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 भारत-ब्रिटेन संबंध

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाओं से संबंधित मुद्दे)
(मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारतीय हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों एवं राजनीति का प्रभाव, द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह अथवा भारतीय हितों को प्रभावित करने वाले करार, भारत एवं इसके पड़ोसी- देशों से संबंधित मुद्दे) 

संदर्भ

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा ब्रिटेन के उनके समकक्ष बोरिस जॉनसन के मध्य मई के पहले सप्ताह में ‘वर्चुअल शिखर सम्मेलन’ का आयोजन किया गया। गौरतलब है कि, इस शिखर सम्मलेन को कोविड-19 के कारण कई बार से स्थगित किया जाता रहा है।

द्विपक्षीय शिखर सम्मलेन के प्रमुख बिंदु

  • कोरोना महामारी के दौर में भारत की तरह ब्रिटेन भी कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित रहा है। अतःदोनों समकक्षों के मध्य इस मुद्दे पर वार्ता के अनेक बिंदु थे।
  • कोविड-19 महामारी से पीड़ितों के उपचार हेतु आवश्यक ऑक्सीजन तथा अन्य चिकित्सा उपकरणों की तत्काल आपूर्ति के अतिरिक्त भारत और ब्रिटेन को इस ‘वायरस’ से लड़ने के लिये स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यापक सहयोग की आवश्यकता को अनिवार्य समझा जा रहा है।
  • शिखर सम्मेलन में 'द्विपक्षीय संबंधों' के स्तर में वृद्धि कर इसे 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' का स्वरूप प्रदान करने हेतु एक महत्त्वाकांक्षी ‘रोडमैप 2030’ अपनाया गया।
  • यह रोडमैप अगले दस वर्षों में दोनों देशों के नागरिकों के मध्य पारस्‍परिक संपर्क, व्यापार एवं अर्थव्यवस्था, रक्षा व सुरक्षा, जलवायु कार्रवाई तथा स्वास्थ्य जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में मज़बूत संबंधों का मार्ग प्रशस्त करेगा।
  • दोनों प्रधानमंत्रियों ने विश्व की पाँचवीं और छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार की संभावनाओं को उन्‍मुक्‍त करने के साथ-साथ वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना से भी अधिक करने के एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को तय करते हुए एक ‘उन्नत व्यापार साझेदारी (ई.टी.पी.)’ का शुभारंभ किया।
  • ‘ई.टी.पी.’ के एक हिस्से के रूप में भारत और ब्रिटेन ने एक व्यापक एवं संतुलित मुक्‍त व्‍यापार समझौता (एफ.टी.ए) पर वार्ता करने के लिये सहमति जताई, जिसमें अतिशीघ्र परिणाम सुनिश्चित करने के लिये एक ‘अंतरिम व्यापार समझौते’ पर विचार करना भी शामिल है। भारत और ब्रिटेन के बीच उन्‍नत व्यापार साझेदारी से दोनों देशों में हजारों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोज़गार सृजित होंगे।
  • ब्रिटेन अनुसंधान और नवाचार संबंधी सहयोग के क्षेत्र में भारत का दूसरा सबसे बड़ा साझेदार है। शिखर सम्मेलन में एक नए भारत-ब्रिटेन ‘वैश्विक नवाचार साझेदारी’ की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य चुनिंदा विकासशील देशों को समावेशी भारतीय नवाचारों का हस्तांतरण करने में आवश्‍यक सहयोग प्रदान करना है।
  • इसकी शुरुआत अफ्रीका महाद्वीप से होगी। दोनों ही पक्षों ने डिजिटल एवं आई.सी.टी. उत्पादों सहित नई व उभरती प्रौद्योगिकियों पर आपसी सहयोग बढ़ाने, और आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने की दिशा में काम करने पर भी सहमति जताई। साथ ही, रक्षा और सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने पर भी सहमति व्यक्त की जिसमें समुद्री क्षेत्र, आतंकवाद का मुकाबला करना और साइबरस्पेस जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  • दोनों देशों ने ‘प्रवासन एवं आवाजाही पर एक व्यापक साझेदारी’ का शुभारंभ किया है जिससे दोनों देशों के बीच विद्यार्थियों एवं प्रोफेशनलों की आवाजाही के लिए और भी अधिक अवसर सुलभ होंगे।
  • भारत और ब्रिटेन के अतिरिक्त, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों ने भी इस शिखर सम्मलेन में प्रतिभाग किया।
  • उल्लेखनीय है कि, आगामी माह में ब्रिटिश प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ‘ग्रुप ऑफ़ सेवेन प्लस थ्री’ सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा।

भारत-ब्रिटेन संबंधों के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ

  • दोनों देशों के बीच काफी लंबे समय से मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं फिर भी, ब्रिटेन भारत का एक स्थाई साझेदार नहीं बन पाया है। इसके विपरीत, अमेरिका तथा फ्राँस जैसे देशों के साथ हाल के दिनों में संबंध काफी सामान्य हुआ है।
  • दोनों देशों के मध्य संबंधों में स्थायित्त्व की कमी का एक प्रमुख कारण, औपनिवेशिक इतिहास भी है। जहाँ भारतीय शासन और आम जनमानस इससे उबर नहीं पाया है, वहीं ब्रिटेन भी अभी औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों से निकल नहीं पाया है।
  • विभाजन की कड़वी विरासत तथा पाकिस्तान के प्रति ब्रिटेन के ‘कथित झुकाव’ ने दोनों देशों के मध्य जुड़ाव में बाधा पहुँचाया है। ब्रिटेन में बड़ी संख्या में मौजूद दक्षिण एशियाई डायस्पोरा ने भी घरेलू व अंतर-क्षेत्रीय राजनीति के ब्रिटेन की आंतरिक राजनीति में शामिल होने से संबंधों को और जटिल बना दिया है।
  • दक्षिण एशियाई देशों के मध्य संबंधों पर ब्रिटिश लेबर पार्टी का रुख, भारत को असहज करता है; खासकर कश्मीर के संदर्भ में। पारंपरिक तौर पर भारतीय बौद्धिक वर्ग में लेबर पार्टी को लेकर काफी उत्साह तथा कंजर्वेटिव पार्टी को लेकर चिंताजनक रुख रहा है, इस वर्ग का मानना है कि लेबर पार्टी का रवैया भारत के प्रति सहानुभूति का रहा है।
  • विगत तीन दशकों में ब्रिटिश कंजर्वेटिव पार्टी भारत के महत्त्वपूर्ण साझेदार के रूप में उभरा है, जबकि लेबर पार्टी घरेलू राजनीति में भारत की आंतरिक राजनीति को शामिल करता रहा है।
  • उपर्युक्त बिंदुओं में इस आधार पर विरोधाभास प्रतीत होता है कि जहाँ लेबर पार्टी औपनिवेशिक शासन का मुखर आलोचक होते हुए भी भारत के प्रति उसका रुख सकरात्मक नहीं रहा है, वहीं कंजर्वेटिव पार्टी औपनिवेशिक शासन के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी भारतीय हितों के प्रति संवेदनशील रहा है।

मज़बूत द्विपक्षीय संबंधों हेतु नए आयाम

  • दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत आधार प्रदान करने के लिये दोनों शीर्ष नेताओं ने सबंधों के नए प्रतिमान तय किये है तथा इसी दिशा में कदम उठाते हुए ‘10 वर्षीय रोडमैप’ की घोषणा की गई जिसमें सहयोग के विभिन्न क्षेत्र शामिल है।
  • बृहत् लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये दोनों देशों ने नई परिस्थितियों के आलोक में अपने हित के अनुकूल देशों को भी चिह्नित कर सहयोग करने की इच्छा जताई है, जैसे- ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर निकल गया वहीं भारत ने चीन-केंद्रित आर्थिक समझौतों में शामिल होने से इनकार कर दिया है।
  • हालाँकि दोनों देश क्षेत्रीय भागीदारों के साथ व्यापार करना जारी रखना चाहते है लेकिन इसके लिये वे व्यापक वैश्विक भागीदारी चाहते हैं।
  • ब्रिटेन यूरोप का एक प्रमुख शक्ति-केंद्र है, इसी कारण उसका झुकाव ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र’ की तरफ भी है। फलतः भारत के साथ उसका सहयोग स्वाभाविक है।
  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभुत्त्व को प्रतिसंतुलित करने तथा क्षेत्रीय संतुलन को बरकरार रखने के लिये भारत को भी व्यापक सहयोग की आवश्यकता है, ऐसे में ब्रिटेन भारत के लिये महत्त्वपूर्ण सहयोगी साबित हो सकता है।
  • इसके अतिरिक्त, ब्रिटेन भारत के रक्षा आधुनिकीकरण लक्ष्य में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

निष्कर्ष

दोनों देश मज़बूत द्विपक्षीय साझेदारी तथा क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर बल दे रहे हैं, अतः ब्रिटेन में पाकिस्तान तथा दक्षिण एशियाई डायस्पोरा की राजनीति को संतुलित करना आसान हो सकता है। साथ ही, दोनों देशों के पारस्परिक सहयोग में वृद्धि भविष्य में संबंधों की आधारशिला को मजबूती प्रदान करेगा।

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