संदर्भ
- प्रकृति और मानव जीवन का संबंध बेहद गहरा है। पृथ्वी पर जीवन का संतुलन बनाए रखने में जैव विविधता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वन, घास के मैदान, आर्द्रभूमि और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र न केवल विभिन्न जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों को आश्रय देते हैं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता और जलवायु संतुलन बनाए रखने में भी योगदान देते हैं। जैव विविधता के इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए बायोस्फीयर रिजर्व की अवधारणा विकसित की गई है। इनका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने के साथ-साथ उनके सतत उपयोग और स्थानीय समुदायों के विकास को प्रोत्साहित करना है।
- इसी उद्देश्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रत्येक वर्ष 3 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बायोस्फीयर रिजर्व दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को द्वारा घोषित यह दिवस जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और सतत विकास में बायोस्फीयर रिजर्व के योगदान को रेखांकित करता है।
जैव विविधता और बायोस्फीयर रिजर्व
- जैव विविधता से आशय पृथ्वी के स्थलीय, समुद्री और अन्य जलीय पारिस्थितिकी तंत्रों में पाए जाने वाले जीवों की विविधता से है। कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (CBD) के अनुसार, इसके तीन प्रमुख स्तर हैं:
- आनुवंशिक विविधता: एक ही प्रजाति के जीवों में पाई जाने वाली आनुवंशिक भिन्नताएं, जैसे चावल की अलग-अलग किस्में।
- प्रजातीय विविधता: किसी विशेष क्षेत्र में मौजूद विभिन्न प्रजातियां, जैसे जंगल में बाघ, हाथी और ऑर्किड।
- पारिस्थितिकी तंत्र विविधता: वन, घास के मैदान, आर्द्रभूमि और कोरल रीफ जैसे विभिन्न प्राकृतिक आवासों की विविधता।
- वहीं, बायोस्फीयर रिजर्व ऐसे प्राकृतिक क्षेत्र हैं, जिन्हें जैव विविधता के संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय सरकारों द्वारा नामित किया जाता है। ये क्षेत्र प्राकृतिक आवासों की रक्षा करने के साथ-साथ पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करते हैं।
- भारत जैसे जैव विविधता संपन्न देश के लिए इनका महत्व और भी अधिक है। विश्व के 17 सर्वाधिक जैव विविधता वाले देशों में शामिल भारत में दुनिया की कुल दर्ज प्रजातियों का लगभग 7-8 प्रतिशत हिस्सा पाया जाता है, जबकि वैश्विक भू-भाग में देश की हिस्सेदारी केवल 2.4 प्रतिशत है।
बायोस्फीयर रिजर्व की अवधारणा
- बायोस्फीयर रिजर्व की अवधारणा संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने पर आधारित है। वर्ष 1971 में शुरू किया गया यूनेस्को का 'मैन एंड द बायोस्फीयर' (MAB) कार्यक्रम मानव और पर्यावरण के बीच बेहतर संबंध विकसित करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
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क्या आप जानते हैं?
- यूनेस्को के विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क में 145 देशों के कुल 797 बायोस्फीयर रिजर्व शामिल हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 300 मिलियन लोगों को इनसे प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। इनका प्राकृतिक महत्व इनके भौगोलिक दायरे से कहीं अधिक व्यापक है।
- बायोस्फीयर रिजर्व पृथ्वी के कुल स्थलीय क्षेत्रफल के लगभग 5 प्रतिशत हिस्से में फैले हैं, लेकिन इनमें कशेरुकी प्रजातियों (विश्व की रीढ़ की हड्डी वाले जीवों की प्रजातियों) की 60 प्रतिशत से अधिक विविधता पाई जाती है।
- विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क के मानचित्र 2025-26 के अनुसार, वर्ष 2050 तक लगभग 40 प्रतिशत बायोस्फीयर रिजर्व को जलवायु संबंधी अधिक गंभीर घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, 50 प्रतिशत से अधिक बायोस्फीयर रिजर्व किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त क्षेत्र के अंतर्गत भी आते हैं।
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बायोस्फीयर रिजर्व के उद्देश्य
बायोस्फीयर रिजर्व सतत विकास से जुड़ी गतिविधियों के परीक्षण और प्रदर्शन के लिए जीवंत प्रयोगशालाओं की तरह काम करते हैं। इनके तीन प्रमुख उद्देश्य हैं:
- संरक्षण: जैव विविधता, आनुवंशिक संसाधनों, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक भू-दृश्यों के साथ उनसे जुड़ी सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करना।
- सतत आर्थिक विकास: ऐसी आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा देना, जो पर्यावरणीय सीमाओं और स्थानीय समुदायों के सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप हों।
- वैज्ञानिक सहयोग: अनुसंधान, पर्यावरणीय निगरानी, शिक्षा, प्रशिक्षण और ज्ञान के आदान-प्रदान के माध्यम से संरक्षण प्रयासों को मजबूत करना।
बायोस्फीयर रिजर्व के तीन प्रमुख क्षेत्र
प्रभावी संरक्षण और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए बायोस्फीयर रिजर्व को तीन अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है।
- मुख्य क्षेत्र (कोर एरिया): यह बायोस्फीयर रिजर्व का सबसे अधिक संरक्षित हिस्सा होता है। यहां प्राकृतिक आवासों, वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और आनुवंशिक विविधता को सुरक्षित रखा जाता है। मानवीय गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध होते हैं, हालांकि संरक्षण से संबंधित वैज्ञानिक अनुसंधान और निगरानी की अनुमति दी जाती है।
- बफर जोन: यह क्षेत्र मुख्य क्षेत्र के आसपास या उससे सटा हुआ होता है। यहां पर्यावरण शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और नियमन के तहत इको-टूरिज्म जैसी संरक्षण के अनुकूल गतिविधियां संचालित की जा सकती हैं। इससे संरक्षित क्षेत्र पर मानवीय दबाव कम करने में मदद मिलती है।
- ट्रांजिशन जोन: यह बायोस्फीयर रिजर्व का वह हिस्सा है, जहां स्थानीय समुदायों की भागीदारी से सतत आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है। इसमें जिम्मेदार कृषि, सतत वानिकी, इको-टूरिज्म और अन्य आजीविका संबंधी गतिविधियां शामिल हैं।
वस्तुतः वैश्विक स्तर पर बायोस्फीयर रिजर्व के कुल क्षेत्रफल में औसतन 18 प्रतिशत हिस्सा कोर जोन, 30 प्रतिशत बफर जोन और 52 प्रतिशत हिस्सा ट्रांजिशन जोन का होता है। यह व्यवस्था संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
भविष्य की दिशा
- भारत के बायोस्फीयर रिजर्व प्रकृति और मानव समुदायों के सह-अस्तित्व का उदाहरण हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थानीय भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से जैव विविधता का संरक्षण तथा सतत आजीविका को बढ़ावा दिया जा सकता है। सरकार, शोधकर्ताओं और समुदायों के सहयोग से ये क्षेत्र प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।