संदर्भ
- पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव ने अब एक हिंसक रूप ले लिया है। सीमावर्ती क्षेत्र में पाकिस्तानी सैनिकों पर हुए घातक हमले के प्रतिशोध में पाकिस्तान ने काबुल समेत अफगानिस्तान के कई प्रांतों पर हवाई हमले किए हैं। इस बिगड़ते घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने तालिबान शासन के साथ मौजूदा स्थिति को "पूर्ण युद्ध" (Open War) करार दिया है।
- यह कड़वाहट रातों-रात पैदा नहीं हुई है। इस्लामाबाद लगातार काबुल पर यह आरोप लगाता रहा है कि वह अपनी धरती का उपयोग पाकिस्तान विरोधी उग्रवादियों को शरण देने के लिए कर रहा है। हालांकि, इन दोनों पड़ोसियों के बीच विवाद की जड़ें इतिहास में काफी गहरी हैं।
- 1947 में पाकिस्तान के जन्म के साथ ही दोनों देशों के बीच अविश्वास और शत्रुता का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी जारी है। चाहे अफगानिस्तान में सोवियत संघ का दौर (1979–1989) रहा हो या अमेरिकी उपस्थिति (2001–2021), पाकिस्तान ने हमेशा वहां के विद्रोही समूहों को अपना समर्थन दिया, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के संबंधों में कभी स्थिरता नहीं आ सकी।
अफगानिस्तान का अस्थिर राजनीतिक सफर
अफगानिस्तान का राजनीतिक इतिहास सत्ता परिवर्तन और संघर्षों की एक लंबी दास्तान है:
- राजशाही से साम्यवाद तक (1973–1989): 1973 में राजशाही के पतन के बाद देश में कुछ समय के लिए राष्ट्रवाद का प्रभाव रहा, जिसके बाद सोवियत संघ की मदद से साम्यवादी शासन स्थापित हुआ। इस शासन ने कई सामाजिक सुधार करने चाहे, लेकिन गृहयुद्ध और अस्थिरता को रोकने में विफल रहा।
- नजीबुल्लाह का दौर और पतन (1989–1992): सोवियत सेना के जाने के बाद डॉ. नजीबुल्लाह ने सत्ता संभाली, लेकिन तीन साल बाद उनकी सरकार गिर गई और देश गुटीय संघर्ष की आग में झुलस गया।
- तालिबान का उदय (1992–2001): मुजाहिदीन गुटों के बीच जारी गृहयुद्ध के बीच तालिबान का उदय हुआ। पाकिस्तान के समर्थन से इस संगठन ने 1996 में काबुल पर नियंत्रण कर लिया।
- अमेरिकी हस्तक्षेप (2001–2021): 9/11 के हमलों के बाद अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से बेदखल कर एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की, लेकिन तालिबान का विद्रोह अंत तक जारी रहा।
- तालिबान की पुनः वापसी (2021): अगस्त 2021 में अमेरिकी वापसी के साथ ही तालिबान ने एक बार फिर पूरे देश पर कब्जा कर लिया, जिसमें उसे फिर से पाकिस्तान का मौन समर्थन प्राप्त था।
विवाद के मुख्य केंद्र बिंदु
- डूरंड रेखा का विवाद: अफगानिस्तान ने कभी भी डूरंड रेखा को अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार नहीं किया है, जिससे सीमा पर संप्रभुता को लेकर हमेशा टकराव बना रहता है।
- रणनीतिक नियंत्रण और व्यापार: अफगानिस्तान का मानना है कि पाकिस्तान उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर उसे अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। वहीं, व्यापारिक मार्गों और ट्रांजिट सुविधाओं को लेकर भी दोनों के बीच अक्सर ठन जाती है।
- आपसी कड़वाहट: अफगान नागरिक अपनी दुर्दशा के लिए पाकिस्तान के हस्तक्षेप को जिम्मेदार मानते हैं, जबकि पाकिस्तान का तर्क है कि उसने लाखों अफगान शरणार्थियों को पनाह दी और उनके संघर्षों में साथ दिया, फिर भी उसे बदले में केवल 'कृतघ्नता' मिली।
- भारत का प्रभाव: अफगानिस्तान के साथ भारत के बढ़ते संबंधों से पाकिस्तान हमेशा असुरक्षित महसूस करता रहा है। उसे डर है कि भारत और अफगानिस्तान मिलकर उसे रणनीतिक रूप से घेर सकते हैं। वर्तमान में तालिबान का भारत की ओर बढ़ता झुकाव पाकिस्तान के लिए चिंता का सबसे बड़ा विषय है।
डूरंड रेखा: संघर्ष की असली बुनियाद
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1893 में ब्रिटिश अधिकारी सर मॉर्टिमर डूरंड और अफगान अमीर अब्दुल रहमान खान के बीच हुए समझौते से निकली 2,640 किलोमीटर लंबी यह रेखा विवादों के घेरे में रही है। यह रेखा पश्तून समुदायों को दो हिस्सों में बांट देती है। अफगानिस्तान का तर्क है कि यह एक अस्थायी विभाजन था, न कि स्थायी सीमा। 1947 में जब पाकिस्तान ने इसे अपनी सीमा माना, तो अफगानिस्तान ने इसका कड़ा विरोध किया और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की सदस्यता के खिलाफ मतदान भी किया था।
व्यापार और ट्रांजिट की राजनीति
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भू-आबद्ध (Landlocked) होने के कारण अफगानिस्तान को समुद्री व्यापार के लिए पाकिस्तान के रास्तों पर निर्भर रहना पड़ता है। पाकिस्तान अक्सर इस निर्भरता का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने के लिए करता है। उदाहरण के तौर पर, पाकिस्तान ने कभी भी अफगानिस्तान को वाघा सीमा के रास्ते भारत के साथ व्यापार करने की अनुमति नहीं दी। जब भी पाकिस्तान कराची बंदरगाह या सड़क मार्गों को अवरुद्ध करता है, तो काबुल इसे अपनी संप्रभुता पर हमला और आर्थिक ब्लैकमेलिंग के रूप में देखता है।
आगे की राह
पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंध अब उस बिंदु पर हैं जहां केवल सैन्य बल या आर्थिक दबाव काम नहीं आएगा। जब तक डूरंड रेखा और संप्रभुता के सम्मान जैसे बुनियादी मुद्दों पर एक ठोस कूटनीतिक सहमति नहीं बनती, तब तक यह क्षेत्र अस्थिरता के साये में रहेगा। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि एक स्थिर अफगानिस्तान ही उसकी अपनी स्थिरता की गारंटी है।