संदर्भ
- 2020 में नई विनिवेश नीति तथा 2021 में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSE) नीति लागू किए जाने के बाद केंद्र सरकार ने शुरुआत में निजीकरण और रणनीतिक विनिवेश को प्रमुख सुधार उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया था।
- लेकिन हालिया नीतिगत कदम — विशेष रूप से राष्ट्रीय परिसंपत्ति मुद्रीकरण पाइपलाइन (NMP) 2.0 की शुरुआत — यह दर्शाते हैं कि अब सरकार की प्राथमिकता प्रत्यक्ष संपत्ति बिक्री से हटकर परिसंपत्तियों से मूल्य अर्जित करने और उन्हें मुद्रीकृत करने की ओर स्थानांतरित हो गई है। अब जोर पूर्ण निजीकरण के बजाय लाभांश आय बढ़ाने और परिसंपत्तियों को लीज़ पर देकर राजस्व जुटाने पर है।
विनिवेश नीति का क्रमिक विकास
2020–21: निजीकरण पर प्रारंभिक बल
- 2021 की PSE नीति ने निम्नलिखित सिद्धांत निर्धारित किए:
- गैर-रणनीतिक क्षेत्रों से सरकार का चरणबद्ध बाहर निकलना
- रणनीतिक क्षेत्रों में सीमित सरकारी उपस्थिति बनाए रखना
- जहां निजी क्षेत्र सक्षम हो, वहां रणनीतिक विनिवेश को बढ़ावा देना
मूल तर्क
- सरकार को प्रत्यक्ष व्यावसायिक गतिविधियों में अपनी भूमिका कम करनी चाहिए, क्योंकि निजी क्षेत्र को उद्यम प्रबंधन में अधिक कुशल माना जाता है।
विनिवेश आय में गिरावट की प्रवृत्ति
अस्थायी उछाल
- वित्त वर्ष 2022–23 में विनिवेश से ₹35,294 करोड़ की प्राप्ति हुई। इसमें ONGC, LIC, GAIL और IRCTC में हिस्सेदारी बिक्री शामिल थी। इससे चार वर्षों से जारी गिरावट की श्रृंखला पर अस्थायी विराम लगा।
इसके बाद पुनः कमी
- इसके पश्चात विनिवेश आय में फिर तेज गिरावट देखी गई:
- 2023–24: ₹16,507 करोड़
- 2024–25: ₹10,163 करोड़
- 2025–26 (अब तक): ₹15,562 करोड़
नीतिगत संकेतक
- कुछ बदलाव इस बात की ओर संकेत करते हैं कि निजीकरण की प्राथमिकता कम हुई है:
- बजट में “विनिवेश” शीर्षक को अलग श्रेणी के रूप में समाप्त करना
- विनिवेश आय को “विविध पूंजीगत प्राप्तियों” में शामिल करना
- वार्षिक विनिवेश लक्ष्य निर्धारित न करना
निजीकरण की गति कम होने के कारण
निजी निवेशकों की सीमित दिलचस्पी
- कई कारणों से अनेक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम निजी क्षेत्र के लिए आकर्षक नहीं रहे:
- अत्यधिक कर्मचारी संख्या
- घाटे में चल रही इकाइयाँ
- संरचनात्मक कमियाँ
- राजनीतिक तथा श्रमिक विरोध
लाभांश आय पर बढ़ता ध्यान
सुसंगत लाभांश नीति (2020):
- निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) ने CPSEs को अधिक लाभांश वितरित करने, नकदी भंडार का बेहतर उपयोग करने तथा पूंजीगत व्यय और लाभप्रदता में संतुलन बनाए रखने का सुझाव दिया।
पूंजी पुनर्गठन दिशा-निर्देश (2024):
- इन संशोधित दिशानिर्देशों में CPSEs में मूल्य संवर्धन और सरकार के लिए अधिकतम प्रतिफल सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
लाभांश प्राप्तियों में वृद्धि
- लाभांश आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई:
- 2020–21: ₹39,750 करोड़
- 2024–25: ₹74,128 करोड़
- 2025–26 (अब तक): ₹59,730 करोड़
- वर्तमान में लाभांश से होने वाली आय, विनिवेश से प्राप्त राजस्व की तुलना में कहीं अधिक है।
परिसंपत्ति मुद्रीकरण: उभरती रणनीति
राष्ट्रीय परिसंपत्ति मुद्रीकरण पाइपलाइन (NMP)
- 2021 में आरंभ इस कार्यक्रम का उद्देश्य ब्राउनफील्ड अवसंरचना परिसंपत्तियों को लीज़ पर देकर उनसे आय अर्जित करना है। इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं:
- स्वामित्व सरकार के पास ही रहता है
- निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित करना
- निष्क्रिय या कम उपयोग वाली परिसंपत्तियों से राजस्व सृजित करना
प्रदर्शन:
- 2021–25 के लिए निर्धारित ₹6 लाख करोड़ के लक्ष्य का लगभग 90% प्राप्त किया जा चुका है।
NMP 2.0 (2025–30)
- लक्ष्य: ₹16.72 लाख करोड़
- प्राथमिक क्षेत्र: परिवहन अवसंरचना, ऊर्जा, दूरसंचार, वेयरहाउसिंग आदि
- यह परिसंपत्ति मुद्रीकरण मॉडल के विस्तार को दर्शाता है।
इस नई रणनीति के लाभ
राजकोषीय दृष्टि से
- लाभांश के माध्यम से नियमित और अपेक्षाकृत स्थिर आय
- निजीकरण की तुलना में कम राजनीतिक विरोध
- एकमुश्त परिसंपत्ति बिक्री से बचाव
आर्थिक दृष्टि से
- सार्वजनिक परिसंपत्तियों का बेहतर उपयोग
- निजी क्षेत्र की दक्षता का लाभ उठाना
- स्वामित्व सरकार के पास बनाए रखना
प्रशासनिक दृष्टि से
- रणनीतिक विनिवेश की तुलना में कम जटिल प्रक्रिया
- अपेक्षाकृत शीघ्र क्रियान्वयन
चुनौतियाँ और आगे की दिशा
राजकोषीय जोखिम
- यदि अत्यधिक लाभांश निकाला गया तो CPSEs की पुनर्निवेश क्षमता प्रभावित हो सकती है। लंबे समय तक लाभांश पर निर्भरता विकास क्षमता को कमजोर कर सकती है।
कॉर्पोरेट प्रशासन में सुधार
- पेशेवर और स्वतंत्र प्रबंधन
- राजनीतिक हस्तक्षेप में कमी
चयनात्मक निजीकरण
- घाटे वाले गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में निजीकरण पर ध्यान केंद्रित करना
संरचनात्मक चुनौतियाँ
- CPSEs में कार्यकुशलता की समस्याएँ बनी हुई हैं
- परिसंपत्ति मुद्रीकरण से संचालन संबंधी अक्षमताएँ स्वतः समाप्त नहीं होतीं
संतुलित सुधार दृष्टिकोण
- रणनीतिक विनिवेश, परिसंपत्ति मुद्रीकरण और प्रशासनिक सुधारों का संयोजन आवश्यक है।
बाज़ार से जुड़ी अनिश्चितताएँ
- निजी क्षेत्र की भागीदारी आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है, जिससे मुद्रीकरण आय में उतार-चढ़ाव संभव है।
पारदर्शिता और निगरानी
- पारदर्शी निविदा प्रक्रिया
- प्रभावी नियामक व्यवस्था
संतुलित लाभांश नीति
- लाभांश वितरण और पूंजीगत व्यय के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र सुधार की दिशा अब प्रत्यक्ष निजीकरण से हटकर परिसंपत्ति मुद्रीकरण और लाभांश-आधारित राजस्व मॉडल की ओर अग्रसर है। हालांकि यह रणनीति नियमित राजस्व और अपेक्षाकृत राजनीतिक स्वीकार्यता प्रदान करती है, किंतु इसकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार राजस्व सृजन और CPSEs की वित्तीय मजबूती तथा प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के बीच संतुलन कैसे बनाए रखती है। दीर्घकालीन और टिकाऊ सार्वजनिक क्षेत्र प्रबंधन के लिए निजीकरण, मुद्रीकरण और सुशासन सुधारों का संतुलित मिश्रण आवश्यक होगा।