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जल्लीकट्टू

  • तमिलनाडु की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े पारंपरिक खेल ‘जल्लीकट्टू’ के सुरक्षित एवं व्यवस्थित आयोजन के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2026 हेतु एक व्यापक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की है। 
  • पोंगल उत्सव (जनवरी) से शुरू होकर मई तक चलने वाले इन आयोजनों के लिए कड़े दिशा-निर्देश तय किए हैं ताकि पशु कल्याण और मानवीय सुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जा सके।

जल्लीकट्टू के बारे में 

जल्लीकट्टू को स्थानीय भाषा में ‘सल्लिकट्टू’ भी कहा जाता है जो तमिलनाडु की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है। ‘जल्लीकट्टू’ शब्द दो तमिल शब्दों ‘जल्ली’ (सिक्के) और ‘कट्टू’ (बंधा हुआ) से मिलकर बना है। प्राचीन काल में विजेता को पुरस्कार के रूप में बैल के सींगों से बंधे सोने या चांदी के सिक्के मिलते थे।

प्राचीन साक्ष्य

  • इस खेल का इतिहास 400-100 ईसा पूर्व पुराना माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन में मिली एक मुहर इस खेल के प्राचीन होने का प्रमाण देती है। 
    • यह मुहर वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित है।
  • मदुरै के पास लगभग 1500 वर्ष पुरानी गुफा चित्रकारी मिली है जिसमें इस खेल को सफेद काओलिन रंगों में जीवंत रूप से उकेरा गया है।

खेल की पद्धति और चुनौतियां

  • जल्लीकट्टू में भाग लेने वाले युवाओं को सांड के कूबड़ (Hump) को पकड़कर उसे नियंत्रित करना होता है। इसमें मुख्यत: पुलिकुलम या कंगायम नस्ल के बैलों का उपयोग किया जाता है जो अपनी फुर्ती व शक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • कुछ नियमों के अनुसार खिलाड़ी को बैल के कूबड़ पर 30 सेकंड तक टिके रहना होता है जबकि कुछ क्षेत्रों में 15 मीटर की दूरी तक साथ दौड़ना अनिवार्य होता है।

लोककथा और धार्मिक जुड़ाव

लोक मान्यताओं के अनुसार, इस खेल का संबंध भगवान शिव और उनके वाहन ‘बसवा’ (नंदी) से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शिव ने बसवा को एक भ्रम पैदा करने के कारण श्राप दिया था और उसे पृथ्वी पर मनुष्यों की खेती में सहायता करने के लिए भेजा था। तब से बैल कृषि एवं उत्सवों का अभिन्न हिस्सा बन गए। 

जल्लीकट्टू के अन्य रूप

इस खेल को तमिलनाडु के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नियमों के साथ खेला जाता है-

  • वादी मंजुविराट्टू: इसमें बैल को एक संकीर्ण प्रवेश द्वार (वादी वासल) से छोड़ा जाता है।
  • वेली विराट्टू: इसमें बैल को खुले मैदान में छोड़ा जाता है जहाँ उसे पकड़ना अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।
  • वटम् मंजुविराट्टू: इसमें बैल को एक लंबी रस्सी से बांधा जाता है और एक निश्चित घेरे के भीतर ही खेल होता है।

आर्थिक और पर्यटन का महत्व

  • इस खेल में विजयी होने वाले बैल की बाजार में भारी मांग होती है और उनका उपयोग उत्तम नस्ल के प्रजनन के लिए किया जाता है। यह खेल के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार है।
  • यह महोत्सव राज्य में ‘सांस्कृतिक पर्यटन’ का मुख्य आकर्षण है जिसे देखने दुनिया भर से लोग आते हैं। वर्ष 2018 में इसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ‘जल्लीकट्टू प्रीमियर लीग’ का भी गठन किया गया। 
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