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मालाबार विद्रोह: स्वतंत्रता संग्राम का एक अनकहा अध्याय

(प्रारंभिक परीक्षा: आधुनिक भारत का इतिहास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-1: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।)

संदर्भ

अब्बास पनक्कल की नई पुस्तक ‘Musaliar King: Decolonial Historiography of Malabar’s Resistance’ ने मालाबार विद्रोह (1921-22) पर नया प्रकाश डाला है, जो स्वतंत्रता संग्राम का एक कम चर्चित हिस्सा है।

मालाबार विद्रोह के बारे में

  • क्या था: वर्ष 1921 में केरल के मालाबार क्षेत्र में मोपला/माप्पिला (मुस्लिम) समुदाय ने ब्रिटिश शासन और जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किया।
  • नेतृत्व: अली मुसलियार इस विद्रोह के प्रमुख आध्यात्मिक नेता थे जिन्हें स्थानीय लोग ‘मुसलियार उप्पापा’ और ब्रिटिश ‘मुसलियार किंग’ कहते थे।
  • स्थान: मुख्य रूप से तिरुरंगड़ी (मालाबार) में केंद्रित रहा जहाँ मस्जिद विद्रोह की यादों का प्रतीक बनी।

पृष्ठभूमि

  • औपनिवेशिक शोषण: मालाबार में 16वीं सदी से ही पुर्तगालियों एवं ब्रिटिशों के खिलाफ विरोध था। हिंदू एवं मुस्लिम समुदाय मिलकर कोझिकोड के ज़मोरिन (हिंदू राजा) का समर्थन करते थे।
  • मोपला समुदाय: मालाबार के मुस्लिम, जिन्हें मोपला कहा जाता है, मुख्य रूप से व्यापारी और किसान थे। इन्हें ब्रिटिश नीतियों और जमींदारों से शिकायत थी।
  • खिलाफत आंदोलन: वर्ष 1919 में शुरू हुआ यह आंदोलन तुर्की के खलीफा के पद को बचाने के लिए था। मालाबार में यह असहयोग आंदोलन के साथ जुड़ा।
  • मंजेरी सम्मेलन: अप्रैल 1920 में मालाबार जिला कांग्रेस सम्मेलन ने विद्रोह की नींव रखी, जहां स्थानीय शिकायतों पर चर्चा हुई।
  • सामाजिक संरचना: मालाबार में हिंदू एवं मुस्लिम समुदायों के बीच सौहार्द था, जो धार्मिक आयोजनों, जैसे- ‘नेरचा’ (मुस्लिम) और ‘उत्सवम’ (हिंदू) में दिखता था।

मालाबार विद्रोह : अनछुए पहलू

  • मालाबार विद्रोह को मप्पिला या मोपला विद्रोह भी कहते हैं। इसकी शुरूआत वर्ष 1921 में केरल के मालाबार क्षेत्र में हुई थी। यह एक सशस्त्र विद्रोह था जिसका नेतृत्व वरियामकुन्नाथु कुन्हाहमद हाजी ने किया था।
  • वरियामकुन्नाथु हाजी एक कट्टर मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता को सांप्रदायिक दंगों के लिये मक्का निर्वासन का सामना करना पड़ा था। 
  • इसका तात्कालिक कारण वर्ष 1920 में कांग्रेस द्वारा शुरू किया गया खिलाफत एवं असहयोग आंदोलन था। इन आंदोलनों से प्रेरित ब्रिटिश-विरोधी भावना से दक्षिण मालाबार के मुस्लिम मप्पिलाओं को प्रोत्साहन मिला। 
  • यह विद्रोह अंग्रेजों के उस काश्तकारी कानून के विरोध में शुरू हुआ था, जो ज़मींदारों के पक्ष में था। इसमें किसानों के लिये पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शोषणकारी व्यवस्था थी।
  • नए कानून ने किसानों को भूमि एवं उसकी उपज के सभी गारंटीकृत अधिकारों से वंचित कर भूमिहीन बना दिया। इसमें अधिकांश ज़मींदार नंबूदरी ब्राह्मण थे, जबकि अधिकांश काश्तकार मप्पिला मुसलमान थे। इस कारण यह विद्रोह सांप्रदायिक हो गया।
  • अरब सागर के माध्यम से मुस्लिम व्यापारी केरल पहुंचे। वे स्थानीय महिलाओं से विवाह करके केरल में बस गए। ऐसे मुस्लिम व्यापारियों के वंशज को मोपला कहा जाता है। 
  • 18वीं सदी में हैदरी अली ने इस क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया। धर्मांतरण एवं उत्पीड़न से बचने के लिये कई हिंदू ज़मींदार पड़ोसी क्षेत्रों में चले गए। इससे मोपलाओं को भूमि स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो गया। 
  • वर्ष 1799 में टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद मालाबार ब्रिटिश शासन का हिस्सा बन गया। ऐसे में हिंदू ज़मींदारों ने भूमि पर अपना स्वामित्व पुन: प्राप्त करने की कोशिश की। इस कारण विद्रोह से पूर्व भी कई दंगे हुए।

कारण

  • आर्थिक शोषण: 
    • मोपला किरायेदारों (पट्टेदारों) को कोई स्थायी भूमि अधिकार नहीं था।
    • उच्च किराया, नवीकरण शुल्क और जमींदारों द्वारा उत्पीड़न।
  • औपनिवेशिक दमन: ब्रिटिश नीतियों ने स्थानीय व्यापार और कृषि को नुकसान पहुंचाया। मस्जिदों व धार्मिक स्थानों पर नियंत्रण बढ़ा।
  • खिलाफत का प्रभाव: खिलाफत आंदोलन ने मुस्लिम समुदाय को प्रेरित किया, जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट हुआ।
  • असहयोग आंदोलन: कांग्रेस के असहयोग आंदोलन ने मालाबार में स्वदेशी भावना को बढ़ावा दिया।
  • स्थानीय नेतृत्व: अली मुसलियार जैसे नेताओं ने सामुदायिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर लोगों को संगठित किया।

मुख्य बिंदु

  • प्रमुख घटनाएँ: 
    • अगस्त 1921 में तिरुरंगड़ी में विद्रोह शुरू हुआ, जहां मोपलाओं ने ब्रिटिश अधिकारियों और जमींदारों के खिलाफ हथियार उठाए।
    • विद्रोह वल्लुवनद तालुक और अन्य क्षेत्रों में फैला, जहाँ हिंदू किसानों ने भी समर्थन दिया।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: हिंदू एवं मुस्लिम समुदायों ने मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया। मालाबार के पुलिस अधीक्षक आर.एन. हिचकॉक ने भी माना कि दक्षिण-पूर्वी वल्लुवनद में हिंदुओं ने हिस्सा लिया।
  • ब्रिटिश दमन: ब्रिटिश सेना ने विद्रोह को कुचलने के लिए भारी बल प्रयोग किया। हजारों लोग मारे गए और अली मुसलियार को 1922 में फांसी दी गई।
  • विस्थापन: परिवार बेघर हुए, संपत्ति नष्ट हुई और सामुदायिक संरचना प्रभावित हुई।
  • नामकरण विवाद: ब्रिटिश ने इसे ‘मोपला विद्रोह’ या ‘मालाबार विद्रोह’ कहा है, जो औपनिवेशिक शब्दावली थी। स्थानीय लोग इसे स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा मानते हैं।

महत्व

  • औपनिवेशिक विरोध: मालाबार विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, जो स्थानीय शिकायतों व राष्ट्रीय आंदोलन को जोड़ता है।
  • सामुदायिक एकता: यह हिंदू-मुस्लिम एकता का दुर्लभ उदाहरण था, जो सामाजिक सौहार्द एवं साझा लक्ष्य (ब्रिटिश शासन का अंत) को दर्शाता है।
  • खिलाफत और असहयोग का संगम: यह विद्रोह स्थानीय, धार्मिक एवं राष्ट्रीय आंदोलनों का मिश्रण था, जो इसे अनूठा बनाता है।
  • ऐतिहासिक पुनर्मूल्यांकन: अब्बास पनक्कल एवं एन.पी. चेक्कुट्टी जैसे लेखकों ने इसे केवल किसान विद्रोह की बजाय व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत किया।

खिलाफत का पहलू

  • खिलाफत आंदोलन: वर्ष 1919 में शुरू हुआ यह आंदोलन तुर्की में खलीफा की स्थिति को बचाने के लिए था, जिसे प्रथम विश्व युद्ध के बाद खतरा था। मालाबार में यह असहयोग आंदोलन के साथ जुड़ा।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: मालाबार में खिलाफत ने हिंदुओं और मुस्लिमों को एकजुट किया, जो पहले से ही ज़मोरिन के समर्थन में एक साथ लड़े थे। यह एकता ‘जिहाद’ की अवधारणा से प्रेरित थी, जो औपनिवेशिक शासन के खिलाफ थी।
  • स्थानीय प्रभाव: खिलाफत ने माप्पिलाओं को संगठित किया और अली मुसलियार जैसे नेताओं ने इसे धार्मिक एवं सामाजिक प्रेरणा के रूप में इस्तेमाल किया।
  • कमजोरी: विद्रोह के बाद कांग्रेस स्थानीय मुस्लिम समर्थन बनाए रखने में विफल रही। कम्युनिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने इस रिक्त स्थान को भरने की कोशिश की।
  • विशेषता: दक्षिण भारत में खिलाफत का प्रभाव उत्तर भारत से अलग था। मालाबार में यह धार्मिक आयोजनों (जैसे- नेरचा व उत्सवम) में सामुदायिक एकता के साथ जुड़ा।

निष्कर्ष

मालाबार विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण किंतु कम चर्चित हिस्सा है। यह केवल एक किसान विद्रोह नहीं था, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता, खिलाफत आंदोलन और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ एक व्यापक संघर्ष था। नई पुस्तक एवं शोध इस विद्रोह को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहे हैं, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम की विविधता को दर्शाता है।

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