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मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक अशांति और भारतीय उपमहाद्वीप

  • 3rd December, 2020

(प्रारम्भिक परीक्षा : राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 : भारत एवं इसके पड़ोसी सम्बंध, द्विपक्षीय, क्षेत्रीय व वैश्विक समूह तथा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार)

पृष्ठभूमि

हाल ही में, एक शीर्ष ईरानी परमाणु वैज्ञानिक (मोहसिन फखरीज़ादेह) की हत्या ईरान की बढ़ती रणनीतिक कमजोरियों को उजागर करती है। साथ ही, यह मध्य-पूर्व में राजनीतिक सच्चाई को रेखांकित करती है जिसमें सही या गलत होने से अधिक महत्त्वपूर्ण उस देश की मज़बूत रणनीतिक स्थिति है। मध्य-पूर्व में इस भू-राजनीतिक अशांति के भारतीय उपमहाद्वीप के लिये कई निहितार्थ हैं। इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिये मध्य-पूर्व को नए तरीके से परिभाषित करने वाली प्रवृत्तियों से भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को निपटना होगा। इन प्रवृत्तियों का विश्लेषण नीचे किया गया है।

ईरान का बढ़ता अलगाव

  • रिपब्लिकन सहित ट्रम्प प्रशासन, इज़रायल और खाड़ी के अरब देशों के साझा हित, अमेरिका के अगले राष्ट्रपति को ईरान के साथ परमाणु कूटनीति को नवीनीकृत करने से रोकने और ईरान को अलग-थलग बनाए रखने में ही है। फखरीज़ादेह की हत्या इसी राजनीतिक उद्देश्य को प्राप्त करने से सम्बंधित है।
  • ऐसी स्थिति में यदि ईरान सख्त जवाबी कार्रवाई करता है, तो यह इज़रायल और अमेरिका के साथ चौतरफा टकराव में वृद्धि करेगा, जो बाइडन प्रशासन के साथ सकारात्मक बातचीत और जुड़ाव की सम्भावनाओं को ख़त्म कर देगा।
  • साथ ही, इस प्रकार के टकराव से ईरान की आंतरिक कमज़ोरी का पर्दाफाश होगा जिससे कट्टरपंथियों एवं उदारवादियों के बीच आंतरिक विभाजन में वृद्धि होगी।
  • हाई-प्रोफाइल ईरानी ठिकानों पर होने वाले लगातार हमले इसके समाज में विरोधियों व शत्रुओं के प्रवेश का संकेत देते हैं, क्योंकि घरेलू स्तर पर शासन के प्रतिद्वंद्वी अब इज़रायल के मोसाद सहित विदेशी सुरक्षा एजेंसियों के साथ सहयोग करने को तैयार हैं।
  • ईरान की आंतरिक राजनीतिक कमज़ोरी को ट्रम्प प्रशासन द्वारा बड़े पैमाने पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने अत्यधिक जटिल बना दिया है।
  • हालाँकि, दक्षिण एशिया में ईरान के लिये काफी सद्भावना है परंतु भारत और इसके पड़ोसी देश अरब या अमेरिका के साथ ईरान के संघर्षों में नहीं पड़ना चाहते हैं।

इज़रायल-अरब सम्बंधों में परिवर्तन

  • दूसरी क्षेत्रीय प्रवृत्ति इजरायल-अरब सम्बंधों में तेजी से होने वाला परिवर्तन है। पिछले कुछ महीनों में इज़रायल के बहरीन व संयुक्त अरब अमीरात के साथ सम्बंध सामान्य हुए हैं और सऊदी अरब के साथ भी सम्बंधों के सामान्य होने की अटकलें हैं। इज़राइल के साथ अरब देशों के बढ़ते सम्बंध ईरान के लिये चिंता का विषय है।
  • पाकिस्तान ने भी इज़रायल को मान्यता देने के लिये सऊदी अरब और यू.ए.ई. द्वारा उस पर दबाव डाले जाने की बात स्पष्ट तौर पर कही है। यदि पाकिस्तान इज़रायल को मान्यता देता है, तो बांग्लादेश भी इससे पीछे नहीं रहना चाहेगा। इज़राइल के साथ आर्थिक और तकनीकी सहयोग बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति में सकारात्मक भूमिका निभाएगा।
  • बांग्लादेश और पाकिस्तान के रूप में विश्व के दो बड़े इस्लामिक देशों के साथ इज़रायल के सम्बंध उसके लिये भी वैचारिक और राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सिद्ध होंगे।

सऊदी अरब और तुर्की के बीच प्रतिद्वंद्विता

  • ऐसे समय में जब सऊदी अरब, मिस्र और यू.ए.ई. मध्य-पूर्व को राजनीतिक व धार्मिक संतुलन की ओर ले जाना चाहते हैं तो वहीं कभी धर्मनिरपेक्ष रहा तुर्की अब राजनीतिक इस्लाम का नया समर्थक बन गया है।
  • सऊदी अरब के साथ तुर्की की प्रतिद्वंद्विता पहले से ही भारत और पाकिस्तान पर प्रभाव डाल रही है। भारत के साथ तुर्की के सम्बंध सामान्य नहीं है और वह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का सहयोग कर रहा है।
  • जबकि यह पाकिस्तान के लिये खाड़ी देशों के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण विरोध को प्रदर्शित करता है, क्योंकि खाड़ी देश भारत के साथ रणनीतिक सम्बंधों को आगे बढ़ा रहे हैं।
  • हालाँकि, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के पास पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने का विकल्प है जिसकी भरपाई तुर्की या मलेशिया द्वारा नहीं की जा सकती है।

निष्कर्ष

यद्यपि भारत ने हाल के वर्षों में मध्य पूर्व के साथ अपने जुड़ाव को मज़बूत करने के लिये कुछ महत्त्वपूर्ण समायोजन करने के साथ-साथ नीतियों में परिवर्तन किये हैं, फिर भी इस क्षेत्र में तेज़ी से हो रहे बदलावों पर भारत को पैनी नजर रखनी होगी।

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