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आपातकाल के 50 वर्ष : एक विश्लेषण

(प्रारंभिक परीक्षा : समसामयिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: स्वतंत्रता के पश्चात् देश के अंदर एकीकरण और पुनर्गठन)

संदर्भ

25 जून, 1975 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मंत्रिमंडल की लिखित सहमति के बिना भारत में आपातकाल की घोषणा की थी। इसके अगले 21 महीनों तक नागरिक स्वतंत्रताओं का निलंबन, प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश, सामूहिक गिरफ्तारियां, चुनावों का स्थगन और डिक्री द्वारा शासन जैसे कठोर कदम देखे गए।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • 1970 के दशक की शुरुआत में भारत में सामाजिक एवं राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही थी। भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट व सामाजिक असंतोष ने देश में असंतुलन पैदा किया।
  • वर्ष 1974 में गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन और बिहार में छात्र आंदोलन ने सरकार के खिलाफ असंतोष को उजागर किया।
  • जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन भ्रष्टाचार एवं कुशासन के खिलाफ एक जन-आंदोलन बन गया। 
  • जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल (1974) ने भारतीय रेलवे को तीन सप्ताह तक ठप कर दिया, जिससे सरकार की स्थिति कमजोर हुई।
  • 12 जून, 1975 को राज नारायण द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी ठहराया और उनका रायबरेली से उनका चुनाव रद्द कर दिया। 
  • हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में आंशिक राहत प्रदान की किंतु वे संसद में मतदान नहीं कर सकती थीं।

1975 आपातकाल घटना के बारे में 

  • घोषणा तिथि : 25 जून, 1975
  • अवधि : 21 महीने (25 जून, 1975 - 21 मार्च, 1977)
  • घोषणा : राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर
  • संवैधानिक आधार : अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर 

आपातकाल के दौरान हुए बदलाव

  • नागरिक स्वतंत्रताओं का निलंबन : अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) को निलंबित कर दिया गया, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आजादी पर अंकुश लगा।
  • सामूहिक गिरफ्तारियां : जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, लालकृष्ण आडवाणी जैसे विपक्षी नेताओं सहित लगभग 36,000 लोगों को मेन्टेनेन्स ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) के तहत जेल में डाल दिया गया।
  • प्रेस सेंसरशिप : समाचार पत्रों पर पूर्व-संशोधन लागू किया गया। यू.एन.आई. एवं पी.टी.आई. को मिलाकर एक सरकारी नियंत्रित समाचार एजेंसी ‘समाचार’ बनाई गई।
  • संघीय ढांचे का परिवर्तन : आपातकाल ने भारत के संघीय ढांचे को एकात्मक ढांचे में बदल दिया क्योंकि केंद्र को राज्य सरकारों को निर्देश देने का अधिकार प्राप्त हो गया।

संवैधानिक संशोधन एवं परिवर्तन

  • 38वां और 39वां संवैधानिक संशोधन : 38वां संशोधन आपातकाल की घोषणा की न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता था, जबकि 39वां संशोधन राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं स्पीकर के चुनाव को न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से बाहर करता था।
  • 42वां संवैधानिक संशोधन : इस संशोधन को ‘मिनी संविधान’ भी कहा जाता है। इसने संसद को संविधान संशोधन की असीमित शक्ति प्रदान की, न्यायिक समीक्षा को सीमित किया और केंद्र को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दिया।
  • 44वां संवैधानिक संशोधन (पोस्ट-आपातकाल) : वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को उलट दिया। 
    • इसने आपातकाल की घोषणा की न्यायिक समीक्षा को फिर से संभव बनाया और ‘आंतरिक अशांति’ को आपातकाल के आधार से हटा दिया, जिसे अब केवल ‘सशस्त्र विद्रोह’ के लिए सीमित कर दिया गया।

आपातकाल के प्रभाव

  • लोकतंत्र पर प्रभाव : आपातकाल ने भारतीय लोकतंत्र की कमजोरियों को उजागर किया किंतु इसने स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रेस व सक्रिय नागरिक समाज की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।
  • जनता पार्टी का उदय : आपातकाल के बाद वर्ष 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई और पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार सत्ता में आई। मोरार जी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
  • शाह आयोग : जनता सरकार द्वारा गठित शाह आयोग ने आपातकाल की एकतरफा घोषणा और नागरिक स्वतंत्रताओं पर इसके प्रतिकूल प्रभावों की निंदा की।
  • संघीय ढांचे में बदलाव : आपातकाल के बाद सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ और गठबंधन सरकारों का उदय हुआ।

इसे भी जानिए!

आपातकाल के संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान के भाग XVIII (अनुच्छेद 352-360) में आपातकाल के प्रावधान किए गए हैं, जो जर्मन वाइमर (वीमर) संविधान से प्रेरित हैं। ये प्रावधान तीन प्रकार के आपातकालों को मान्यता देते हैं-

  • राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352-354, 358-359) : यह युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर घोषित किया जा सकता है। 
    • वर्ष 1975 में ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर आपातकाल घोषित किया गया था, जिसे बाद में 44वें संशोधन द्वारा हटा दिया गया।
  • राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 355-357) : यदि किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाता है तो केंद्र सरकार राज्य के कार्यों को अपने नियंत्रण में ले सकती है।
  • वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) : यह तब घोषित किया जा सकता है जब देश की वित्तीय अस्थिरता या विशिष्ट खतरे में हो।

भारत में अब तक तीन बार आपातकाल लागू किया गया है:

  • वर्ष 1962 में (युद्ध के आधार पर)
  • वर्ष 1971 में (युद्ध के आधार पर)
  • वर्ष 1975 में (आंतरिक अशांति के आधार पर)

निष्कर्ष

वर्ष 1975 का आपातकाल ने लोकतांत्रिक संस्थानों की कमजोरियों को उजागर किया, लेकिन साथ ही स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रेस और नागरिक समाज की महत्वपूर्ण भूमाविका को भी रेखांकित किया। 44वें संवैधानिक संशोधन ने भविष्य में आपातकाल की घोषणा को अधिक कठिन व युक्तिसांगत बना दिया, जिससे लोकतंत्र की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा को मजबूत किया गया। यह घटना सिखाती है कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए जवाबदेही, कानून का शासन एवं सक्रिय नागरिक भागीदारी आवश्यक है।

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