तर भारत में अक्टूबर और नवंबर के दौरान वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर हो जाती है। दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के बिगड़ने के प्रमुख कारणों में वाहनों का धुआँ, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियाँ और मौसमी परिस्थितियों के साथ-साथ पराली जलाना भी शामिल है। हालाँकि, पराली जलाने की समस्या को केवल किसानों की लापरवाही के रूप में देखना उचित नहीं है। इसके पीछे कृषि नीतियों, आर्थिक प्रोत्साहनों, भूजल संकट और सीमित समय में अगली फसल बोने की आवश्यकता जैसे कई कारण हैं।
पराली जलाने के प्रमुख कारण
- पराली फसल कटाई के बाद खेतों में बचा हुआ अवशेष है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में धान की कटाई के बाद गेहूँ की बुवाई के लिए खेत जल्दी तैयार करना आवश्यक होता है। कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई के दौरान खेतों में बड़ी मात्रा में धान के ठूँठ और अवशेष रह जाते हैं। इन्हें हटाने में समय और धन खर्च होता है, इसलिए कई किसान पराली जलाने का विकल्प चुनते हैं।
- पंजाब संरक्षण उपमृदा जल अधिनियम, 2009 के तहत धान की रोपाई के समय को मानसून के अनुरूप करने के लिए प्रतिबंध लगाए गए। इससे धान की कटाई आगे खिसक गई और किसानों को अगली फसल की बुवाई के लिए अपेक्षाकृत कम समय मिलने लगा। अधिक अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्में, जैसे पूसा-44, इस समस्या को और बढ़ाती हैं।
- इसके अतिरिक्त, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सरकारी खरीद की व्यवस्था धान तथा गेहूँ की खेती को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाती है। इन फसलों की सुनिश्चित खरीद के कारण किसान वैकल्पिक फसलों की ओर जाने से हिचकते हैं। पंजाब और हरियाणा में कृषि के लिए सस्ती बिजली भी भूजल आधारित सिंचाई को प्रोत्साहित करती है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव
- पराली जलाने से सूक्ष्म कणों (PM2.5 और PM10), कार्बन मोनोऑक्साइड तथा अन्य हानिकारक प्रदूषकों का उत्सर्जन होता है। ये प्रदूषक हवा में धुएँ और स्मॉग की समस्या बढ़ाते हैं तथा श्वसन संबंधी बीमारियों, आँखों में जलन और हृदय संबंधी जोखिमों को बढ़ा सकते हैं।
- इसका प्रभाव केवल वायु गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। पराली जलाने से मिट्टी के उपयोगी सूक्ष्मजीव प्रभावित होते हैं तथा नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्त्वों की हानि होती है। मिट्टी की नमी और जैविक पदार्थों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने और उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ने की आशंका रहती है।
पराली प्रबंधन के तकनीकी विकल्प
पराली जलाने से बचने के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार के उपाय अपनाए जा सकते हैं।
1. खेत में ही प्रबंधन (इन-सीटू):
- हैप्पी सीडर, सुपर सीडर और रोटावेटर जैसी मशीनों की सहायता से पराली को खेत में मिलाया जा सकता है या उसके ऊपर से अगली फसल बोई जा सकती है। धान की कम अवधि वाली किस्मों और सीधी बुवाई की तकनीक को अपनाना भी उपयोगी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित पूसा डीकंपोजर पराली को खेत में ही विघटित करने का एक अन्य विकल्प है।
2. खेत से बाहर उपयोग (एक्स-सीटू):
- पराली का इस्तेमाल जैव-इथेनॉल, संपीड़ित बायोगैस (CBG), बायोमास आधारित ऊर्जा और अन्य औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है। इसके लिए पराली के संग्रह, परिवहन, भंडारण और प्रसंस्करण की मजबूत व्यवस्था जरूरी है।
इन विकल्पों के सामने मशीनों की लागत, समय पर उपलब्धता और पराली के परिवहन का खर्च जैसी चुनौतियाँ हैं। इसलिए किसानों को सस्ती मशीनें, कस्टम हायरिंग केंद्र और पराली की सुनिश्चित खरीद उपलब्ध कराना आवश्यक है।
सरकारी प्रयास और 2025 के आँकड़े
- केंद्र सरकार की फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में पराली प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।
- कृषि मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2018-19 से 28 फरवरी 2025 तक इस योजना के अंतर्गत राज्यों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) को कुल 3,698.45 करोड़ रुपये जारी किए गए। इस अवधि में 41,900 से अधिक कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित किए गए और किसानों तथा इन केंद्रों को 3.23 लाख से अधिक कृषि मशीनें उपलब्ध कराई गईं।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने वर्ष 2025 में पराली जलाने की निगरानी के लिए पंजाब के 18 और हरियाणा के 13 जिलों में 31 उड़न दस्ते तैनात किए।
- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 1 दिसंबर 2025 की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, धान कटाई के मौसम में पंजाब में पराली जलाने की 5,114 घटनाएँ दर्ज की गईं, जो 2024 की तुलना में 53 प्रतिशत और 2022 की तुलना में 90 प्रतिशत कम थीं। हरियाणा में 662 घटनाएँ दर्ज की गईं, जो 2024 से 53 प्रतिशत और 2022 से 81 प्रतिशत कम थीं। ये आँकड़े निगरानी व्यवस्था के अंतर्गत दर्ज आग की घटनाओं को दर्शाते हैं; इन्हें प्रभावित भूमि क्षेत्र या कुल उत्सर्जन में समान अनुपात की कमी नहीं माना जाना चाहिए।
समाधान: दंड के साथ आर्थिक प्रोत्साहन भी जरूरी
- पराली जलाने पर जुर्माना और निगरानी आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन केवल दंडात्मक कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। किसानों को ऐसी आर्थिक व्यवस्था चाहिए, जिसमें पराली का प्रबंधन करना जलाने की तुलना में अधिक लाभकारी हो।
- इसके लिए पराली की न्यूनतम खरीद कीमत निर्धारित करना, जैव-ऊर्जा संयंत्रों को प्रोत्साहन देना, मशीनों की उपलब्धता बढ़ाना और किसानों को वैकल्पिक फसलों के लिए आर्थिक सहायता देना जरूरी है। फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के साथ ऐसी खरीद व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें दलहन, तिलहन और अन्य कम पानी वाली फसलों के लिए भी बाजार तथा उचित मूल्य उपलब्ध हों।
- इसके अतिरिक्त, उपग्रह आधारित निगरानी में सुधार, शाम के समय खेतों की निगरानी और स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान भी प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
निष्कर्ष
- पराली जलाने की समस्या कृषि अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। इसका स्थायी समाधान किसानों को दोषी ठहराने के बजाय उनकी आर्थिक और व्यावहारिक समस्याओं को समझने में निहित है। तकनीकी सहायता, पराली का औद्योगिक उपयोग, फसल विविधीकरण और प्रभावी निगरानी को एकीकृत करके इस चुनौती से निपटा जा सकता है। किसानों के लिए लाभकारी विकल्प विकसित करना ही स्वच्छ हवा, सुरक्षित भूजल और टिकाऊ कृषि व्यवस्था की दिशा में सबसे प्रभावी कदम होगा।