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केशवानंद भारती मामला फिर से चर्चा में

प्रारंभिक परीक्षा: संविधान की मूल संरचना,  केशवानंद भारती केस, शंकरी प्रसाद केस, गोलकनाथ केस, 24वां संविधान संशोधन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण
मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन, पेपर-2

संदर्भ:

  • संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को निर्धारित करने वाले केशवानंद भारती केस का ऐतिहासिक फैसला अब सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर भारत की 10 भाषाओं में उपलब्ध है।
  • 2023 में केशवानंद भारती मामले पर फैसले के 50 वर्ष पूरे हुए।

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केशवानंद भारती मामला:

  • 24 अप्रैल 1973 को केशवानंद भारती मामले में ऐतिहासिक फैसला आया था।  
  • 24 अप्रैल को 50 वर्ष पूरे होने पर केशवानंद भारती मामले से जुड़ी अवधारणा से संबंधित एक वेब पेज भी शुरू किया गया है।  
  • यह मामला कई मायनों में ऐतिहासिक है-
    • इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 13 जजों की संवैधानिक पीठ ने की थी।  
    • यह पहला और आखिरी मौका था जब किसी मामले की सुनवाई के लिए इतनी बड़ी जजों की पीठ बनी थी।
    • इस फैसले से संविधान की मूल संरचना या मूल ढांचा या बेसिक स्ट्रक्चर का कॉन्सेप्ट आया था।
  • इस बेंच में तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस. एम. सीकरी, जस्टिस जे.एम. शेलट, जस्टिस के.एस. हेगड़े, जस्टिस ए.एन. ग्रोवर, जस्टिस ए.एन. रे, जस्टिस पी. जगनमोहन रेड्डी, जस्टिस डी.जी. पालेकर, जस्टिस एच.आर. खन्ना, जस्टिस के.के. मैथ्यू, जस्टिस एम.एच. बेग, जस्टिस एस.एन. द्विवेदी, जस्टिस बी.के. मुखर्जी और जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़ शामिल थे।

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केशवानंद भारती मामले की पृष्ठभूमि:

  • संविधान के अनुच्छेद 368 में संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार हासिल है।
  • संविधान लागू होने के एक साल बाद ही प्रश्न उठने लगा कि क्या संसद मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है।
  • 1951 के शंकरी प्रसाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद के लिए अनुच्छेद 368 में संशोधन की शक्ति के तहत ही मौलिक अधिकारों में संशोधन की शक्ति निहित है।
  • 1967 में गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया कि संसद मौलिक अधिकार में न तो कटौती कर सकती है और न ही नागरिकों के किसी मौलिक अधिकार को छीन सकती है।
  • गोलकनाथ फैसले के बाद इंदिरा गांधी की सरकार ने संसद से 24वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971 पारित कराया।
  • 24वें संशोधन से सरकार ने अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में ही संशोधन कर दिया, जिससे मौलिक अधिकारों को सीमित करने की शक्ति मिल गई।
  • अन्य घटनाक्रम:
    • 19 जुलाई 1969 को पी.एन.बी. समेत देश के 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
    • इंदिरा गांधी ने रजवाड़ों को मिलने वाले 'प्रिवी पर्स'  को खत्म कर दिया।
    • उपर्युक्त दोनों मामलों को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहरा दिया।
  • 24वें संविधान संशोधन के तहत सुप्रीम कोर्ट के मौलिक अधिकार की न्यायिक समीक्षा के अधिकार को ही सीमित कर दिया।
  • बैंकों के राष्ट्रीयकरण और रजवाड़ों को मिलने वाले 'प्रिवी पर्स' के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसले दिए थे, उन्हें संविधान संशोधन करके इंदिरा गांधी ने एक-एक कर रद्द कर दिया था।
  • निरंकुशता की ओर बढ़ती प्रवृत्ति के बीच 1973 के केशवानंद भारती मामले में आया फैसला बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक बन गया।

क्या है केशवानंद भारती मामला:

  • केशवानंद भारती केरल के एक धार्मिक मठ के प्रमुख थे। 
  • केरल की सरकार ने उनके मठ के प्रबंधन के अधिकार को सीमित कर दिया था, जिसके खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
  • इंदिरा गांधी की सरकार में कई संवैधानिक संशोधनों से सवाल उठने लगे थे कि क्या संसद के जरिए मनमाने तरीके से संविधान में कुछ भी बदलाव किया जा सकता है! न्यायलय को इसका जबाव देना था।
  • पीठ ने करीब 70 दिनों तक मामले की सुनवाई की थी। इसके लिए 70 से ज्यादा देशों के संविधान का अध्ययन किया गया।  

केशवानंद भारती केस में निर्णय:

  • फैसला कुल 703 पन्नों में आया।
  • इस मामले से संविधान के मूल ढांचे की अवधारणा बनी।
  • मूल ढांचे की अवधारणा से सुनिश्चित किया गया कि संसद को मिले संविधान संशोधन के अधिकार के नाम पर देश के संविधान में मनमाना बदलाव नहीं किया जा सकता है। 
  • संसद संविधान में कहीं भी संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
  • केशवानंद भारती केस में आए फैसले ने ये तो स्थापित कर दिया कि देश में संविधान से ऊपर कोई नहीं है।

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संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का सिद्धांत:

  • निर्णय में मूल संरचना को परिभाषित नहीं किया गया है।
  • न्यायलय के फैसलों के आधार पर मूल संरचना में आने वाले घटकों की पहचान की जाती है।
  • उदाहरण के तौर पर-
    • संविधान की सर्वोच्चता
    • विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति का बंटवारा
    • संविधान का धर्मनिरपेक्ष चरित्र
    • संविधान का संघीय चरित्र
    • न्यायिक समीक्षा
    • संसदीय प्रणाली
    • स्वतंत्र न्यायिक प्रणाली; आदि

प्रश्न: प्रश्न-  निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 

केस वर्ष 
1. केशवानंद भारती केस 1973
2. शंकरी प्रसाद केस 1967
3. गोलकनाथ केस    1951

 उपर्युक्त युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?

(a) केवल एक 

(b) केवल दो 

(c) केवल तीन 

(d)  कोई नहीं  

उत्तर- (a)

मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न: 

केशवानंद भारती केस में आए फैसले ने स्थापित कर दिया कि देश में संविधान से ऊपर कोई नहीं है। विश्लेषण करें।

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