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यूक्रेन शांति सम्मेलन एवं भारत का दृष्टिकोण

संदर्भ 

रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए, स्विटज़रलैंड के बर्गेनस्टॉक में 15-16 जून 2024 को दो दिवसीय शांति शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया।

यूक्रेन शांति सम्मेलन के प्रमुख निष्कर्ष 

  • यूक्रेन में शांति के लिए, स्विटजरलैंड द्वारा आयोजित शिखर सम्मेलन में 100 से अधिक देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
  • शिखर सम्मेलन के अंत में एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किया गया जिसमें यूक्रेन के खिलाफ रूसी संघ के चल रहे युद्ध को समाप्त करने और संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और अंतर्राष्ट्रीय कानून के पालन की वकालत की गई।
  • इस घोषणापत्र में परमाणु सुरक्षा, वैश्विक खाद्य सुरक्षा और मानवीय मुद्दों के तीन एजेंडों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
    • इस संयुक्त घोषणापत्र में सम्मलेन में उपस्थित देशों में से कुल 82 देशों और संगठनों ने हस्ताक्षर कर अपनी मंजूरी दी।
    • इनमें यूरोपीय संघ के प्रमुख देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, इजरायल, जापान, अमेरिका, तुर्की आदि देशों और यूरोपीय आयोग, यूरोपीय परिषद, यूरोपीय संसद ने हस्ताक्षर किए हैं।
    • भारत, मैक्सिको, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात ने शिखर सम्मेलन में भाग लिया, लेकिन ये उन देशों में शामिल थे जिन्होंने संयुक्त विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर नहीं किए।
    • भारत के साथ-साथ किसी भी ब्रिक्स सदस्य, (वर्तमान और भविष्य के) ने घोषणापत्र में हस्ताक्षर नहीं किए।
    • रूस को इस सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया था।

घोषणापत्र के मुख्य बिंदु  

  • ज़ापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र की निगरानी : यूक्रेन के ज़ापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र सहित सभी परमाणु प्रतिष्ठानों को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सिद्धांतों के अनुसार सुरक्षित होना चाहिए और IAEA की निगरानी में होना चाहिए। 
    • ज़ापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर मार्च 2022 से रूसी सेना ने नियंत्रण कर लिया था। सितंबर 2022 में इस संयंत्र ने यूक्रेन के राष्ट्रीय ग्रिड के लिए बिजली उत्पादन बंद कर दिया।
  • खाद्य उत्पादों की निर्बाध आपूर्ति : वैश्विक खाद्य सुरक्षा खाद्य उत्पादों के निर्बाध उत्पादन और आपूर्ति पर निर्भर करती है। यूक्रेनी कृषि उत्पादों के मुक्त प्रवाह को इच्छुक तीसरे देशों को अनुमति दी जानी चाहिए।
  • काला सागर और अज़ोव सागर नौवहन सुरक्षा : घोषणापत्र में काला सागर और अज़ोव सागर में व्यापारिक जहाजों और नागरिक बंदरगाह के बुनियादी ढांचे पर हमलों को ‘अस्वीकार्य’ बताया गया है।
  • युद्धबंदियों की रिहाई : सभी युद्धबंदियों को पूर्ण अदला-बदली के माध्यम से रिहा किया जाना चाहिए।
    • साथ ही सभी निर्वासित और अवैध रूप से विस्थापित यूक्रेनी बच्चों और सभी अन्य यूक्रेनी नागरिकों को जिन्हें अवैध रूप से हिरासत में लिया गया था, उन्हें यूक्रेन वापस भेजा जाना चाहिए।

भारत का दृष्टिकोण 

  • यूक्रेन संघर्ष से उत्पन्न वैश्विक चिंता को भारत भी साझा करता है और संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में किसी भी तरह की सामूहिक इच्छा का समर्थन करता है।
  • शांति शिखर सम्मेलन में भारत की हिस्सेदारी, भारत के इस स्पष्ट और एकरूप रुख के मुताबिक है कि केवल संवाद और कूटनीति से ही स्थायी शांति संभव है।
  • भारतीय दृष्टिकोण है कि शांति के लिए सभी पक्षों को साथ लाया जाना चाहिए और केवल वही विकल्प, जो दोनों पक्षों को स्वीकार हों, स्थायी शांति ला सकते हैं। 
  • इसीलिए, भारत ने शिखर सम्मेलन से जारी होने वाले किसी भी विज्ञप्ति या दस्तावेज से खुद को अलग रखा है।
  • इस्सके पहले भी, भारत यूक्रेन संकट से जुड़ी सभी बैठकों में शामिल हुआ है, लेकिन किसी भी प्रस्ताव को पारित करने में अपनी भूमिका से खुद को अलग रखा है।  
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र महासभा, इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी और ह्यूमन राइट्स काउंसिल में भी भारत ने यूक्रेन संकट पर एक समान दृष्टिकोण बनाए रखा है। 
    • भारत के अनुसार, किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले रूस और यूक्रेन का एक साथ एक मंच पर होना जरूरी है।

आगे की राह 

  • शांति स्थापित करने के लिए सभी पक्षों की भागीदारी और उनके बीच संवाद की आवश्यकता है। इसलिए, भविष्य में सभी पक्षों के प्रतिनिधियों की भागीदारी के साथ उपर्युक्त क्षेत्रों में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए ।
  • शांति समझौते को केवल दोनों पक्षों रूस एवं यूक्रेन की आपसी सहमति के आधार पर ही सफल बनाया जा सकता है, इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी शांति  बैठक रूस की भी भागीदारी हो। 
  • पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को एकतरफा हथियार निर्यात को नियंत्रित करना चाहिए, जिससे संघर्ष को बढ़ावा न मिले। 
  • साथ ही संयुक्त राष्ट्र को प्रभावित क्षेत्रों में मानवीय अधिकारों की सुरक्षा एवं बुनियादी सुविधाओं की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
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