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दक्षिण एशिया में विद्युत व्यापार से संबंधित भू-राजनीति

  • 13th April, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा : राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 2 : द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा भारत को प्रभावित करने वाले करार)

संदर्भ

भारत सरकार की शीर्ष विद्युत विनियामक संस्था ‘केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण’ (Central Electricity Authority–CEA) ने भारत के सीमावर्ती देशों के साथ विद्युत व्यापार को विनियमित करने के लिये ‘सीमा-पार विद्युत के आयात/निर्यात के लिये दिशा-निर्देश’ जारी किये हैं। दक्षिण एशियाई विद्युत बाज़ार के विनियमन से संबंधित इन दिशा-निर्देशों में विद्युत व्यापार संबंधी शर्तों को अभिनिर्धारित किया गया है।

दिशा-निर्देश से संबंधित मुख्य बिंदु

  • ये दिशा-निर्देश सीमा-पार स्थित ऐसे विद्युत संयंत्रों पर लागू होते हैं, जो भारत को विद्युत निर्यात करने की इच्छा रखते हैं। इनमें इस बात को केंद्र में रखा गया है कि भारत को विद्युत निर्यात करने वाले सीमा-पार स्थित उस विद्युत संयंत्र का स्वामित्व कौन-कौन से देशों की कंपनियों के पास है।
  • इन दिशा-निर्देशों के अंतर्गत शर्त रखी गई है कि ‘भारत को विद्युत निर्यात करने वाले सीमा-पार स्थित उस विद्युत संयंत्र में किसी ऐसे तीसरे देश की कंपनी का स्वामित्व नहीं होना चाहिये, जिसके साथ–
  1. भारत भूमि-सीमा (Land-Boundary) साझा करता है तथा
  2. उसके साथ विद्युत क्षेत्रक में भारत ने द्विपक्षीय सहयोग समझौता हस्ताक्षर नहीं किया है।
  • नए दिशा-निर्देशों में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत अपने साथ विद्युत व्यापार करने वाली विद्युत कंपनियों के स्वामित्व-प्रतिरूप में होने वाले परिवर्तन की भी विस्तृत निगरानी करेगा।
  • उल्लेखनीय है कि नेपाल, भूटान तथा बांग्लादेश में विद्युत संयंत्र स्थापित करने की इच्छुक चीनी कंपनियाँ इन देशों के माध्यम से भारतीय बाज़ार में प्रवेश के लिये प्रयासरत रही हैं।

नए दिशा-निर्देशों की आवश्यकता क्यों ?

  • वर्ष 2014 में भारत ने सार्क के संस्थागत ढाँचे का प्रयोग करते हुए इस क्षेत्र में विद्युत व्यापार प्रणाली को उदार बनाने की शुरुआत की थी। किंतु कुछ वर्षों के उपरांत भारत सरकार ने यह महसूस किया कि चीन इस ‘उदारवादी व्यवस्था’ का दुरुपयोग कर अनुचित लाभ उठा रहा है।
  • उक्त परिस्थितियों के आलोक में भारत सरकार ने ‘सीमा-पार विद्युत व्यापार दिशा-निर्देश, 2016’ जारी किये थे। इनके अंतर्गत यह प्रावधान किया गया था कि विद्युत व्यापार केवल दो सरकारी कंपनियों के मध्य ही होगा, निजी क्षेत्रक की इसमें कोई भूमिका नहीं होगी। इन दिशा-निर्देशों का नेपाल व भूटान निरंतर विरोध कर रहे थे। उनका मत था कि निजी क्षेत्र को भी विद्युत व्यापार की प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिये।
  • भारत सरकार द्वारा जारी किये गए नवीनतम दिशा-निर्देश विद्युत व्यापार में निजी क्षेत्र को भी अनुमति प्रदान करते हैं किंतु चीनी निवेश को अपवर्जित (Exclude) करते हैं। ऐसे में, नए दिशा-निर्देशों के माध्यम से संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

भारत के सीमा-पार विद्युत व्यापार

  • भारत और उसके पड़ोसी देशों की विद्युत उत्पादन प्रणालियों की बात करें तो भारत व पाकिस्तान की विद्युत उत्पादन प्रणालियाँ मुख्यतः कोयला और जल-विद्युत संयंत्रों पर निर्भर हैं, जबकि भूटान व नेपाल की विद्युत उत्पादन प्रणालियाँ मुख्यतः जल-विद्युत संयंत्रों पर निर्भर हैं।
  • भारत का इन देशों के साथ विद्युत व्यापार काफी हद तक एक-तरफा है। अर्थात् भारत अपने पड़ोसी देशों, जैसे भूटान से 1200 मेगावाट विद्युत का आयात करता है तथा बांग्लादेश और नेपाल को क्रमशः 1200 व 500 मेगावाट विद्युत का निर्यात करता है।
  • भूटान को अपने राजस्व का वृहद् भाग भारत को निर्यातित विद्युत से प्राप्त होता है। भूटान समग्र विद्युत उत्पादन का लगभग दो-तिहाई भाग भारत को निर्यात करता है।
  • नेपाल अपने यहाँ बढ़ती विद्युत माँग की आपूर्ति के लिये भारत पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त भारत, श्रीलंका के साथ ‘अंडर-सी केबल’ के माध्यम से विद्युत व्यापार करने की योजना पर कार्य कर रहा है।

भारतीय केंद्रीयता (Indian Centricity)

  • भारत का संस्थागत तंत्र पिछले कुछ दशकों में ‘भारत-केंद्रित’ के रूप में उभर रहा है। भारत-केंद्रित से आशय भारत के विभिन्न मंत्रालयों, विनियामकों या अन्य ऐसे निकायों से है, जो अपनी नीतियों या दिशा-निर्देशों को ‘भारत के हित’ को ध्यान में रखते हुए निर्धारित करते हैं।
  • जब भारत की ‘भौगोलिक केंद्रीयता’ भारत के आर्थिक सामर्थ्य के साथ युग्मित हो जाएगी, तो यह भारत को बाज़ार के स्वरूप का निर्धारण करने में स्वाभाविक रूप से लाभान्वित कर सकती है।
  • सिद्धांतकारों द्वारा प्रस्तावित एक स्वायत्त निकाय जिसे क्षेत्रीय व्यापार को विनियमित करना चाहिये, ऐसी अनिश्चितताओं के कारण उसे मूर्त रूप देने की संभावना कम ही है।
  • उक्त परिस्थितियों के आलोक में कहा जा सकता है कि भारत इस क्षेत्र में ‘नियम-निर्धारित’ करने वाला देश बना रहेगा। लेकिन इन नियमों के कारण भारत को अपेक्षाकृत छोटे पड़ोसी देशों की नाराज़गी का सामना भी करना पड़ सकता है।

मेगा सौर परियोजना    

  • भारत सरकार द्वारा जारी किये गए ये दिशा-निर्देश कुछ वृहद् प्रश्नों की तरफ भी ध्यानाकर्षित करते हैं, जैसे भारत की महत्त्वाकांक्षी ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ (OSOWOG) की वैश्विक सुपर ग्रिड योजना के लिये संस्थागत दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
  • उक्त योजना का उद्देश्य पश्चिम एशिया व दक्षिण-पूर्व एशिया से संपर्क को बढ़ाते हुए इसे अफ्रीकी देशों से आगे तक विस्तृत करना है।
  • बहु-देशीय ग्रिड प्रणाली अप्रत्याशित परिणामों से सुरक्षा प्रदान करता है क्योंकि इस ग्रिड से जुड़े विभिन्न देशों के विद्युत संयंत्र आपूर्ति को स्थायित्व प्रदान कर सकते हैं।
  • दक्षिण एशिया में व्याप्त परिवेश के परिप्रेक्ष्य में विशेषज्ञ इन नए दिशा-निर्देशों को सीमारहित व्यापार एवं इस क्षेत्र को एकीकृत करने के प्रयासों में बाधा के रूप में देख रहे हैं।

दिशा-निर्देशों के प्रभाव

  • नए दिशा-निर्देशों से नेपाल, भूटान तथा बांग्लादेश के विद्युत बाज़ार प्रभावित होने की आशंका हैं क्योंकि ये देश ऊर्जा संबंधी भविष्य के लिये विभिन्न प्रकार से भारतीय बाज़ार पर आश्रित हैं।
  • ये दिशा-निर्देश इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते विकास-आधारित प्रभुत्व को प्रतिसंतुलित करने के लिये भी भारत के दृष्टिकोण को प्रदर्शित करते हैं।

निष्कर्ष

  • दक्षिण एशियाई क्षेत्र में नियम-आधारित, स्थिर क्षेत्रीय संस्थागत तंत्र के द्वारा भारत इस क्षेत्र में अपनी पकड़ को मज़बूत कर सकता है। साथ ही, चीन द्वारा प्रस्तावित परियोजनाओं को प्रतिसंतुलित भी कर सकता है।
  • उक्त कार्यों के लिये भारत को शीघ्रातिशीघ्र अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं को प्रभावी तौर क्रियान्वित करना चाहिये।
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