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करों पर वैश्विक सौदा/रणनीति: भारत के हितों के अनुकूल

  • 10th June, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, आर्थिक और सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन, प्रश्नपत्र- 3 : भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ

  • दुनिया भर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कर-अंतराल का लाभ उठाने से रोकने के लिये अमेरिका वैश्विक एकजुटता पर ज़ोर दे रहा है।साथ ही, यह डिजिटल कराधान पर एक बड़ी संधि भी चाहता है। यह कदम भारत के लिये फायदेमंद साबित हो सकता है किंतु भारत कोइन प्रस्तावों पर सावधानी से विचार करने की आवश्यकता है।
  • उल्लेखनीय है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता बनानेके लिये भारत सहित 6 देशो पर लगाए गए 25%अतिरिक्त आयात शुल्क को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।

तात्कालिक कारण

  • बड़े स्तर पर कोविड-राहत और आर्थिक पुनरुद्धार पैकेज से दुनिया भर की सरकारों पर भारी राजकोषीय दबाव है। कई सरकारें आने वाले वर्षों में कर राजस्व बढ़ाकर इस घाटे को पाटने की उम्मीद में हैं।
  • कर की असमान दरों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने लाभ के स्रोतों को छिपाने के लिये प्रेरित किया है, जिसका डिजिटल कंपनियों ने आसानी से फायदा उठाया है।इससे कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का राष्ट्रीय खजाने में उनका योगदान अनुचित रूप से कम हो गया है।
  • इन सबके बीच अमेरिकी प्रशासनने बहुराष्ट्रीय निगमों (MNCs) के लिये वैश्विक कराधान मानदंडों में बदलाव का प्रस्ताव दिया है।अमेरिका का घोषित उद्देश्य कर-अंतराल को पाटना और कुछ शुल्कों व करों को विश्व भर में समान रूप से साझा करना है। इसके लिये जल्द ही 139 देशों के साथ बातचीत शुरू होगी।

चिंताएँ

  • चूँकि इस एकीकृत कर व्यवस्था में अमेरिकी हित अधिक हैं, जबकि टैक्स हेवन देशों को इससे नुकसान उठाना पड़ सकता है, अत: 21% के न्यूनतम निगम कर की दर के रूप में इसके मुख्य प्रस्ताव को प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है।
  • ब्रिटेन के राजकोष के प्रमुख ऋषि सुनक ने कहा है कि कर की इतनी ऊँची दर लंबी अवधि में व्यापार को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।साथ ही, अधिक निवेश लुभाने के लिये कर कीदरों को कम रखने वाले सिंगापुर और आयरलैंड जैसे देश अपने संप्रभु अधिकार का हवाला देते हुए ऐसा करने से हिचक सकतेहैं।

क्या हो भारत का रुख?

  • यदि अन्य देश भी कर की दर कमन करने पर सहमत हैं तो निगम कर के लिये लगभग18-20% की न्यूनतम दर भारत केलिये उपयुक्त होगी।भारत बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्थानीयस्तर पर निगमीकरण के लिये प्रयासरत रहता है और लाभ को कम-कर वाले क्षेत्रों (देशों) में स्थानांतरित करने के लियेसीमा-पारीय लेनदेन को हतोत्साहित करता है (इसे प्रायः बौद्धिक संपदा पर फैट रॉयल्टी के माध्यम से किया जाता है)। साथ ही, भारत कॉरपोरेटसामाजिक उत्तरदायित्व नीति में विश्वास रखता है। ऐसी स्थितियों में यह कदम भारत के लिये उपयुक्त हो सकता है।
  • जहाँ तक ​​मैन्युफैक्चरिंग स्टार्टअप्स के लिये 15% कर की दर का सवाल है, तो भारत इसमें बिना किसी चिंता के वृद्धि कर सकता है।बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर कर आमतौर पर वहाँजमा होते हैं,जहाँ वे लाभ दर्ज करती हैं या जहाँ पर वे आधारित होती हैं।
  • अमेरिका की बिग टेक फर्मों ने भारत के विशाल इंटरनेट बाज़ार से बड़ी कमाई की है। भारत सरकार ने वर्ष 2016 में इनकी ऑनलाइन विज्ञापन बिक्री पर 6% और फिर पिछले वर्ष अन्य डिजिटल सेवाओं पर 2% कर लगाया था।अमेरिका ने इसका विरोध किया था। इस समझौते में भारत को इस पर दृढ़ रहने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

इंटरनेट जैसी सुविधाओं से प्राप्त लाभ पर करों की वैश्विक साझेदारी की अपील विश्व की प्रमुख तकनीकी कंपनियों को उनके वास्तविक उत्तरदायित्व के अनुसार कार्य करने के लिये आवश्यक पारदर्शिता के अनुरूप हो सकती है। हालाँकि, यह भारत की  डिजिटल-कर समझ को कम कर सकती है। फिर भी, यदि दुनिया के वित्तीय भविष्य को इस संधि द्वारा बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है तोइस व्यवस्था में शामिल होनेमें संकोच नहीं करना चाहिये।

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