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वैश्विक व्यापार में गिरावट से उपजा निराशावाद

(सामान्य अध्ययन, मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने से सम्बंधित विषय, औद्योगिक नीति, निवेश मॉडल)

पृष्ठभूमि

  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने उम्मीद व्यक्त की है कि कोविड-19 की वजह से वैश्विक व्यापार में तीव्र गिरावट देखी जा सकती है। परंतु, भारत के लिये पीछे हटने जैसी कोई बात नहीं है। हाल ही में, अत्यधिक घरेलू मांग के बावजूद भारत ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन दवा का निर्यात अमेरिका को किया है।
  • यद्यपि भारत ने खाद्यान्न का निर्यात अवश्य बंद कर दिया है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर देशों को खाद्यान्न निर्यात का आश्वासन दिया है। ध्यातव्य है कि इस वर्ष हुए जी-20 सम्मलेन में सदस्य देशों ने संकट के समय आवश्यक वस्तुओं के निर्यात को सुचारू रूप से जारी रखने की बात पर सहमति व्यक्त की है।

निर्यात की सम्भावनाएँ

  • वैश्विक व्यापार पर प्रभाव : डब्लू.टी.ओ. के अनुमान के मुताबिक, कोविड-19 महामारी के चलते उत्पन्न उथल-पुथल के कारण इस वर्ष वैश्विक व्यापार में 13-32% तक की गिरावट देखी जा सकती है।
  • वैश्विक व्यापार पुनरुद्धार के लिये दुनिया देशों को कम-से-कम वर्ष 2022 तक का इंतज़ार करना पड़ सकता है।
  • ध्यातव्य है कि पिछले दशक में अधिकांश समय भारतीय व्यापार मंदी की स्थिति में रहा है। हाल की कुछ रिपोर्टों के हिसाब से, भारत ने बड़ी संख्या में व्यापारिक समझौते रद्द किये गए हैं (दवाइयों को छोड़कर)।
  • यह भी कहा जा सकता है कि इस तरह के संकट को, विगत कुछ वर्षों से कुंद पड़ी हमारी प्रतिस्पर्धी छवि को वैश्विक स्तर पर निखारने के अवसर के रूप में देखा जा सकता है।

कुछ अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • विश्व में जब तक देशों का अस्तित्व है, उनके बीच आर्थिक सम्बंध बने रहेंगे और व्यापार चलता रहेगा।
  • वैश्विक महामारी जनित मंदी के दौर में जो अर्थव्यवस्थाएँ खुद को सम्हाल लेंगी, भविष्य में उनके आगे बढ़ने की सम्भावनाएँ बहुत अधिक हैं।
  • भारत को न सिर्फ तेल बल्कि कई अन्य महत्त्वपूर्ण आयातों के लिये विदेशी आय की आवश्यकता है। समग्र आर्थिक स्थिरता के लिये भी हमें विदेशी आय और विदेशी मुद्रा भण्डार की आवश्यकता है।
  • विकासीय आवश्यकताओं के लिये भी हम विदेशी पूंजी पर निर्भर हैं, वर्तमान में यह एक महत्त्वपूर्ण एवं बड़ी ज़रूरत है।
  • उल्लेखनीय है कि इस कठिन समय में हमें विदेशी पूंजी कि आवश्यकता इसलिये भी है कि यदि आर्थिक मंदी कि वजह से राजकोषीय घाटा बढ़ जाता है तो उसकी भरपाई के लिये भी इस पूंजी की आवश्यकता होगी।

निर्यात बढ़ाने की राह

  • निर्यात की सफलता के लिये प्रतिस्पर्धा ज़रूरी है और घरेलू स्तर पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के लिये भारत को कई संरचनात्मक व नीतिगत परिवर्तन करने होंगे।
  • हाल के वर्षों में बढ़ाई गई प्रशुल्क बाधाओं (Tariff Barriers) को भारत कम कर सकता है, ताकि निर्यात में सुगमता हो।
  • प्रशुल्क बाधाओं को कम करने एवं संरचनात्मक परिवर्तन करने से भारत आने वाली विदेशी कम्पनियों को भी बेहतर कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी।
  • उचित मात्रा में कच्चे माल एवं रसद आपूर्ति भी कुशल निर्यात के लिये महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ हैं।
  • रुपए का अवमूल्यन निश्चित रूप से निर्यातकों के लिये एक अच्छा संकेत होता है, लेकिन इस अवमूल्यन का आयात पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, इसलिये इस पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।
  • पूँजीगत-वित्त का बेहतर प्रबंधन भी ज़रूरी है।
  • वर्तमान में भारत का वार्षिक, वैश्विक निर्यात के 2% से भी कम है। इसे 5% तक पहुँचाने का लक्ष्य रखना चाहिये।
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