संदर्भ
- भारत में आमतौर पर माना जाता है कि आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने के कारण वे गंभीर बीमारियों से अधिक सुरक्षित रहते हैं। हालांकि, 65,364 भारतीयों पर किए गए एक बड़े अध्ययन में सामने आए नतीजे इस धारणा से अलग तस्वीर पेश करते हैं। शोध के अनुसार, जीवनभर उच्च सामाजिक-आर्थिक स्थिति में रहने वाले लोगों में हृदय रोगों का जोखिम उन लोगों की तुलना में अधिक पाया गया, जो बचपन से वयस्क होने तक आर्थिक रूप से कमजोर रहे।
- अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिवेंटिव मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन में हार्ट फेल्योर और हार्ट अटैक समेत कई हृदय संबंधी बीमारियों के साथ लोगों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के संबंध का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि बदलती जीवनशैली, खानपान और शारीरिक गतिविधियों में कमी इस स्थिति के संभावित कारण हो सकते हैं।
अमीर लोगों में हार्ट फेल्योर का जोखिम 1.8 गुना अधिक
- अध्ययन के मुताबिक, लगातार उच्च सामाजिक-आर्थिक स्थिति में रहने वाले लोगों में हार्ट फेल्योर यानी हृदय की विफलता की आशंका लगातार निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले लोगों की तुलना में लगभग 1.8 गुना अधिक पाई गई। वहीं, हार्ट अटैक का जोखिम करीब 1.7 गुना अधिक दर्ज किया गया।
- इसके अलावा, संपन्न वर्ग में कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर, हृदय की असामान्य धड़कन और अन्य हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम भी अधिक पाया गया। हालांकि, इन नतीजों का अर्थ यह नहीं है कि अमीर होना अपने आप में हृदय रोगों का कारण है। अध्ययन में सामने आए संबंधों को समझने के लिए जीवनशैली, खानपान और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
एम्स और हार्वर्ड के वैज्ञानिकों ने किया अध्ययन
- यह शोध नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) और अमेरिका के हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों ने किया। अध्ययन में 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 65,364 भारतीयों को शामिल किया गया।
- शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की मौजूदा आर्थिक स्थिति के साथ-साथ उनके बचपन की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। इसमें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोगों, पुरुषों और महिलाओं तथा विभिन्न धार्मिक और जातिगत समूहों का प्रतिनिधित्व शामिल था।
- अध्ययन में लोगों को चार समूहों में बांटा गया। पहले समूह में वे लोग थे, जो बचपन और वयस्क जीवन दोनों में संपन्न रहे। दूसरे समूह में बचपन में आर्थिक रूप से कमजोर, लेकिन बाद में बेहतर स्थिति में पहुंचने वाले लोग शामिल थे। तीसरे समूह में वे लोग थे, जिनकी आर्थिक स्थिति समय के साथ खराब हुई। चौथे समूह में वे लोग शामिल थे, जो जीवनभर निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति में रहे।
- इस वर्गीकरण से शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिली कि हृदय रोगों का संबंध केवल वर्तमान आय या आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि जीवन के अलग-अलग चरणों में मिलने वाली सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से भी हो सकता है।
बदलती जीवनशैली बन सकती है बड़ी वजह
अध्ययन के प्रमुख लेखक इम्नामेरेन लॉन्गकुमेर और वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर एस.वी. सुब्रमण्यम ने हृदय रोगों के बढ़ते जोखिम के पीछे कई संभावित कारणों की ओर संकेत किया।
- आर्थिक स्थिति बेहतर होने के साथ लोगों की पहुंच प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, मीठे पेय पदार्थों और अधिक कैलोरी वाले भोजन तक बढ़ सकती है। इसके अलावा, दफ्तरों में लंबे समय तक बैठकर काम करना, निजी वाहनों पर निर्भरता और रोजमर्रा की शारीरिक गतिविधियों में कमी भी स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
- ऐसी जीवनशैली से मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और असामान्य कोलेस्ट्रॉल जैसे हृदय रोगों के जोखिम कारक बढ़ सकते हैं। हालांकि, अध्ययन में सामने आए संबंधों से यह साबित नहीं होता कि यही कारण सभी मामलों में जिम्मेदार हैं।
- शोधकर्ताओं ने यह भी चेताया कि भारत में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। आने वाले समय में हृदय रोगों और उनसे जुड़े जोखिम कारकों का बोझ आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में भी बढ़ सकता है।
हृदय रोग का इलाज गरीब परिवारों पर डालता है भारी बोझ
हृदय रोगों की चुनौती केवल बीमारी और मृत्यु के जोखिम तक सीमित नहीं है। इनके इलाज का खर्च भी परिवारों के लिए गंभीर समस्या बन सकता है।
- ग्लोबल हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार, हार्ट फेल्योर के मरीज को एक बार अस्पताल में भर्ती कराने का औसत खर्च लगभग 1.19 लाख रुपये था। इतनी बड़ी राशि का इंतजाम करना निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए मुश्किल हो सकता है।
- श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के सह-लेखक जीमोन पी. के अनुसार, हृदय रोगों के इलाज में अस्पताल में भर्ती होने, दवाओं और अन्य चिकित्सा सेवाओं पर काफी खर्च होता है। मरीज के अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी परिवारों पर आर्थिक दबाव बना रह सकता है।
- उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्वास्थ्य बीमा योजनाएं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को वित्तीय सुरक्षा देने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके बावजूद, इलाज के खर्च का बड़ा हिस्सा कई बार परिवारों को अपनी जेब से उठाना पड़ता है।
हृदय रोगों से बचाव के लिए जरूरी हैं समय पर जांच और स्वस्थ आदतें
- अध्ययन का मुख्य संदेश यह है कि हृदय रोगों का जोखिम केवल किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति से तय नहीं होता। खानपान, शारीरिक सक्रियता, रक्तचाप, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के अनुसार, संतुलित आहार लेना, नियमित व्यायाम करना, तंबाकू से दूर रहना और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना हृदय को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है। जिन लोगों को मधुमेह, उच्च रक्तचाप या हृदय रोगों का पारिवारिक इतिहास है, उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।
कुल मिलाकर, यह अध्ययन भारत में हृदय रोगों की बदलती तस्वीर को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है। इसके निष्कर्ष बताते हैं कि आर्थिक विकास के साथ स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना और सभी वर्गों के लिए सस्ती एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।