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बिहार में बाढ़ और नेपाल की भूमिका

  • 15th February, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा- पर्यावरणीय पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1 व 3 : भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, पर्यावरणीय पारिस्थितिकी)

संदर्भ

बिहार समेत नेपाल से सटे अन्य राज्य वर्षा के दौरान बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। इससे उत्तर बिहार सर्वाधिक प्रभावित होता है। इस दौरान यहाँ गंडक, बागमती, कमला, कोसी और महानंदा समेत कई नदियाँ उफान पर होती हैं। कई बार इस बाढ़ का कारण नेपाल में अचानक से हुई भारी वर्षा को माना जाता है।

नेपाल का योगदान

  • महानंदा को छोड़ दिया जाए तो उत्तर बिहार में प्रवाहित होने वाली लगभग सभी बड़ी नदियाँ नेपाल से ही बिहार में प्रवेश करती हैं। इन नदियों का उद्गम हिमालय की शिवालिक श्रेणी में है।
  • वहाँ होने वाली तेज वर्षा के कारण इन नदियों में बाढ़ की स्थिति बनती है। पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण वहाँ वर्षा में अनियमितता पैदा होने के साथ कम समय में अधिक मात्रा में वर्षा होने लगी है।
  • सिमरा, काठमांडू समेत पूर्वी नेपाल का क्षेत्र नेपाल से बिहार में प्रवेश करने वाली नदियों, जैसे- गंडक, बागमती, कमला और कोसी का जल अधिग्रहण क्षेत्र है। अत्यधिक वर्ष के कारण नेपाल के बीरगंज, सोनबरसा, मलंगवा, जलेश्वरपुर, जनकपुर और गौर जैसे क्षेत्रों में बाढ़ की तबाही मचाते हुए ये नदियाँ उत्तर बिहार में प्रवेश करती हैं।
  • इस प्रकार जरनल क्लाइमेट में प्रकाशित उस रिपोर्ट की पुष्टि होती है, जिसके अनुसार, नेपाल में पहाड़ी इलाकों की तुलना में तराई क्षेत्रों में उच्च मात्रा में वर्षा की संभावना रहती है। इस रिपोर्ट को वर्ष 1981 से 2010 के बीच नेपाल में हुई वर्षा का विश्लेषण करके तैयार किया गया था।
  • हालाँकि, रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि यद्यपि नेपाल में तीव्र वर्षा वाले दिन देखने को मिल रहे हैं, तथापि वर्षा के दिनों में कमी आ रही है। साथ ही, धीमी फुहार वाली वर्षा में भी कमी आ रही है, जिससे किसानों को लाभ हुआ करता है।

कारण

  • नेपाल के पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार, शिवालिक (स्थानीय भाषा में चूरे) श्रेणी में विगत कुछ दशकों में पत्थर का उत्खन करने और वनों की अंधाधुन कटाई से यह स्थिति उत्पन्न हुई है, जिससे नेपाल के साथ-साथ उत्तर बिहार को भी नुकसान उठाना पड़ता है। विदित है की शिवालिक को नेपाल में स्थानीय भाषा में ‘चूरे’ कहते हैं।
  • पत्थरों का उत्खन नेपाल और भारत में निर्माण कार्यों के लिये सामग्री उपलब्ध कराने के लिये किया जा रहा है। इससे वर्षा का जल वहाँ रुक नहीं पता है और तेजी से बहकर नेपाल की तराई और फिर भारत में बाढ़ का कारण बनता है।
  • नेपाल के हिमालय क्षेत्र में 90 के दशक से ही वनों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। वर्ष 1990 से 2005 के बीच नेपाल का एक-चौथाई वन क्षेत्र नष्ट हो गया है। इसके अतिरिक्त रेत उत्खनन से भी नदी बेसिन गड्ढे में तब्दील हो गए हैं, जो नदी के बहाव को अनियंत्रित करते हैं।
  • ऐसी छोटी-छोटी नदियाँ जिनको लगभग भूला जा चुका था और जिनके बेड में गृह निर्माण प्रारंभ हो गया था, वे मानसून में अचानक पुन: जीवित हो जा रही है।

उपाय

  • नेपाल से उत्तर बिहार में आने वाली इस आपदा को लेकर किसी प्रकार की चेतावनी प्रणाली विकसित नहीं हो पाई है, जिसकी नितांत आवश्यकता है।
  • नेपाल सरकार और बिहार के बीच मौसम संबंधी सूचनाएँ साझा नहीं होती हैं। साथ ही नेपाल द्वारा जारी की गई सूचनाओं को स्थानीय प्रशासन संभवतः बहुत महत्त्व नहीं देता है। अत: साझाकरण तंत्र को मज़बूत करने के साथ-साथ इन सूचनाओं के महत्त्व को भी समझने की आवश्यकता है।
  • बिहार को हिमालयी क्षेत्र में होने वाली वर्षा की जानकारी और नेपाल को इस क्षेत्र में आने वाले तूफान व शीतलहर की जानकारी की आवश्यकता होती है। इनके साझाकरण से दोनों देशों के मध्य सहयोग को बढ़ाया जा सकता है।
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