जलवायु नीति में बदलाव की जरूरत

संदर्भ  

दुनिया में ऊर्जा की बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन के बीच संतुलन बनाना आज एक बड़ी चुनौती है। विद्युतीकरण की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान ने जलवायु नीति पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत पैदा की है। अब चर्चा केवल कोयले और जीवाश्म ईंधनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह भी देखना होगा कि अलग-अलग देश अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करते हुए नागरिकों का जीवन-स्तर कैसे सुधार सकते हैं।  

वैश्विक जलवायु नीति में बदलाव की आवश्यकता  

  • अब तक अंतर्राष्ट्रीय जलवायु चर्चाओं में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन, वैज्ञानिक मॉडलों और वैश्विक समझौतों पर अधिक जोर दिया गया है। हालांकि, इस दृष्टिकोण में अलग-अलग देशों की आर्थिक परिस्थितियों और ऊर्जा जरूरतों को पर्याप्त महत्व नहीं मिलने की आलोचना होती रही है। 
  • जलवायु नीति का ध्यान केवल उत्पादन से होने वाले उत्सर्जन के बजाय उपभोग के तरीकों और राष्ट्रीय ऊर्जा उपयोग पर भी केंद्रित होना चाहिए। जी-7 देशों के प्रभाव से आगे बढ़कर विकासशील देशों की जरूरतों को जगह देना जरूरी है। वास्तविक सहयोग के लिए ऐसा ढांचा चाहिए, जो वैश्विक लक्ष्यों के साथ राष्ट्रीय परिस्थितियों को भी महत्व दे।  

वैश्विक सहमति की सीमाएं और विकासशील देशों की चुनौती 

  • पिछले 35 वर्षों की जलवायु वार्ताओं में पश्चिमी देशों के विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं के माध्यम से वैज्ञानिक रिपोर्टें, वैश्विक अनुमान और अंतर्राष्ट्रीय नियम तैयार किए गए। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि इस प्रक्रिया में वैश्विक दक्षिण के देशों की विकास संबंधी जरूरतों को पर्याप्त महत्व नहीं मिला। 
  • भारत जैसे देशों को औद्योगीकरण, शहरीकरण और नागरिकों का जीवन-स्तर सुधारने के लिए अधिक ऊर्जा चाहिए। इसके साथ ही उत्सर्जन कम करना भी जरूरी है। इस चुनौती से निपटने के लिए विकसित देशों की ओर से वित्तीय सहायता और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण महत्वपूर्ण हैं। केवल बैठकें और घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं; प्रतिबद्धताओं को जमीन पर लागू करना भी जरूरी है। 

अमेरिका की नीति और ऊर्जा परिवर्तन 

  • 20 जनवरी, 2025 को जारी अमेरिकी कार्यकारी आदेश में अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण समझौतों से जुड़े मामलों में आर्थिक दक्षता, अमेरिकी समृद्धि, उपभोक्ता की पसंद और सरकारी खर्च में संयम को प्राथमिकता देने की बात कही गई। यह दिखाता है कि ऊर्जा नीति में आर्थिक हित और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताएं किस तरह एक-दूसरे से जुड़ी हैं। 
  • विकासशील देशों की चुनौती इससे अलग है। उनके लिए ऊर्जा तक पहुंच, गरीबी कम करना और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है। इसलिए वैश्विक जलवायु नीति बनाते समय सभी देशों की परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।  

चीन का मॉडल: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और विद्युतीकरण

  • चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और प्रमुख विनिर्माण शक्ति है। उसने सौर और पवन ऊर्जा के विस्तार के साथ बिजली से चलने वाले वाहनों को भी बढ़ावा दिया है।
  • उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, चीन ने 2025 में बाकी सभी देशों को मिलाकर स्थापित की गई पवन टर्बाइनों और सौर पैनलों से अधिक क्षमता जोड़ी। उसकी नई स्थापित क्षमता अमेरिका की तुलना में लगभग दस गुना बताई गई है। इसी रुझान के जारी रहने पर 2030 तक चीन के बिजली उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से आने की संभावना है।
  • वर्ष 2025 की पहली छमाही में चीन में लगभग 56.2 लाख नए ऊर्जा वाहनों का पंजीकरण हुआ। ये आंकड़े स्वच्छ ऊर्जा और परिवहन के विद्युतीकरण में चीन की प्रगति को दर्शाते हैं।
  • हालांकि, सौर और पवन ऊर्जा सस्ती होने भर से ऊर्जा परिवर्तन पूरा नहीं होगा। इन स्रोतों की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव रहता है। इसलिए बिजली ग्रिड का आधुनिकीकरण, ऊर्जा भंडारण और सरकार की रणनीतिक योजना भी आवश्यक हैं।  

भारत और चीन के लिए ऊर्जा का कुशल उपयोग 

  • भारत और चीन जैसे देशों के लिए चुनौती केवल अधिक ऊर्जा पैदा करना नहीं, बल्कि उसका कुशल उपयोग सुनिश्चित करना भी है। परिवहन में आंतरिक दहन इंजन के विकल्प के रूप में बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देना और ऊर्जा की नई मांग को सौर, पवन तथा जलविद्युत से पूरा करना महत्वपूर्ण कदम हैं।
  • इसके लिए आधुनिक बिजली वितरण व्यवस्था, ऊर्जा भंडारण और विश्वसनीय आपूर्ति में निवेश करना होगा। साथ ही, विकासशील देशों को अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए व्यावहारिक और किफायती विकल्प उपलब्ध होने चाहिए।

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक सामाजिक बदलाव 

  • जलवायु नीति में शहरीकरण, जनसंख्या की उम्र और उपभोग के बदलते तरीकों को भी शामिल करना जरूरी है। उभरते देश कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम ऊर्जा का इस्तेमाल करके जीवन-स्तर सुधारने के नए तरीके अपना रहे हैं। विद्युतीकरण से परिवहन और उद्योगों में ऊर्जा उपयोग का स्वरूप बदल रहा है। 
  • इसके बावजूद, वैश्विक उत्सर्जन मॉडलों में इन बदलावों को पर्याप्त महत्व नहीं मिलने की आलोचना की जाती है। राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार नीतियां बनाने से जलवायु लक्ष्यों को विकास की जरूरतों के साथ बेहतर तरीके से जोड़ा जा सकता है। 

जलवायु वित्त और आपदा प्रबंधन 

  • बाढ़, सूखा, चक्रवात और गर्मी की लहरों जैसी चरम मौसमी घटनाओं का असर विकासशील देशों पर गंभीर हो सकता है। कई देशों में बीमा सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के संसाधन सीमित हैं। इसलिए विकसित देशों की जलवायु वित्त संबंधी प्रतिबद्धताओं को प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी है।  
  • इसके अलावा, वैश्विक प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना, मौसम संबंधी जानकारी साझा करना और आपदा राहत में क्षेत्रीय तकनीकी सहयोग बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए जलवायु न्याय का महत्व 

  • भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उपलब्ध कराए गए संदर्भ के अनुसार, उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत का लगभग आधा है। भारत स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और परिवहन के विद्युतीकरण को बढ़ावा देकर आर्थिक विकास तथा उत्सर्जन में कमी के बीच संतुलन बना सकता है। 
  • जलवायु न्याय की मांग है कि विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारियों और विकासशील देशों की ऊर्जा जरूरतों को उचित महत्व दिया जाए। भारत अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ऐसी नीतियों की वकालत कर सकता है, जो वित्तीय सहायता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और स्वच्छ ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करें। 

निष्कर्ष 

  • जलवायु नीति को प्रभावी बनाने के लिए वैश्विक उत्सर्जन घटाने के साथ राष्ट्रीय ऊर्जा जरूरतों और विकास की चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा। चीन का अनुभव स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार की संभावनाएं दिखाता है, जबकि भारत के सामने आर्थिक विकास और जलवायु न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने का अवसर है। वास्तविक समाधान तभी संभव है, जब वैश्विक सहयोग के साथ देशों की परिस्थितियों को समझते हुए व्यावहारिक कदम उठाए जाएं। 
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