चर्चा में क्यों?
हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ने 18वीं शताब्दी के दौरान राजस्थान के खेजड़ली गाँव में खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाली अमृता देवी विश्नोई और सभी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की है।
खेजड़ी के पेड़ के बारे में
- वैज्ञानिक रूप से प्रोसोपिस सिनेरिया (Prosopis cineraria) कहलाने वाले खेजड़ी को राजस्थान में एक पवित्र पेड़ माना जाता है।
- स्थानीय नाम: अलवर, सीकर, झुंझुनू जैसे क्षेत्रों में इसे जंत या जांती भी कहा जाता है।
- राज्य वृक्ष: खेजड़ी को राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया है।
- वितरण क्षेत्र: यह मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली के शुष्क और अर्ध-शुष्क भागों तथा दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में पाया जाता है।
खेजड़ी के पेड़ की मुख्य विशेषताएँ:
- कठोर जलवायु सहन करने की क्षमता: यह पेड़ पाला (frost) और सूखा रोधी है। यह गर्मियों में 40 से 45 डिग्री सेल्सियस और सर्दियों में 10 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान जैसी चरम स्थितियों को सहन कर सकता है।
- न्यूनतम जल की आवश्यकता: यह 100 से 600 मिमी तक की वर्षा वाले क्षेत्रों में भी आसानी से पनप सकता है।
- मरुस्थलीय अनुकूलन: यह सबसे गर्म हवाओं और सबसे शुष्क मौसम को झेल सकता है तथा ऐसी जगहों पर जीवित रह सकता है जहाँ अन्य पौधे नष्ट हो जाते हैं।
- संरचना: यह एक पर्णपाती (deciduous) पेड़ है, जिसकी पत्तियाँ बहुत बारीक और पंखनुमा (feathery) होती हैं तथा इस पर छोटे-छोटे पीले फूल खिलते हैं। शुष्क और रेतीली मिट्टी में इसकी अनुकूलन क्षमता अद्भुत है।
खेजड़ी का महत्व और उपयोगिता:
- मिट्टी की उर्वरता: यह एक नाइट्रोजन-स्थिरीकरण (nitrogen-fixing) करने वाला पेड़ है, जो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाता है।
- पारिस्थितिकी संतुलन: यह थार रेगिस्तान के मुख्य शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- भोजन और चारा: इसके पोषक तत्वों से भरपूर पत्ते मवेशियों के लिए बेहतरीन चारा बनते हैं, जबकि इसकी पौष्टिक फलियाँ (जिन्हें सांगरी कहा जाता है) इंसानों के लिए एक लोकप्रिय स्थानीय सब्जी के रूप में उपयोग की जाती हैं।
- औषधीय गुण: इस पेड़ की छाल का उपयोग कई प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता है।