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ईशनिंदा और हेट स्पीच में भेद

  • 10th August, 2022

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 : भारतीय राजव्यवस्था)

संदर्भ 

वर्तमान में भारत में धार्मिक समुदायों पर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ सामान्य हो गईं हैं। ऐसी स्थिति में ईशनिंदा (Blasphemy) तथा द्वेषपूर्ण भाषण (Hate Speech) से संबंधित भारतीय नियमों व कानूनों पर चर्चा करना अवाश्यक है।

ईशनिंदा एवं हेट स्पीच

  • ईशनिंदा- सामान्यत: ईशनिंदा का आशय किसी धर्म, मज़हब अथवा संप्रदाय के संबंध में नकारात्मक टिप्पणी करना या संबंधित धार्मिक अराध्यों, स्थलों और ग्रंथों पर अपमानजनक टिप्पणी करना होता है। इसके अंतर्गत धार्मिक प्रतीकों, धार्मिक कार्यों अथवा धार्मिक वेशभूषा इत्यादि के अपमान को शामिल किया जाता है। वर्तमान में भारत में इस संबंध में कोई स्पष्ट कानून नहीं है।  
  • हेटस्पीच- सामान्यत:हेट स्पीच का अभिप्राय धार्मिक अथवा जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए विभिन्न समुदायों के मध्य चित्र, चल-चित्र, लिखित अथवा मौखिक संदेशों द्वारा घृणा या द्वेष फैलाना है।

हेट स्पीच को लेकर अस्पष्टता

  • भारतीय कानूनी ढाँचे में हेट स्पीच को परिभाषित नहीं किया गया है। इसके स्वरूप में भिन्नता होने के कारण इसके लिये एक मानक परिभाषा तय करना भी कठिन है।
  • ‘अमीश देवगन बनाम भारत संघ (2020) मामले’ में उच्चतम न्यायालय ने ‘हेट-स्पीच’ को चिह्नित करने के लिये एक अन्य मानदंड जोड़ दिया है। न्यायालय के अनुसार, ‘अपनी पहुँच, प्रभाव और शक्ति को ध्यान में रखते हुए, जो प्रभावशाली व्यक्ति सामान्य जनता या संबद्ध विशिष्ट वर्ग के लिये कार्य करते हैं, उन्हें अधिक ज़िम्मेदार होना पड़ता है।
  • हालाँकि, प्रभावशाली व्यक्तियों के लिये एक उच्च और अलग मानक दो भिन्न-भिन्न व्याख्याओं को जन्म दे सकता है, जिससे राज्य अपनी सुविधानुसार व्याख्याएँ कर सकता है।

धारा 295(A) की पृष्ठभूमि

  • भारतीय दंड सहिंता (IPC) की धारा 295(A)उन अपराधों के लिये न्यूनतम तीन वर्ष के कारावास का उपबंध करती है, जिसमें पूर्व नियोजित और दुर्भावनापूर्ण इरादे सेनागरिकों के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने के उद्देश्य से मौखिक,लिखित या प्रतीकात्मक संदेशों का प्रयोग किया जाता है।
  • हालाँकि, भारत में ईशनिंदा के खिलाफ कोई औपचारिक कानून नहीं है किंतु उक्त धारा को ईशनिंदा कानून के निकटतम समकक्ष माना जा सकता है।
  • भारतीय दंड सहिंता की धारा-295(A) का इतिहास लगभग 95 वर्ष पुराना हैं। वर्ष 1927 में मोहम्मद पैगम्बर के निजी जीवन के संबंध में एक व्यंग्य प्रकाशित किया गया था।किंतु तत्कालीन लाहौर उच्च न्यायालय ने इस लेखन से किसी भी समुदाय के बीच विद्वेष न पैदा होने के आधार पर लेखक को न्यायिक कार्यवाही से बरी कर दिया था।
  • न्यायालय के अनुसार, यह गतिविधि आई.पी.सी. की धारा-153(A) के तहत नहीं आती है, जो सार्वजनिक शांति/व्यवस्था बनाए रखने से संबंधित है।
  • उल्लिखित घटनाक्रम ने धार्मिक सम्मान तथा पवित्रता से संबंधित नियमों एवं कानूनों की मांग पर ध्यान आकर्षित किया, जिसके बाद भारतीय दंड सहिंता में धारा-295(A) को शामिल किया गया।
  • धारा 295(A) की वैधता की सर्वप्रथम पुष्टि उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने रामजी लाल मोदी वाद (1957) में की गई। न्यायालय के अनुसार-

“अनुच्छेद 19(2) द्वारा सार्वनिक व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए गए हैं,जबकि भारतीय दंड सहिंता की धारा 295(A) के तहत सजा किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से किये गए कार्य (ईशनिंदा) से संबंधित है”।

कानून की व्याख्या

  • शीर्ष अदालत ने रामजी लाल मोदी मामले में निर्धारित परीक्षण को फिर से परिभाषित किया।
  • अधीक्षक, केंद्रीय कारागार, फतेहगढ़ बनाम राम मनोहर लोहिया वाद में उच्चतम न्यायालय ने तय किया कि किसी मामले को आई.पी.सी. की धारा 295(A) के अंतर्गत आने के लिये भाषण और इसके परिणामस्वरूप होने वाली किसी भी सार्वजनिक अव्यवस्था के बीच घनिष्ठ संबंध होना चाहिये। 
  • वर्ष 2011 तक यह निष्कर्ष निकाला गया कि गैरकानूनी कार्रवाई को उकसाने वाले भाषण को ही दंडित किया जा सकता है।

ईशनिंदा और हेट स्पीच संबंधी कानूनों में अंतर की आवश्यकता  

  • धारा295(A)की भाषा काफी व्यापक है और यह नहीं कहा जा सकता है कि धर्म या धार्मिक संवेदनाओं का विचारपूर्वक अनादर करना अनिवार्य रूप से उकसाने के समान है। उच्चतम न्यायालय के अनुसार धारा 295(A) में हेट स्पीच के क़ानून का लक्ष्य शायद पूर्वाग्रह को रोकना और समानता सुनिश्चित करना है।
  • हालाँकि, इसधारा की वास्तविक भाषा और व्याख्याके बीच व्यापक असमानता होने के कारण इस कानून का अभी भी दुरूपयोग किया जा रहाहै।
  • धर्म या धार्मिक शख्सियतों का अपमान करने पर विवाद या निंदा हो सकती है किंतु इसेकानूनी रूप से अवैध या मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए। 
  • इसका कारण यह है कि हेट स्पीच संबंधी कानून धर्म की आलोचना करने या उसका उपहास करने और अपने विश्वास के कारण व्यक्तियों या समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह या आक्रामकता को प्रोत्साहित करने के बीच महत्वपूर्ण अंतर पर आधारित हैं।

हेट स्पीच की स्थिति  

  • विगत वर्षों में देश में हेट स्पीच से संबंधित मामलों में भारी वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरोकी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 में ऐसे मामलों की संख्या 323 थी जो वर्ष 2020 में बढ़कर 1804 हो गई।
  • वर्तमान में धारा-295(A) का प्रयोग धार्मिक असहमति, व्यंग्य और धार्मिक उपहास सामग्री इत्यादि को दंडित करने के उद्देश से किया जाने लगा है।

अन्य कानूनी प्रावधान

वर्तमान विधायी व्यवस्था में ‘हेट स्पीच’ के लिये कोई विशेष कानून नहीं है। हालाँकि, आई.पी.सी. की कुछ धाराओं का प्रयोग इसके लिये किया जा सकता है-

  • 153A- विभिन्न समूहों के मध्य विद्वेष को बढ़ावा देने के लिये दंड का प्रावधान
  • 153B- राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करने वाले आरोपों तथा दावों के लिये दंड का प्रावधान
  • 505- सांप्रदायिक विद्वेष को बढ़ावा देने वाले अफवाहों और समाचारों के लिये दंड का प्रावधान।

आगे की राह 

  • भारतीय दंड सहिंता की धारा 295(A) का क्षेत्र अत्यंत व्यापक हैं अत: इसके दुरूपयोग को रोकने के लिये इसकी सुस्पष्ट व्याख्या की आवश्यकता है। 
  • सामान्यत: धार्मिक आलोचनाओं तथा धार्मिक टिप्पणियों के माध्यम से उकसाने में बहुत सूक्ष्म अंतर है तथा तत्कालीन परिस्थितियां इसकी स्पष्ट परिभाषा की मांग करती हैं ।
  • भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सुगम संचालन के लिये धार्मिक अपमान के झूठे मामलों पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाये जाने चाहिये तथा संज्ञान में लिये गए मामलो की बारीकी से जाँच करनी चाहिये।
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