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इस्पात उद्योग की चिमनियाँ और SO₂ उत्सर्जन: नियमन की कमी से बढ़ता स्वास्थ्य जोखिम

चर्चा में क्यों ?

झारखंड में स्थित Steel Authority of India Limited (SAIL) का बोकारो इस्पात संयंत्र भारत के सबसे पुराने और प्रमुख स्टील प्लांटों में से एक है। हालांकि, इसके वायु प्रदूषक उत्सर्जन-विशेषकर सल्फर डाइऑक्साइड (SO)-ने आसपास के क्षेत्रों में बच्चों के स्वास्थ्य और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाला है।

स्वास्थ्य प्रभाव आकलन (HIA) के निष्कर्ष

  • Centre for Research on Energy and Clean Air (CREA) द्वारा जारी एक स्वास्थ्य प्रभाव आकलन (HIA) रिपोर्ट में वित्तीय वर्ष 2023 के उत्सर्जन डेटा का विश्लेषण किया गया। 
    • प्रमुख निष्कर्ष:
      • बच्चों पर प्रभाव (प्रति वर्ष अनुमानित)
      • 270 कम वजन वाले शिशुओं का जन्म
      • 280 समय से पहले जन्म (प्री-टर्म)
      • 25 नए अस्थमा के मामले
    • वयस्कों पर प्रभाव
      • PM2.5 और NO संपर्क से 170 अनुमानित समयपूर्व मौतें
      • अस्थमा से संबंधित 290 आपातकालीन कक्ष दौरे
    • आर्थिक प्रभाव
      • लगभग 123,000 कार्य दिवसों का नुकसान
      • 2023 में -79-80 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹640 करोड़) का वार्षिक आर्थिक बोझ 

प्रदूषण नियंत्रण में तकनीकी कमियां

  • रिपोर्ट के अनुसार:
    • संयंत्र में अत्यधिक प्रदूषणकारी कोयले और कोक का उपयोग।
    • सिंटर स्टैक की 6 नलिकाओं में से केवल 2 में आधुनिक इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर (ESP) लगे हैं।
    • शेष में पुराने साइक्लोन डस्ट कलेक्टर, जो कम प्रभावी और अधिक प्रदूषणकारी हैं। 

राष्ट्रीय स्तर की समस्या

  • Central Pollution Control Board (CPCB) इस्पात उद्योग को 17 अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों में वर्गीकृत करता है।
  • भारत की वार्षिक इस्पात उत्पादन क्षमता -20 करोड़ टन।
  • 2030 तक विस्तार की योजना।
  • वैश्विक कोयला-आधारित इस्पात विस्तार क्षमता में भारत की हिस्सेदारी -57%।
  • 2014 में CPCB ने निरंतर उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (CEMS) अनिवार्य की थी, लेकिन कई इकाइयों में क्रियान्वयन अधूरा।
  • डेटा सार्वजनिक रूप से सीमित।
  • ऐतिहासिक डेटा का अभाव।

नीति-शून्यता: SO₂ मानकों का अभाव

  • यद्यपि ताप विद्युत संयंत्रों के लिए SO मानक मौजूद हैं, लेकिन इस्पात संयंत्रों की विभिन्न चिमनियों के लिए राष्ट्रीय SO उत्सर्जन मानक अनुपस्थित हैं।
  • यह नियामक अंतर:
    • बच्चों के स्वास्थ्य को खतरे में डालता है
    • स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ाता है
    • औद्योगिक पारदर्शिता को कमजोर करता है। 

विशेषज्ञों की राय

  • CREA के प्रमुख विश्लेषक लॉरी माइलीविर्टा के अनुसार,
  • “भारत को ‘पहले प्रदूषण फैलाओ, बाद में सफाई करो’ मॉडल अपनाने की आवश्यकता नहीं है, जबकि स्वच्छ तकनीक पहले से उपलब्ध है।”
  • CREA की विश्लेषक अनुभा अग्रवाल ने कहा, “बोकारो का मामला इस क्षेत्र की पारदर्शिता की कमी और कमजोर मानकों का उदाहरण है। क्षमता विस्तार से पहले प्रभावी विनियमन आवश्यक है।”

आगे का रास्ता

  • इस्पात संयंत्रों के लिए राष्ट्रीय SO उत्सर्जन मानक अधिसूचित किए जाएं।
  • CEMS डेटा को सार्वजनिक डोमेन में नियमित रूप से उपलब्ध कराया जाए।
  • कोयला-आधारित उत्पादन से स्वच्छ उत्पादन मार्गों की ओर संक्रमण।
  • प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों (जैसे उन्नत ESP, FGD सिस्टम) का सार्वभौमिक उपयोग।

वायु प्रदूषक उत्सर्जन - विशेषकर सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂)

सल्फर डाइऑक्साइड (SO) एक रंगहीन, तीखी गंध वाली गैस है जो मुख्य रूप से सल्फर युक्त ईंधन (जैसे कोयला और डीज़ल) के जलने से निकलती है। यह प्रमुख वायु प्रदूषकों में से एक है।

मुख्य स्रोत

  • कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र
  • इस्पात और रिफाइनरी उद्योग
  • भारी डीज़ल ईंधन वाले वाहन और जहाज
  • ईंट-भट्टे और अन्य औद्योगिक इकाइयाँ
  • भारत में कोयला आधारित बिजली संयंत्र SO के सबसे बड़े स्रोत माने जाते हैं।

स्वास्थ्य पर प्रभाव 

  • सांस लेने में तकलीफ, खांसी
  • अस्थमा और ब्रोंकाइटिस की समस्या बढ़ना
  • बच्चों और बुजुर्गों पर अधिक प्रभाव
  • हृदय रोग का जोखिम बढ़ना
  • SO हवा में मौजूद अन्य कणों के साथ मिलकर PM2.5 कण बना सकता है, जो फेफड़ों में गहराई तक पहुंचते हैं।

पर्यावरण पर प्रभाव

  • एसिड रेन (अम्लीय वर्षा) का निर्माण
  • पेड़-पौधों और फसलों को नुकसान
  • ऐतिहासिक इमारतों का क्षरण
  • मिट्टी और जल स्रोतों की गुणवत्ता में गिरावट

नियंत्रण और समाधान

  • बिजली संयंत्रों में Flue Gas Desulfurization (FGD) तकनीक लगाना
  • सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (CEMS)
  • नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण
  • सख्त उत्सर्जन मानक लागू करना

ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (CREA):

  • Centre for Research on Energy and Clean Air (CREA) एक स्वतंत्र शोध संगठन है, जो ऊर्जा, वायु प्रदूषण और उनके स्वास्थ्य-आर्थिक प्रभावों पर डेटा-आधारित विश्लेषण करता है। 
  • इसका उद्देश्य प्रदूषण के स्रोतों, रुझानों और समाधान को उजागर कर नीति-निर्माण में साक्ष्य उपलब्ध कराना है।

मुख्य कार्यक्षेत्र

  1. वायु प्रदूषण विश्लेषण - PM2.5, SO, NO जैसे प्रदूषकों के स्रोत और प्रभाव का अध्ययन।
  2. ऊर्जा नीति अनुसंधान - कोयला आधारित ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा संक्रमण पर रिपोर्ट।
  3. स्वास्थ्य प्रभाव आकलन (HIA) - प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों, समयपूर्व मृत्यु और आर्थिक लागत का अनुमान।
  4. डेटा पारदर्शिता - सार्वजनिक डोमेन डेटा, सैटेलाइट और मॉनिटरिंग स्रोतों से विश्लेषण।
  5. नीति सुझाव - स्वच्छ उत्पादन मार्ग, उत्सर्जन मानक और निगरानी तंत्र पर सिफारिशें।

प्रमुख मुद्दे जिन पर CREA काम करता है

  • कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र
  • इस्पात और सीमेंट जैसे भारी उद्योग
  • सल्फर डाइऑक्साइड (SO) उत्सर्जन
  • सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (CEMS)
  • जलवायु परिवर्तन और ग्रीनहाउस गैसें

महत्व

  • सरकारों, मीडिया और नागरिक समाज को वैज्ञानिक साक्ष्य प्रदान करना।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर प्रदूषण के प्रभाव को मात्रात्मक रूप से सामने लाना।
  • स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की दिशा में नीति संवाद को मजबूत करना।

निष्कर्ष

बोकारो इस्पात संयंत्र का मामला केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर नियामक खामियों और पारदर्शिता के अभाव का संकेत है। जैसे-जैसे भारत इस्पात उत्पादन बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे सख्त उत्सर्जन मानक, डेटा पारदर्शिता और स्वच्छ तकनीक अपनाना अनिवार्य हो जाता है-ताकि आर्थिक विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाया जा सके।

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