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मगरमच्छ संरक्षण परियोजना के 50 वर्ष

संदर्भ

वर्ष 1975 में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के सहयोग से ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में मगरमच्छ संरक्षण परियोजना की शुरूआत की थी। 17 जून 2024 को विश्व मगरमच्छ दिवस 2024 के अवसर पर इस परियोजना के 50 वर्ष पूरे हुए। 

मगरमच्छों के विषय में सामान्य तथ्य

  • मगरमच्छ सामान्यत: उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में निवास करते हैं। 
  • ये मुख्यतः मध्य और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के गर्म क्षेत्रों में रहते हैं। 
  • सभी मगरमच्छ अर्धजलीय होते हैं और ये खारे पानी के जल निकायों के साथ-साथ नदियों, झीलों, आर्द्रभूमि जैसे मीठे पानी के आवासों में भी पाये जाते हैं। 
  • मगरमच्छ मांसाहारी जीव है, यह प्रजाति और आयु के आधार पर ज्यादातर मछली, सरीसृप, पक्षी या स्तनधारी जीवों को अपना शिकार बनाता है। 
  • यह रात्रिचर (Nocturnal) जानवर है। इनमें पॉइकिलोथर्मिक (poikilothermic) विशेषता पाई जाती है, जिससे ये अपने शरीर के तापमान को सीमित डिग्री तक नियंत्रित कर सकते हैं।
  • सभी मगरमच्छ उष्णकटिबंधीय प्रजातियां हैं, जो एलीगेटर के विपरीत, ठंड के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं। 

मगरमच्छ (crocodiles) एवं एलीगेटर (alligators) में अंतर 

  • एक मगरमच्छ का थूथन (snout) लंबा और V-आकार होता है, जबकि एलीगेटर का थूथन चौड़ा और U-आकार होता है।
  • मगरमच्छ समुद्र तट के पास खारे पानी में रहना पसंद करते हैं, जबकि एलीगेटर मुख्य रूप से मीठे पानी के वातावरण में रहते हैं।
  • एलीगेटर के पैर जालीदार होते हैं, जबकि मगरमच्छ के पैर की उंगलियाँ अलग-अलग होती हैं।
  • मगरमच्छ अपनी जीभ पर मौजूद ग्रंथियों के ज़रिए अपने शरीर से अतिरिक्त नमक स्रावित करने में सक्षम होते हैं, लेकिन एलीगेटर ऐसा नहीं कर पाते हैं। 
  • मगरमच्छ दुनिया भर के विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाते हैं, मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय आवासों में, जबकि मगरमच्छों की दो प्रजातियाँ हैं: अमेरिकी मगरमच्छ (एलीगेटर मिसिसिपेंसिस) और चीनी मगरमच्छ (एलीगेटर साइनेंसिस)।

पारिस्थितिकी तंत्र में मगरमच्छों की भूमिका 

  • मगरमच्छ प्रकृति और पर्यावरण के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 
  • वे अपने पारिस्थितिकी तंत्र में सर्वोच्च शिकारी हैं, अन्य जानवरों की आबादी को नियंत्रित करते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं। 
  • हालाँकि, मगरमच्छों को कई खतरों का भी सामना करना पड़ता है, जिसमें निवास स्थान का नुकसान, अवैध शिकार और उनकी त्वचा और मांस का अवैध व्यापार शामिल है।

यह भी जानें

  • विश्व मगरमच्छ दिवस 17 जून को बेलीज़ स्थित मगरमच्छ अनुसंधान गठबंधन द्वारा मनाया जाता है। 
  • यह दिन दुनिया भर में लुप्तप्राय मगरमच्छों और मगरमच्छों की दुर्दशा को उजागर करने के लिए एक वैश्विक जागरूकता अभियान है।
  • मगरमच्छ अनुसंधान गठबंधन (Crocodile Research Coalition) जनवरी 2016 में स्थापित बेलीज़ स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो पूरे मध्य अमेरिका और कैरिबियन में मगरमच्छों और उनके पर्यावरण को संरक्षित करने का प्रयास करता है ताकि इस क्षेत्र में जैव विविधता की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

भारत की मगरमच्छ संरक्षण परियोजना 

  • मगरमच्छ संरक्षण परियोजना 1975 में ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में शुरू की गई थी। 
  • उद्देश्य :  मगरमच्छ संरक्षण परियोजना का मुख्य उद्देश्य जानवरों के प्राकृतिक आवास की रक्षा करना और बंदी प्रजनन के माध्यम से आबादी को जल्दी से पुनर्जीवित करना था क्योंकि शिकार के कारण प्रकृति में मगरमच्छों के बच्चों के जीवित रहने की दर कम थी।
  • परियोजना की सफलता : मगरमच्छ संरक्षण परियोजना ने भारत में मगरमच्छों की आबादी में वृद्धि की है।
    • वर्ष 2024 की सरीसृप जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, भितरकनिका में 1,811 खारे पानी के मगरमच्छ हैं।
    • परियोजना की सफलता में ‘क्रोकोडाइल मैन’ के नाम विख्यात ओडिशा के सुधाकर कार प्रमुख योगदान है।

भारत में पाए जाने वाले मगरमच्छ

  • भारत के मगरमच्छों की तीन मुख्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं:
    • सॉल्टी या खारे पानी के मगरमच्छ (क्रोकोडाइलस पोरोसस), 
    • दलदली मगरमच्छ (क्रोकोडाइलस पलुस्ट्रिस) 
    • घड़ियाल (गेवियलिस गैंगेटिकस)
  • भारत में सॉल्टी मगरमच्छ केवल तीन स्थानों पर पाए जाते हैं : भीतरकनिका, सुंदरबन और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।
  • भारत सरकार द्वारा मगरमच्छों के संरक्षण के लिए अनेक संरक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाए जा रहे हैं, जैसे:
    • टिकरपाड़ा घड़ियाल परियोजना, डंगामल में बौला परियोजना, नंदनकानन में मगरमच्छ बंदी प्रजनन परियोजना, रामतीर्थ में मगर परियोजना इत्यादि।
  • संरक्षण स्थिति :

FAO

भारत में मगरमच्छों की प्रजातियाँ

Species

मगर या दलदली मगरमच्छ 

(क्रोकोडाइलस पलुस्ट्रिस)

मगर या मार्श मगरमच्छ: 

  • यह अंडा देने वाली और होल-नेस्टिंग प्रजाति (Hole-Nesting Species) है जिसे खतरनाक भी माना जाता है। 
  • यह मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप तक ही सीमित है और मीठे पानी के स्रोतों एवं तटीय खारे जल के लैगून एवं मुहानों में भी पाई जाता है। 
  • भूटान और म्याँमार में यह विलुप्त हो चुका है। 
  • आवासों का विनाश और विखंडन एवं परिवर्तन, मछली पकड़ने की गतिविधियाँ तथा औषधीय प्रयोजनों हेतु मगरमच्छ के अंगों के उपयोग से इसे प्रमुख खतरा है।

Hole-Nesting

सॉल्टी या खारे पानी का मगरमच्छ

(क्रोकोडाइलस पोरोसस)

एस्टुअरीन या खारे पानी का मगरमच्छ: 

  • यह पृथ्वी पर सबसे बड़ी जीवित मगरमच्छ प्रजाति है, जिसे विश्व स्तर पर एक ज्ञात आदमखोर के रूप में जाना जाता है। 
  • यह मगरमच्छ ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिम बंगाल में सुंदरवन तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाया जाता है। 
  • यह दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में भी पाया जाता है। 
  • इस प्रजाति को मुख्य संकट अवैध शिकार, निवास स्थान की हानि और प्रजातियों के प्रति शत्रुता से है।

Crocodile

घड़ियाल 

(गेवियलिस गैंगेटिकस)

घड़ियाल

  • इन्हें गेवियल भी कहते हैं, यह एशियाई मगरमच्छ अपने लंबे, पतले थूथन के कारण अन्य से अलग होते हैं जो कि एक बर्तन (घड़ा) जैसा दिखता है। 
  • घड़ियाल की आबादी स्वच्छ नदी जल का एक अच्छा संकेतक है। 
  • इसे अपेक्षाकृत हानिरहित, मछली खाने वाली प्रजाति के रूप में जाना जाता है। 
  • यह प्रजाति ज़्यादातर हिमालयी नदियों के ताज़े पानी में पाई जाती है। 
  • विंध्य पर्वत (मध्य प्रदेश) के उत्तरी ढलानों में चंबल नदी को घड़ियाल के प्राथमिक आवास के रूप में जाना जाता है। 
  • अन्य हिमालयी नदियाँ जैसे- घाघरा, गंडक नदी, गिरवा नदी, रामगंगा नदी और सोन नदी इसके द्वितीयक आवास हैं। 
  • इस प्रजाति को मुख्य संकट अवैध रेत खनन, अवैध शिकार, नदी प्रदूषण में वृद्धि, बाँध निर्माण, बड़े पैमाने पर मछली पकड़ने का कार्य और बाढ़ से है।
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