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भूकम्पों की अयनमंडल आधारित निगरानी

(सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-3 : विज्ञानं एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ, नई प्रौद्योगिकी का विकास)

भारतीय भूविज्ञान संस्थान (आई.आई.जी.) के वैज्ञानिकों ने अयनमंडल में हाल के बड़े भूकम्पों के संकेतों का अध्ययन किया है। भारतीय भूविज्ञान संस्थान, भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) का एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान है।

उद्देश्य

हालाँकि ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जी.एन.एस.एस.) से प्राप्त कुल इलेक्ट्रॉन कंटेंट (टी.ई.सी.) भूकम्पीय स्रोत क्षेत्र पर बड़े स्थानिक और अस्थायी कवरेज देता है, इस अनुसंधान का उद्देश्य अयनमंडल से भूकम्पीय स्रोत के लक्षणों का पता लगाना है।

यह शोध आई.आई.जी. के अंतःविषय कार्यक्रम कपल्ड लिथोस्फीयर-एटमॉस्फियर- अयनमंडल -मैग्नेटोस्फियर सिस्टम (CLAIMS)’ का एक हिस्सा है।

कपल्ड लिथोस्फीयर-एटमॉस्फियर- अयनमंडल -मैग्नेटोस्फियर सिस्टम (CLAIMS): कुछ तथ्य

  • CLAIMS भूकम्प तथा सुनामी जैसी ठोस पृथ्वी प्रक्रियाओं (solid earth processes) के दौरान वातावरण में ऊर्जा हस्तांतरण पर केंद्रित है।
  • CLAIMS के माध्यम से को-सिस्मिक आयनोस्फियरिक पर्टबेशन (CIP) का स्थानिक वितरण तथा का संयुक्त अध्ययन किया जाता है।
  • CIP उपकेंद्र के आसपास भूमि विरूपण पैटर्न को अच्छी तरह से प्रतिबिंबित कर सकता है तथा CIP वितरण अयनमंडलीय भेदी बिंदु (Ionospheric piercing point- IPP) ऊँचाई पर अनुमानित है।

क्या है को-सिस्मिक आयनोस्फियरिक पर्टबेशन (CIP)?

  • सामान्यतः, किसी भी भूकम्प के दौरान भू–पर्पटी का उभार उस वातावरण में कंप्रेसिव (यानी दबाव) तरंगें उत्पन्न करता है।
  • ये तरंगें ऊपर की ओर वायुमंडलीय तटस्थ घनत्व वाले क्षेत्र में फैलती है और इस प्रकार, वायुमंडलीय ऊँचाईयों के साथ तरंग आयाम (एम्प्लीट्यूड) में वृद्धि होती है।
  • अयनमंडलीय (आयनोस्फेरिक) ऊँचाईयों पर पहुँचने पर, ये तरंगें आयनोस्फेरिक इलेक्ट्रॉन घनत्व को पुनर्वितरित करती हैं और इलेक्ट्रॉन घनत्व कम्पन (इलेक्ट्रॉन डेन्सिटी पर्टबेशन) उत्पन्न करती हैं, जिसे को- सिस्मिक आयनोस्फियरिक पर्टबेशन (CIP) के रूप में जाना जाता है।
  • CIP की विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए विभिन्न आयनोस्फेरिक साउंडिंग तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
  • को-सिस्मिक आयनोस्फियरिक पर्टबेशन के स्थानिक केंद्र के आस-पास विकसित ग्राउंड डिफॉर्मेशन पैटर्न को अच्छी तरह से रोका जा सकता है।
  • को-सिस्मिक आयनोस्फियरिक पर्टबेशन विवर्तनिक दबावों (टेक्टॉनिक फोर्सिंग) से सीधे जुड़ी हो सकती हैं, बशर्ते गैर-विवर्तनिक दबावों की प्रक्रिया के प्रभाव, जो अयनमंडलीय (आयनोस्फेरिक) ऊँचाई पर कार्यशील होते हैं, अनुकूल हों।

अयनमंडल एक अत्यधिक गतिशील क्षेत्र है और आयनोस्फेरिक इलेक्ट्रॉन घनत्व में किसी भी पर्टबेशन की उत्पत्ति का पता आयनोस्फीयर के ऊपर (जैसे कि सौर, भू-चुम्बकीय आदि) या नीचे (जैसे कि निचले वायुमंडलीय, भूकंपीय आदि) की विभिन्न उत्पत्तियों से लगाया जा सकता है। को-सेस्मिक आयनोस्फियरिक पर्टबेशन की पहचान करने के क्रम में यह एक अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा, को-सिस्मिक आयनोस्फियरिक पर्टबेशनों के प्रभावों को व्याप्त नॉन – टेक्टॉनिक फोर्सिंग मैकेनिज़्म के आलोक में देखा जाना चाहिए। इसी तरह, वर्तमान व्यापक अध्ययन आयनोस्फेरिक आधारित सिस्मिक सोर्स करैक्टराईजेशन के लिए एक उपकरण डिज़ाइन करते समय सहायक सिद्ध हो सकता है।

अयनमंडल

  • वायुमंडल संस्तरों में 80 से 400 किलोमीटर के बीच अयनमंडल स्थित है।
  • इसमें आयन (आवेशित कण) पाए जाते हैं। अत: इस वायुमंडलीय परत को अयनमंडल के रूप में जाना जाता है।
  • इस संस्तर द्वारा पृथ्वी द्वारा भेजी गई रेडियो तरंगे वापस लौटा दी जाती है।
  • आयनमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान में वृद्धि होती है।
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