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मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को आधिकारिक कार्यों के लिए आजीवन कानूनी छूट का मुद्दा

संदर्भ 

  • सुप्रीम कोर्ट में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को आधिकारिक कार्यों के लिए आजीवन कानूनी छूट देने के प्रावधान को चुनौती दी गई है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका ने संविधान के अनुच्छेद 14, कानून के समक्ष समानता और निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। वस्तुतः लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयोग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। आयोग के प्रमुख और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को बिना किसी दबाव के काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। हालांकि, क्या इस स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें आधिकारिक कार्यों के संबंध में आजीवन कानूनी छूट देना उचित है? यही सवाल अब न्यायिक बहस का विषय बन गया है।  
  • सुप्रीम कोर्ट ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से दायर याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (ECs) को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए दी गई कानूनी छूट को चुनौती दी गई है। 

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को मिली छूट क्या है? 

  • दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16 इस विवाद के केंद्र में है। 
  • इस प्रावधान के अनुसार, किसी वर्तमान या पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए या किए जाने का दावा किए गए कार्यों के संबंध में कोई अदालत दीवानी या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार नहीं कर सकती और न ही उसे जारी रख सकती है। 
  • इस प्रावधान का उद्देश्य निर्वाचन आयुक्तों को अपने कर्तव्यों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन करने में सक्षम बनाना बताया गया था। हालांकि, इसके दायरे और आजीवन लागू रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेही को पूरी तरह सीमित करना उचित नहीं है। 

संविधान का अनुच्छेद 14 

  • संविधान का अनुच्छेद 14 प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। यह मौलिक अधिकार संविधान की मूल संरचना से भी जुड़ा है। 
  • कानून के समक्ष समानता की अवधारणा ब्रिटिश विधिवेत्ता ए.वी. डाइसी के प्रतिपादित 'विधि के शासन' यानी Rule of Law से संबंधित है। इसका मूल सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और सभी पर कानून समान रूप से लागू होना चाहिए। 
  • वहीं, कानूनों के समान संरक्षण का अर्थ है कि समान परिस्थितियों में व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाए। हालांकि, संविधान उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट और तर्कसंगत आधार होना चाहिए। वर्गीकरण मनमाना नहीं होना चाहिए और उसका संबंधित कानून के उद्देश्य से उचित संबंध होना आवश्यक है। 
  • ऐसे में सवाल उठता है कि क्या निर्वाचन आयुक्तों को आजीवन कानूनी छूट देना एक उचित वर्गीकरण है या इससे जवाबदेही और समानता के सिद्धांत प्रभावित हो सकते हैं? 

राष्ट्रपति और राज्यपालों को भी मिलती है संवैधानिक छूट 

  • भारतीय संविधान कुछ उच्च संवैधानिक पदों के लिए विशेष छूट का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों को उनके पद पर रहने के दौरान कुछ कानूनी संरक्षण प्राप्त हैं। 
  • इसके तहत उनके कार्यकाल के दौरान उनके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती और उनकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए कोई प्रक्रिया जारी नहीं की जा सकती। कुछ व्यक्तिगत कृत्यों से संबंधित दीवानी कार्यवाही शुरू करने के लिए दो महीने का नोटिस देना आवश्यक है। 
  • हालांकि, राष्ट्रपति और राज्यपालों को मिलने वाली यह छूट उनके पद पर रहने की अवधि तक सीमित है। इसके विपरीत, निर्वाचन आयुक्तों को आधिकारिक कर्तव्यों के संबंध में दी गई छूट उनके पद से हटने या सेवानिवृत्त होने के बाद भी लागू रहती है। 
  • संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों को भी संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के तहत विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इनमें सदन के भीतर भाषण और मतदान से संबंधित संरक्षण शामिल हैं। इसी तरह, राजनयिकों को वियना कन्वेंशन के तहत कुछ परिस्थितियों में दीवानी और आपराधिक क्षेत्राधिकार से छूट मिलती है।
  • हालांकि, इन सभी छूटों का आधार और दायरा अलग-अलग है। इसलिए इनकी तुलना निर्वाचन आयुक्तों को दिए गए संरक्षण से करते समय संबंधित संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखना जरूरी है। 

आजीवन छूट पर क्यों उठ रहे हैं सवाल? 

  • इस प्रावधान को लेकर एक प्रमुख सवाल यह है कि इसे मूल विधेयक में शामिल नहीं किया गया था। इसे राज्यसभा में विधेयक पारित होने के दिन संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया। इसके बाद लोकसभा ने विधेयक को मंजूरी दी और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह कानून बन गया। 
  • केंद्रीय कानून मंत्री ने संशोधन पेश करते समय कहा था कि इसका उद्देश्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को स्वतंत्र एवं निर्बाध रूप से काम करने में सक्षम बनाना है।
  • हालांकि, आलोचकों का कहना है कि निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के बीच संतुलन होना चाहिए। यदि किसी अधिकारी के आधिकारिक कार्यों के संबंध में कानूनी कार्यवाही पर व्यापक रोक लगा दी जाती है, तो इससे जवाबदेही से जुड़े सवाल पैदा हो सकते हैं। 

अन्य संवैधानिक संस्थाओं के लिए व्यवस्था 

  • देश में कई अन्य संवैधानिक और वैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। इनमें न्यायपालिका, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), लोक सेवा आयोग, लोकपाल, लोकायुक्त और सूचना आयोग शामिल हैं।
  • इन संस्थाओं के पदाधिकारियों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए निर्वाचन आयुक्तों जैसी आजीवन और बिना शर्त वाली व्यापक छूट प्राप्त नहीं है। इसके अलावा, निर्वाचन आयुक्तों की सेवा शर्तों से संबंधित वर्ष 1991 के पुराने कानून में भी ऐसा प्रावधान नहीं था। 
  • याचिका के संदर्भ में यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह सवाल उठता है कि निर्वाचन आयुक्तों के लिए इस प्रकार का विशेष संरक्षण क्यों आवश्यक है और क्या इसका दायरा उचित है। 

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन जरूरी 

  • निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य है। चुनाव से जुड़े फैसले लेते समय आयोग के अधिकारियों को राजनीतिक दबाव और अनुचित हस्तक्षेप से मुक्त रहना चाहिए। दूसरी ओर, किसी भी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता उसकी जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी निर्भर करती है। 
  • इसलिए चुनौती यह है कि अधिकारियों को ईमानदारी से काम करने के लिए पर्याप्त कानूनी संरक्षण मिले, लेकिन किसी संभावित गलत कार्य के लिए जवाबदेही का रास्ता पूरी तरह बंद न हो। 

निष्कर्षतः, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को आजीवन कानूनी छूट देने का विवाद केवल एक कानूनी प्रावधान तक सीमित नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, विधि के शासन, निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और सार्वजनिक पदों पर जवाबदेही के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण सवाल है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि ऐसे संरक्षण की संवैधानिक सीमाएं क्या होनी चाहिए।  

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