अज़रबैजान और आर्मेनिया शांति समझौता

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)

संदर्भ

दक्षिण कॉकस क्षेत्र में दशकों से चले आ रहे नागोर्नो-कराबाख विवाद ने अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच गहरे अविश्वास, हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दिया। वर्षों के खूनी संघर्ष, विस्थापन और असफल वार्ताओं के बाद, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मध्यस्थता में वॉशिंगटन में एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसे दोनों देशों ने ‘नए युग की शुरुआत’ बताया।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

  • नागोर्नो-कराबाख, जो अंतर्राष्ट्रीय रूप से अज़रबैजान का हिस्सा है, में अधिकांश जनसंख्या जातीय आर्मेनियाई थी।
  • 1980 और 1990 के दशक में दोनों देशों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें लाखों लोग विस्थापित हुए और हजारों मारे गए।
  • वर्ष 2020 में छह सप्ताह का युद्ध हुआ, जिसमें अज़रबैजान ने बड़े हिस्से पर पुनः कब्जा किया।
  • हाल के वर्षों में रूस का ध्यान यूक्रेन युद्ध पर केंद्रित होना और आर्मेनिया का पश्चिम की ओर झुकाव, शांति प्रक्रिया में नए समीकरण लेकर आया।

शांति समझौते के बारे में

  • अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनियन ने व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की उपस्थिति में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • यह समझौता युद्ध को "हमेशा के लिए" समाप्त करने और दोनों देशों के बीच यातायात, व्यापार और कूटनीतिक संबंध पुनः स्थापित करने का वादा करता है।
  • अमेरिका इस क्षेत्र में एक प्रमुख ट्रांजिट कॉरिडोर का निर्माण करेगा, जिसे ‘ट्रम्प रूट फॉर इंटरनेशनल पीस एंड प्रॉस्पेरिटी’ नाम दिया गया है।
  • यह मार्ग अज़रबैजान को उसके नखिचेवन (Nakhchivan) एक्सक्लेव से जोड़ेगा, जो आर्मेनियाई क्षेत्र से अलग है।

समझौते के प्रमुख बिंदु

  • स्थायी युद्ध विराम: दोनों देशों ने भविष्य में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई न करने का संकल्प लिया।
  • परिवहन और व्यापार पुनः शुरू: सड़क, रेल और हवाई मार्ग खोले जाएंगे।
  • कूटनीतिक संबंध: दूतावास और राजनयिक संवाद की बहाली।
  • ट्रांजिट कॉरिडोर का निर्माण: अज़रबैजान और नखिचेवन को जोड़ने वाला विशेष कॉरिडोर।
  • अमेरिकी निवेश: ऊर्जा और तकनीकी व्यापार में अमेरिका की भागीदारी बढ़ेगी।

महत्त्व

  • क्षेत्रीय स्थिरता: दशकों से अस्थिर रहे दक्षिण कॉकस में शांति की उम्मीद।
  • आर्थिक लाभ: व्यापार मार्ग खुलने से दोनों देशों को आर्थिक लाभ।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव: रूस की जगह अमेरिका का मध्यस्थता में प्रभाव बढ़ना।
  • मानवीय राहत: विस्थापित लोगों की वापसी और पुनर्वास की संभावना।

चुनौतियाँ

  • पारस्परिक अविश्वास : दशकों की हिंसा ने लोगों के बीच गहरी खाई पैदा की है।
  • विस्थापितों की वापसी: सुरक्षित और सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित करना कठिन।
  • भूराजनीतिक प्रतिस्पर्धा : रूस, तुर्की और अमेरिका के बीच शक्ति संतुलन का मुद्दा।
  • समझौते का अनुपालन: ट्रांजिट कॉरिडोर और सीमा मुद्दों पर संभावित मतभेद।

आगे की राह

  • दोनों देशों को विश्वास बहाली उपायों पर ध्यान देना होगा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, संयुक्त आर्थिक परियोजनाएँ और सुरक्षा सहयोग।
  • अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को निगरानी और मध्यस्थता में सक्रिय रहना होगा ताकि समझौते का उल्लंघन न हो।
  • विस्थापितों और युद्ध-पीड़ित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण और मानवीय सहायता प्राथमिकता पर होनी चाहिए।
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