संदर्भ
भारत की संसदीय व्यवस्था में विधान परिषदें राज्य स्तर पर द्विसदनीय विधायिका का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों की समीक्षा करना, कानून निर्माण की प्रक्रिया को अधिक विचारशील बनाना और लोकतांत्रिक व्यवस्था में संतुलन स्थापित करना है। हाल ही में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनावों के बाद इन सदनों की भूमिका, शक्तियों और प्रासंगिकता को लेकर चर्चा तेज हुई है।
ब्रिटिश भारत में विधान परिषदों की शुरुआत
- भारत में विधान परिषदों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ब्रिटिश शासन से जुड़ी हुई है। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत मद्रास, बॉम्बे, बंगाल, संयुक्त प्रांत, बिहार और असम सहित छह बड़े प्रांतों में द्विसदनीय विधायिका की व्यवस्था की गई थी। उस समय विधान परिषदों के लिए निर्वाचक मंडल बेहद सीमित था और मतदान का अधिकार मुख्य रूप से संपन्न एवं शिक्षित वर्ग के लोगों तक ही सीमित था।
- इन परिषदों को प्रांतीय विधानसभाओं के कार्यों की समीक्षा करने और विधेयकों पर पुनर्विचार करने वाले सदन के रूप में स्थापित किया गया था। ये स्थायी सदन थे, जिन्हें भंग नहीं किया जा सकता था। सदस्यों का कार्यकाल नौ वर्ष था और प्रत्येक तीन वर्ष में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते थे। उस समय विधेयकों को पारित करने के मामले में विधान परिषदों को विधानसभाओं के समान अधिकार प्राप्त थे।
संविधान सभा में विधान परिषदों पर विचार-विमर्श
- स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा में राज्यों में विधान परिषदों की स्थापना को लेकर व्यापक चर्चा हुई। इसके समर्थकों का मानना था कि विधान परिषदें विधानसभाओं द्वारा जल्दबाजी में बनाए गए कानूनों की समीक्षा करके बेहतर कानून निर्माण में सहायता करेंगी। वहीं, विरोध करने वाले सदस्यों ने इन्हें सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बताया।
- इसके अलावा, परिषदों की संरचना और कार्यप्रणाली से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों को संसद के सामान्य कानूनों पर छोड़ने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाए गए। अंततः विभिन्न पक्षों पर विचार करने के बाद संविधान में विधान परिषदों से संबंधित प्रावधानों को शामिल किया गया।
विधान परिषदों की संवैधानिक संरचना और गठन
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 168 महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में द्विसदनीय विधायिका का प्रावधान करता है। इन राज्यों में विधानसभा के साथ विधान परिषद भी कार्यरत है।
- अनुच्छेद 169 के तहत संसद को किसी राज्य में विधान परिषद के गठन या उसे समाप्त करने का अधिकार है। हालांकि, इसके लिए संबंधित राज्य विधानसभा को अपने कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है।
- अनुच्छेद 171 के अनुसार, विधान परिषद की सदस्य संख्या संबंधित विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती। साथ ही, इसमें कम से कम 40 सदस्य होना अनिवार्य है।
- विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन और मनोनयन पांच श्रेणियों के माध्यम से होता है:
- एक-तिहाई सदस्य नगरपालिकाओं और अन्य स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं।
- एक-बारहवां हिस्सा कम से कम तीन वर्ष से स्नातक व्यक्तियों द्वारा निर्वाचित होता है।
- एक-बारहवां हिस्सा कम से कम तीन वर्षों से माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापन कर रहे शिक्षकों द्वारा चुना जाता है।
- एक-तिहाई सदस्य राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
- शेष एक-छठा हिस्सा राज्यपाल द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से मनोनीत किया जाता है।
- अनुच्छेद 172 के अनुसार, विधान परिषद स्थायी सदन है और इसे भंग नहीं किया जा सकता। इसके सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष होता है तथा प्रत्येक दो वर्ष में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं। इसके अतिरिक्त, मुख्यमंत्री सहित राज्य सरकार के मंत्री विधान परिषद के सदस्य भी हो सकते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे केंद्र में मंत्री राज्यसभा के सदस्य हो सकते हैं।
विधान परिषद की शक्तियां और सीमाएं
- विधान परिषद का प्रमुख कार्य विधायी प्रक्रिया की समीक्षा करना और कानून निर्माण में सुधार के सुझाव देना है। हालांकि, इसकी शक्तियां विधानसभा की तुलना में सीमित हैं।
- किसी विधेयक पर दोनों सदनों के बीच असहमति होने पर संयुक्त बैठक बुलाने का प्रावधान नहीं है। विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को ही अंतिम माना जाता है। विधान परिषद सामान्य विधेयकों को अधिकतम चार महीने तक विलंबित कर सकती है। इस प्रकार, यह कानून निर्माण की प्रक्रिया में पुनर्विचार का अवसर तो देती है, लेकिन विधानसभा के निर्णय को स्थायी रूप से रोक नहीं सकती।
विधान परिषदों के गठन और उन्मूलन से जुड़ी चुनौतियां
- भारत में विधान परिषदों के गठन और समाप्ति के फैसले कई बार राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित रहे हैं। तमिलनाडु में वर्ष 1986 में मुख्यमंत्री एम. जी. रामचंद्रन के कार्यकाल के दौरान विधान परिषद समाप्त कर दी गई थी। वर्ष 2010 में एम. करुणानिधि के नेतृत्व में इसके पुनर्गठन का प्रस्ताव पारित हुआ, लेकिन 2011 में जे. जयललिता के मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा ने इसके पुनर्गठन के विरोध में प्रस्ताव पारित कर दिया।
- इसी तरह, आंध्र प्रदेश में वर्ष 1985 में एन. टी. रामाराव के कार्यकाल में विधान परिषद समाप्त की गई, जिसे वर्ष 2007 में दोबारा स्थापित किया गया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि विधान परिषदों का भविष्य कई बार राजनीतिक प्राथमिकताओं पर निर्भर करता रहा है।
आगे की राह
- दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने वर्ष 2007 में अपनी स्थानीय शासन संबंधी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि सभी राज्यों में विधान परिषदों को स्थानीय सरकारों की परिषद के रूप में विकसित किया जा सकता है। आयोग के अनुसार, बढ़ती साक्षरता के मद्देनजर स्नातकों और शिक्षकों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की आवश्यकता पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। इसके बजाय परिषद के सभी सदस्यों का निर्वाचन स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के माध्यम से कराने पर विचार किया जा सकता है।
- इस सुझाव को अपनाने से विधान परिषदें स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के हितों की प्रभावी प्रतिनिधि बन सकती हैं। इससे स्थानीय स्तर की समस्याओं को राज्य की विधायी प्रक्रिया में उचित स्थान मिलेगा।
निष्कर्ष
विधान परिषदें भारतीय लोकतंत्र में कानून निर्माण की प्रक्रिया को अधिक व्यापक और विचारशील बनाने का अवसर प्रदान करती हैं। हालांकि, सीमित विधायी शक्तियों, अतिरिक्त वित्तीय खर्च और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसी चुनौतियां इनकी उपयोगिता पर सवाल खड़े करती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इनकी संरचना और कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाया जाए, ताकि ये केवल औपचारिक संस्थाएं बनकर न रह जाएं, बल्कि स्थानीय निकायों के हितों की रक्षा करने और बेहतर शासन व्यवस्था स्थापित करने में सार्थक योगदान दे सकें।