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रसायन उद्योग : नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित सुधार

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ

नीति आयोग ने 3 जुलाई, 2025 को ‘रसायन उद्योग: वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भारत की भागीदारी को सशक्त बनाना’ नामक एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें वर्ष 2030 तक ‘रसायन निर्यात’ (Chemical Exports) को 44 बिलियन डॉलर से दोगुना करने और वर्ष 2040 तक घरेलू बाजार को 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने की रणनीति प्रस्तावित की गई है।

भारत के रसायन उद्योग के बारे में

  • परिचय : भारत का रसायन उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है किंतु यह वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) में केवल 3.5% हिस्सेदारी रखता है जबकि चीन की हिस्सेदारी 23% है।
  • बाजार का आकार : वर्ष 2023 में भारत का रसायन बाजार 220 बिलियन डॉलर का था, जिसमें से निर्यात 44 बिलियन डॉलर था।
  • विकास दर : विगत 30 वर्षों में क्षेत्र ने 6% की औसत वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है।
  • प्रमुख उप-क्षेत्र : कृषि रसायन (Agrochemicals) और रंग (Dyes) निर्यात में मजबूत प्रदर्शन कर रहे हैं।
  • वैश्विक स्थिति : भारत का GVC में हिस्सा 3.5% है जिसे वर्ष 2030 तक 5-6% तक बढ़ाने का लक्ष्य है।
  • तुलना : फार्मा क्षेत्र की तुलना में रसायन क्षेत्र कम सफल रहा है जबकि दोनों क्षेत्र रसायन विज्ञान पर आधारित हैं।

आयात एवं निर्यात के महत्वपूर्ण आंकड़े

  • व्यापार घाटा : वर्ष 2023 में रसायन क्षेत्र में भारत का व्यापार घाटा 31 बिलियन डॉलर था।
  • निर्यात : वर्ष 2023 में रसायन निर्यात 44 बिलियन डॉलर था, जिसे वर्ष 2030 तक 79-84 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य है।
  • आयात पर निर्भरता : भारत महत्वपूर्ण रसायनों के लिए कुछ देशों पर अत्यधिक निर्भर है, विशेष रूप से कृषि रसायन मध्यवर्ती (Intermediates), फार्मास्यूटिकल मध्यवर्ती, बैटरी व इलेक्ट्रॉनिक रसायन, रंग एवं पेट्रोकेमिकल्स।
  • प्रमुख निर्यात उत्पाद : कृषि रसायन, रंग एवं रंजक (Dyes and Pigments) और पेट्रोकेमिकल्स भारत के रसायन निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
  • वैश्विक मांग : विशेष रसायनों की मांग में वृद्धि के कारण भारत के लिए निर्यात अवसर बढ़ रहे हैं।

नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित निर्यात वृद्धि के लिए उपाय

  • उत्पादन समूहों का विकास
    • मौजूदा पेट्रोलियम, रसायन एवं पेट्रोकेमिकल्स निवेश क्षेत्रों (PCPIRs), जैसे- दाहेज़ (गुजरात), पारादीप (ओडिशा) एवं विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश) का पुनर्विकास
    • 14 प्रमुख एवं 12 छोटे बंदरगाहों के आसपास 8 उच्च-संभावना वाले संकुलों (Clusters) का विकास
    • इन समूहों का उद्देश्य उत्पादन को स्केल करना और बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में सुधार करना
  • बंदरगाह बुनियादी ढांचे में सुधार
    • रसायन व्यापार के लिए लॉजिस्टिक्स एवं भंडारण सुविधाओं को उन्नत करना
    • नीति आयोग ने एक रासायनिक समिति के गठन का सुझाव दिया है जो बंदरगाहों में बुनियादी ढांचे की कमियों को पहचानेगी और समाधान करेगी।
  • विक्रय-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना
    • परिचालन व्यय सब्सिडी के रूप में एक योजना प्रस्तावित है जो महत्वपूर्ण रसायनों के स्थानीय उत्पादन एवं निर्यात को बढ़ावा देगी।
  • पात्र उत्पाद: कृषि रसायन मध्यवर्ती, फार्मास्यूटिकल मध्यवर्ती, बैटरी एवं इलेक्ट्रॉनिक रसायन, रंग व रंजक, पेट्रोकेमिकल्स।
  • आपूर्ति श्रृंखला में कमियों की पहचान
    • महत्वपूर्ण रसायनों एवं खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला में संभावित बाधाओं (Choke Points) को चिह्नित करना
    • यह रणनीति चीन द्वारा वर्ष 2018 में अपनाई गई रणनीति से प्रेरित है जिसने अपनी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया।

चुनौतियाँ

  • सीमित घरेलू मांग : भारत का घरेलू रसायन बाजार सीमित है, जिसके कारण निर्यात पर निर्भरता बढ़ती है।
  • आयात निर्भरता : महत्वपूर्ण रसायनों के लिए कुछ देशों पर अत्यधिक निर्भरता भारत की आपूर्ति शृंखला को जोखिम में डालती है।
  • बुनियादी ढांचे की कमी : मौजूदा PCPIRs जैसे पारादीप और विशाखापट्टनम में बुनियादी ढांचा अधूरा है, और बंदरगाहों में लॉजिस्टिक्स और भंडारण सुविधाओं की कमी है।
  • नियामक जटिलताएँ : जटिल नियम और अनुपालन प्रक्रियाएँ निवेश और विस्तार में बाधा डालती हैं।
  • प्रतिस्पर्धा : चीन जैसे देशों की तुलना में भारत का GVC में हिस्सा कम है, और विशेष रसायनों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा तीव्र है।
  • फार्मा क्षेत्र से तुलना : रसायन क्षेत्र फार्मास्यूटिकल क्षेत्र की तरह सफलता प्राप्त नहीं कर सका, जबकि दोनों रसायन विज्ञान पर आधारित हैं।

सरकारी पहल

  • PCPIR नीति : दहेज, परादीप और विशाखापट्टनम में रासायनिक केंद्रों को मजबूत करने के लिए निवेश और बुनियादी ढांचे पर ध्यान।
  • मेक इन इंडिया: रसायन क्षेत्र में स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन।
  • प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना : रसायन क्षेत्र में निवेश को आकर्षित करने के लिए पहले से लागू।
  • निर्यात प्रोत्साहन : विशेष रसायनों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नीति आयोग की नई विक्रय-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना।
  • नियामक सुधार : रासायनिक समिति के माध्यम से बंदरगाहों और समूहों में नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाने का प्रयास।

आगे की राह

  • विशेष रसायनों पर ध्यान : भारत को बल्क रसायनों से विशेष रसायनों की ओर बढ़ना होगा, जो उच्च मांग और मूल्य वाले हैं।
  • आपूर्ति शृंखला की मजबूती : महत्वपूर्ण रसायनों के लिए आयात निर्भरता कम करने और स्थानीय उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता।
  • बुनियादी ढांचे का विकास : बंदरगाहों और समूहों में लॉजिस्टिक्स, भंडारण और परिवहन सुविधाओं का विस्तार।
  • निवेश आकर्षण : प्रोत्साहन योजनाओं और नियामक सुधारों के माध्यम से निजी और विदेशी निवेश को आकर्षित करना।
  • वैश्विक भागीदारी : GVC में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भारत को वैश्विक रासायनिक आपूर्ति शृंखला में एकीकरण पर ध्यान देना होगा।
  • प्रौद्योगिकी एवं नवाचार : रसायन क्षेत्र में अनुसंधान और विकास (R&D) को बढ़ावा देना, विशेष रूप से बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक रसायनों में।

निष्कर्ष

भारत में रासायनिक उद्योग में वैश्विक अग्रणी बनने की महत्वपूर्ण क्षमता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ उद्योग के हितधारकों के विशेष प्रयासों की आवश्यकता है। मौजूदा चुनौतियों का समाधान करके और प्रस्तावित कार्ययोजना का लाभ उठाकर, भारत अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ा सकता है, निवेश आकर्षित कर सकता है और वैश्विक मूल्य श्रृंखला का नेतृत्व करने में सक्षम एक मजबूत रासायनिक क्षेत्र का निर्माण कर सकता है।

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