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पूर्वोत्तर के लिये अंतर्देशीय जल परिवहन प्रणाली

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3 : बुनियादी ढाँचा- ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि)

संदर्भ

पटना से गंगा नदी (राष्ट्रीय जलमार्ग-1) के माध्यम से भारतीय खाद्य निगम के लिये 200 मीट्रिक टन खाद्यान्न ले जाने वाला एम.वी. लाल बहादुर शास्त्री पोत हाल ही में ब्रह्मपुत्र नदी (राष्ट्रीय जलमार्ग-2) के दक्षिणी तट पर स्थित गुवाहाटी के पांडु बंदरगाह पहुँचा। इस पोत का संचालन ‘भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण’ (IWAI) ने किया।

जल परिवहन पर ज़ोर 

  • यह भारत के विभिन्न शहरों और बांग्लादेश के खुलना, नारायणगंज, सिराजगंज एवं चिलमारी से होते हुए पांडु पहुँचा। इसने पटना से बांग्लादेश होते हुए पांडु तक पहला पायलट रन पूरा किया। यह भविष्य में भारत की दो नदी प्रणालियों के मध्य अंतर्देशीय जल परिवहन की संभावनाओं को दर्शाती है। 
  • कल्पना चावला और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जहाजों के साथ एक अन्य पोत एम.वी. राम प्रसाद बिस्मिल भी पांडु पहुँचने वाले है।
  • आई.डब्ल्यू.ए.आई. असम और पूर्वोत्तर भारत के लिये अंतर्देशीय जल परिवहन के एक नए युग की शुरुआत करते हुए दोनों जल मार्गों के बीच नियत स्तर पर आवागमन की योजना बना रहा है।

अंतर्देशीय जल सेवा : पूर्वोत्तर के लिये संभावनाएँ

  • स्वंत्रता के पश्चात् चाय, लकड़ी, कोयला और तेल उद्योगों के लिये ब्रह्मपुत्र और बराक नदी (दक्षिणी असम) प्रणालियों के माध्यम से बंगाल की खाड़ी पर बंदरगाहों तक पहुंच के कारण असम की प्रति व्यक्ति आय देश में सर्वाधिक थी। 
  • स्वतंत्रता के पश्चात् फेरी सेवाएं छिटपुट रूप से जारी रहीं लेकिन वर्ष 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद ये सेवाएँ बंद हो गईं।
  • नदी मार्गों के कट जाने के बाद परिदृश्य बदल गया और पश्चिम बंगाल में एक संकरी पट्टी ‘चिकन नेक’ के माध्यम से किया जाने वाला रेल और सड़क परिवहन एक महँगा विकल्प साबित हुआ। ‘भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल’ (IBP) के माध्यम से कार्गो आवागमन की शुरुआत एक व्यवहार्य, आर्थिक और पारिस्थितिकी अनुकूल विकल्प प्रदान करेगी।
  • अंतर्देशीय जल सेवा से पूर्वोत्तर क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आएगी जिससे इस क्षेत्र में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होने के साथ-साथ लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार होगा।
  • यह इस क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों के अतिरिक्त सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है। इसके माध्यम से पूर्वोत्तर की अलगाववाद की भावना को भी समाप्त करने में सहायता मिलेगी।
  • यह चिकेन नेक पर निर्भरता को भी समाप्त करेगा तथा पूर्वोत्तर के लोगों के मध्य देश के प्रति जुड़ाव को भी मज़बूत करेगा।

चिकेन नेक या सिलीगुड़ी कॉरिडोर

  • ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ को भारत के ‘चिकन नेक कॉरिडोर’ के नाम से भी जाना जाता है। वस्तुतः पश्चिम बंगाल में स्थित 60 किमी. लंबा और 20 किमी. चौड़ा सिलीगुड़ी कॉरिडोर उत्तर-पूर्व को भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में करीब 5 करोड़ लोग निवास करते हैं। आर्थिक दृष्टि से भी ये कॉरिडोर उत्तर-पूर्वी राज्यों और शेष भारत के व्यापार के लिये अहम है।
  • भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच एकमात्र रेलवे फ्रेट लाइन भी यहीं है। वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास सड़क मार्ग और रेलवे लाइन सिलीगुड़ी कॉरिडोर से जुड़े हुए हैं। यह कॉरिडोर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में आसियान देशों के लिये भी एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार है जो भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • चीन ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ को बड़ा खतरा मानता है। वर्ष 2017 के डोकलाम विवाद के समय ये कॉरिडोर एक महत्त्वपूर्ण मार्ग बनकर उभरा था। सिलीगुड़ी कॉरिडोर से तिब्बत की चुंबी घाटी मात्र 130 किमी. दूर है और भारत यहाँ से चीन पर भी नजर रखता है।
  • चुंबी घाटी सिक्किम की सीमा पर तिब्बत में भारत, भूटान और चीन के त्रिकोण पर स्थित है। भारत और चीन के मध्य 2 प्रमुख दर्रे ‘नाथूला’ और ‘जेलप्ला’ यहाँ खुलते हैं। सिलीगुड़ी गलियारे से यह स्थान लगभग 50 किमी. दूर है।
  • साथ ही, यह कॉरिडोर पूर्वोत्तर राज्यों में घुसपैठ, सीमा पार आतंकवाद और इस्लामी कट्टरपंथ का मुकाबला करने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है। म्याँमार, थाईलैंड व लाओस में संगठित अपराध और नशीले पदार्थों की तस्करी भारतीय राज्यों, जैसे- त्रिपुरा, मिज़ोरम, मणिपुर, नागालैंड व अरुणाचल प्रदेश के लिये बड़ा सुरक्षा खतरा रहा है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर इस सुरक्षा खतरे से निपटने में काफी अहम भूमिका निभा रहा है।

भारत- बांग्लादेश प्रोटोकॉल

  • भारत-बांग्लादेश के मध्य अंतर्देशीय जल पारगमन एवं व्यापार प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये जाने के पश्चात् बांग्लादेश में जलमार्गों के माध्यम से कार्गो परिवहन सेवा को फिर से शुरू करना महंगा पड़ा है।
  • भारत ने बांग्लादेश में आई.बी.पी. मार्गों के दो हिस्सों- ‘सिराजगंज-दाइखोवा’ और ‘आशुगंज-जकीगंज’ की नौगम्यता में सुधार के लिये कुल लागत का लगभग 80% वहन किया है।
  • वर्ष 2026 तक इन दो हिस्सों पर सात वर्ष की ड्रेजिंग परियोजना से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में निर्बाध नेविगेशन की उम्मीद है। नेविगेशन के लिये आई.बी.पी. मार्ग को मंजूरी मिलने के पश्चात् राष्ट्रीय जलमार्ग-1 और 2 के मध्य दूरी लगभग 1,000 किमी. कम हो जाएगी।
  • सरकार ने 2,000 टन तक के जहाजों के निरंतर आवागमन के लिये राष्ट्रीय राजमार्ग-1 की क्षमता बढ़ाने के लिये 4,600 करोड़ रुपए के निवेश के साथ जल मार्ग विकास परियोजना भी शुरू की है।
  • हालाँकि, बांग्लादेश में मछली पकड़ने वाले जाल और मछुआरों की नाराजगी के कारण इसे कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा है।

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण 

  • जल एवं पोत परिवहन को सुलभ बनाने व अंतर्देशीय जलमार्गों के विकास और विनियमन के लिये अक्टूबर 1986 में इसकी स्थापना की गयी। प्राधिकरण का मुख्यालय नोएडा में स्थित है।
  • यह प्राधिकरण मुख्यत: नौवहन मंत्रालय से प्राप्त अनुदान के माध्यम से राष्ट्रीय जलमार्गों पर परिवहन बुनियादी ढाँचे के विकास और रखरखाव के लिये परियोजनाएँ संचालित करता है।

निष्कर्ष

अंतर्देशीय जल परिवहन (Inland Waterways) ईंधन दक्ष, पर्यावरण के अनुकूल और लागत प्रभावी साधन है। यह रेलवे फ्रेट पर बढ़ते दबाव और सड़कों पर भीड़भाड़ को कम करने में सक्षम है। सड़क परिवहन की कम संभावना वाले क्षेत्रों के लिये यह एक वरदान है।

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