महिला सशक्तीकरण केवल सरकारी योजनाओं और आरक्षण तक सीमित नहीं होना चाहिए। महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने के समान अवसर देना जरूरी है। राष्ट्रीय महिला आयोग की पहल ने कानूनी अधिकारों और उनकी जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को फिर उजागर किया है। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कई कानून और योजनाएं लागू हैं, लेकिन संपत्ति के अधिकार, आर्थिक स्वतंत्रता और न्याय तक पहुंच में चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की परामर्श बैठक का उद्देश्य समावेशी विकास और महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देना है। वास्तविक महिला सशक्तीकरण के लिए कल्याणकारी योजनाओं और आरक्षण से आगे बढ़कर महिलाओं को संसाधनों पर अधिकार, आर्थिक स्वतंत्रता और फैसले लेने की शक्ति देनी होगी। यह विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।
वितरणात्मक न्याय से मजबूत होंगे महिलाओं के अधिकार
महिला सशक्तीकरण को समझने के लिए वितरणात्मक न्याय और प्रतिपूरक न्याय के बीच अंतर जानना जरूरी है।
प्रतिपूरक न्याय के तहत उन लोगों को सहायता या मुआवजा दिया जाता है, जिन्हें किसी प्रकार के भेदभाव या नुकसान का सामना करना पड़ा है।
वहीं, वितरणात्मक न्याय का उद्देश्य संसाधनों और अवसरों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है, ताकि सभी को विकास के समान अवसर मिल सकें।
संविधान के अनुच्छेद 38 और 39 राज्य को सामाजिक न्याय स्थापित करने, असमानताओं को कम करने और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की दिशा में काम करने का निर्देश देते हैं। अनुच्छेद 46 भी कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा पर जोर देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एयर इंडिया स्टैच्यूटरी कॉरपोरेशन बनाम यूनाइटेड लेबर यूनियन (1996) मामले में समतावादी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने में वितरणात्मक न्याय के महत्व को रेखांकित किया था। वहीं, कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर बनाम भारत संघ (1995) मामले में न्यायालय ने सामाजिक-आर्थिक न्याय को जीवन के अधिकार और मानवीय गरिमा से जोड़कर देखा। इस दृष्टिकोण के अनुसार, महिलाओं को केवल सहायता देने के बजाय उन्हें संसाधनों और अवसरों पर समान अधिकार उपलब्ध कराना जरूरी है।
संपत्ति का अधिकार महिलाओं को देता है आर्थिक मजबूती
संपत्ति केवल जमीन, मकान या धन तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, आर्थिक सुरक्षा और स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित करती है। महिलाओं के पास संपत्ति होने से परिवार और समाज में उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है तथा आर्थिक निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
संविधान का अनुच्छेद 300-A कहता है कि किसी व्यक्ति को कानून के प्राधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान महिलाओं और पुरुषों, दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को मजबूत करने में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 का महत्वपूर्ण योगदान है। वर्ष 2005 में किए गए संशोधन के बाद हिंदू संयुक्त परिवार की सहदायिकी संपत्ति में बेटियों को बेटों के समान अधिकार दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) मामले में स्पष्ट किया कि बेटी जन्म से ही सहदायिक होती है। उसका अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं करता कि संबंधित संशोधन लागू होने के समय उसके पिता जीवित थे या नहीं।
इसके अलावा, विवाह, भरण-पोषण और उत्तराधिकार से जुड़े विभिन्न कानून भी महिलाओं की कानूनी स्थिति को प्रभावित करते हैं। हालांकि, कानून में अधिकार मिलने और वास्तव में उनका लाभ उठा पाने के बीच अब भी बड़ा अंतर है।
पितृसत्तात्मक सोच और कानूनी जागरूकता की कमी बड़ी बाधा
महिलाओं को संपत्ति में हिस्सा मिलने के बावजूद कई बार सामाजिक दबाव, पारिवारिक परंपराओं और पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण वे अपने अधिकारों का दावा नहीं कर पातीं। कई महिलाओं को यह जानकारी भी नहीं होती कि कानून उन्हें कौन-कौन से अधिकार देता है और इन अधिकारों की रक्षा के लिए वे कहां संपर्क कर सकती हैं।
न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता, कानूनी सहायता तक सीमित पहुंच और सामाजिक परिस्थितियां भी उनकी मुश्किलें बढ़ाती हैं। ऐसे में केवल नए कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। मौजूदा कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने और महिलाओं को न्याय दिलाने वाली संस्थाओं को मजबूत करने की आवश्यकता है।
महिला-केंद्रित नहीं, महिला-नेतृत्व वाला विकास जरूरी
महिला सशक्तीकरण के लिए अब महिलाओं को केवल सरकारी योजनाओं की लाभार्थी के रूप में देखने की सोच बदलनी होगी। उन्हें सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव का नेतृत्व करने वाले नागरिकों के रूप में पहचानना जरूरी है।
इसके लिए भूमि और संपत्ति के रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, नामांतरण की प्रक्रिया को सरल बनाना और महिलाओं के वैध संपत्ति हिस्से को सही तरीके से दर्ज करना उपयोगी कदम हो सकते हैं। इससे संपत्ति संबंधी विवादों और बिचौलियों पर निर्भरता को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ ही स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से कानूनी जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। महिलाओं को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने और न्यायिक प्रक्रियाओं तक उनकी पहुंच आसान बनाने पर भी जोर देना होगा।
राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, कारोबार और अन्य क्षेत्रों में योग्य महिलाओं को नेतृत्व के अवसर देना भी जरूरी है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी और समाज में समानता की भावना मजबूत होगी।
विकसित भारत और महिला सशक्तीकरण
महिलाओं को संपत्ति, शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने के समान अवसर देना केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं है, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति के लिए भी महत्वपूर्ण है। जब महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होंगी और अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकेंगी, तब वे परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास में अधिक प्रभावी भूमिका निभा पाएंगी।
इसलिए महिला सशक्तीकरण को कल्याणकारी योजनाओं से आगे बढ़ाकर अधिकार-आधारित व्यवस्था में बदलने की जरूरत है। महिला-केंद्रित विकास से महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर बढ़ना ही वास्तविक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। यही दृष्टिकोण महिलाओं को सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसर देने के साथ विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को भी मजबूती प्रदान कर सकता है।