• Sanskriti IAS - अखिल मूर्ति के निर्देशन में

राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी लिमिटेड: भारत का प्रथम ‘बैड बैंक’

  • 18th September, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा : राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, आर्थिक और सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा : सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 - भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ

  • केंद्रीय वित्त मंत्री ने वर्ष 2021-22 के बजट में प्रस्तावित भारत के प्रथम ‘बैड बैंक’ के गठन की घोषणा की है। इस बैड बैंक का नाम राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी लिमिटेड (National Asset Reconstruction Company Limited- NARCL) है। इसे कंपनी अधिनियम के अंतर्गत निगमित किया गया है।
  • यह विभिन्न चरणों में अलग-अलग वाणिज्यिक बैंकों से लगभग 2 लाख करोड़ रुपए की दबावग्रस्त परिसंपत्तियों (Stressed Assets) का अधिग्रहण करेगा।
  • एक अन्य इकाई ‘भारत ऋण समाधान कंपनी लिमिटेड’ (India Debt Resolution Company Ltd- IDRCL) का भी गठन किया गया है, जो बाज़ार में तनावग्रस्त संपत्तियों के विक्रय का प्रयास करेगी।

बैड बैंक और इसकी आवश्यकता

  • प्रत्येक देश में वाणिज्यिक बैंक जमा स्वीकार करते हैं और ऋण प्रदान करते हैं। ‘जमा’ एक बैंक के ‘दायित्व’ (Liability) के रूप में होता है क्योंकि यह वह धनराशि है, जो उसने एक आम आदमी से लिया है, जबकि जमाकर्ता द्वारा मांगे जाने पर उसे वह पैसा वापस करना होता है।
  • इसके अतिरिक्त, बैंक जमाकर्ता की जमाओं पर ब्याज का भुगतान भी करता है। इसके विपरीत, बैंक जो ऋण देते हैं, वह उनकी ‘संपत्ति’ होती है क्योंकि इसके माध्यम से बैंक को ब्याज के रूप में आय प्राप्त होती है। स्पष्ट है कि यह ब्याज उधारकर्ताओं द्वारा बैंक को चुकाया जाता है।
  • बैंकिंग का संपूर्ण व्यावसायिक मॉडल इसी सिद्धांत पर कार्य करता है कि एक बैंक जमाकर्ताओं को जितना ब्याज भुगतान करता है, उसकी तुलना में उधारकर्ताओं से अधिक ब्याज वसूल करता है।
  • उदाहरणार्थ, यदि किसी बैंक से ऋण लेने वाली फर्म अपने व्यवसाय में विफल हो जाती है और वह ब्याज या मूल राशि का भुगतान नहीं कर पाती है, तो ऐसा ऋण बैंक के लिये ‘बैड लोन’ माना जाता है।
  • मान लीजिये कि अधिकतर बैंकों के साथ ऐसा ही हो। इस स्थिति में ‘बैड लोन’ (ऐसा ऋण जिसका भुगतान नहीं किया जा रहा है) खतरनाक तरीके से बढ़ेंगे। ऐसे में, ऋण देने वाले बैंकों की संपत्ति वापस नहीं आएगी, उनके पास कारोबार के लिये धनाभाव होगा, परिणामस्वरूप वे बंद हो जाएँगे। 
  • अब एक ऐसे परिदृश्य की कल्पना करें, जहाँ एक अर्थव्यवस्था में कई बैंक एक ही समय में उच्च स्तर के ‘बैड लोन’ का सामना करते हैं। इससे पूरी अर्थव्यवस्था की स्थिरता को खतरा होगा।

गैर-निष्पादित परिसंपत्ति

  • सामान्य कार्यप्रणाली में बैड लोन के अनुपात के रूप में उनकी गणना सामान्यतया कुल अग्रिम (ऋण) के प्रतिशत के रूप में की जाती है– वृद्धि से दो स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती  हैं:
  1.  संबंधित बैंक के लाभ में कमी होगी क्योंकि उसे अपने कुछ लाभ का प्रयोग बैड लोन से हो रहे नुकसान की भरपाई के लिये करना पड़ सकता है।
  2. संबंधित बैंक के अधिकारी किसी व्यावसायिक उद्यम को ऋण देने से मना करेंगे क्योंकि ‘गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ’ (Non-Performing Assets- NPAs) पहले से ही बढ़ी हुई हैं।
  • वर्ष 2016 के पश्चात् भारतीय बैंकों में एन.पी.ए. चिंताजनक स्थिति तक बढ़ा हुआ है। इसकी पहचान भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा एक दिशा-निर्देश के कारण हुई। इस दिशा-निर्देश के अनुसार बैंकों के अपने ऋण पोर्टफोलियो से बैड लोन को चिह्नित करने की आवश्यकता थी।
  • गौरतलब है कि कई बैंक वर्ष 2008-09 के ‘वैश्विक वित्तीय संकट’ के उपरांत से ही अपने ऋण पोर्टफोलियो में बैड लोन में बढ़ोतरी को अनुभव कर रहे थे।
  • करदाताओं के दृष्टिकोण से सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि एन.पी.ए. का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास है, जो सरकार के स्वामित्व के अंतर्गत आते हैं। इस कारण ये भारतीय नागरिकों के भी बैंक कहे जाएँगे।
  • ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के व्यवसाय को सुचारू रूप से चलाने के लिये सरकार को उनमे पूँजी ‘लगाने’ की आवश्यकता होगी, अर्थात् इन बैंकों का ‘वित्तीय स्वास्थ्य’ सुधारने के लिये करदाताओं के धन का उपयोग किया जाएगा ताकि वे अपनी आर्थिक गतिविधियों को संचालित कर सकें।
  • कई आर्थिक विशेषज्ञों ने तर्क दिया था कि सरकार को एक ‘बैड बैंक’ गठित करने की आवश्यकता है, अर्थात् ऐसी संस्था जहाँ सभी बैड लोन ‘पार्क’ किये जा सकें।
  • इससे वाणिज्यिक बैंकों को उनकी ‘तनावग्रस्त परिसंपत्तियों’ से राहत मिल सकेगी और वे अपने सामान्य बैंकिंग संचालन पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
  • इस प्रकार, वाणिज्यिक बैंक पुनः उधार देना शुरू करते हैं और ‘बैड बैंक इन ‘परिसंपत्तियों’ को बाज़ार में बेचने की कोशिश कर सकते हैं।

एन.ए.आर.सी.एल.- आई.डी.आर.सी.एल. 

  • एन.ए.आर.सी.एल. ने एक ‘परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी’ (ARC) के रूप में लाइसेंस प्राप्त करने के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक के पास आवेदन किया है। 
  • एन.ए.आर.सी.एल. की स्थापना बैंकों की तनावग्रस्त परिसंपत्तियों को समेकित करते हुए ऋणों का समाधान करने के लिये की गई है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एन.ए.आर.सी.एल. में 51 प्रतिशत स्वामित्व बनाए रखेंगे।
  • एन.ए.आर.सी.एल. का पूँजीकरण बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) द्वारा इक्विटी के माध्यम से किया जाएगा। यह आवश्यकतानुसार ऋण से भी पूँजी जुटाएगा, जबकि भारत सरकार की गारंटी शुरुआती पूँजीकरण संबंधी आवश्यकताओं में कमी लाएगी।
  • इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और सार्वजनिक वित्त संस्थानों के पास अधिकतम 49 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी, जबकि शेष हिस्सेदारी निजी क्षेत्र के ऋणदाताओं के पास रहेगी।
  • आई.डी.आर.सी.एल. एक सेवा कंपनी या परिचालन इकाई है, जो परिसंपत्ति का प्रबंधन करेगी और बाज़ार के व्यवसाय-संबंधी और टर्नअराउंड विशेषज्ञों को अपने कार्यों में शामिल करेगी।

एन.ए.आर.सी.एल.- आई.डी.आर.सी.एल. की कार्यप्रणाली

  • एन.ए.आर.सी.एल. ने आर.बी.आई. के मौजूदा नियमों के तहत विभिन्न चरणों में लगभग 2 लाख करोड़ रुपए के मूल्य की तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा है। प्रस्ताव के तहत ‘15 प्रतिशत नकद और 85 प्रतिशत प्रतिभूति रसीदों’ (Security Receipts-SRs) के माध्यम से इन परिसंपत्तियों का अधिग्रहण किया जाएगा ।
  • एन.ए.आर.सी.एल. के तहत समाधान की गई प्रत्येक परिसंपत्ति का मूल्य 500 करोड़ से अधिक होना चाहिये। चरण-I के तहत लगभग 90,000 करोड़ मूल्य की परिसंपत्तियों को एन.ए.आर.सी.एल. को हस्तांतरित किये जाने की उम्मीद है, जबकि कम मूल्य वाली शेष परिसंपत्तियों को चरण-II में हस्तांतरित किया जाएगा।  
  • ऐसा ‘रेज़ोल्यूशन मैकेनिज्म’ जो एन.पी.ए. के मामलों का समाधान करता है, को आमतौर पर सरकार के समर्थन की आवश्यकता होती है। यह समर्थन विश्वसनीयता और आकस्मिक प्रतिरोध (बफर) प्रदान करता है।
  • इसलिये30,600 करोड़ तक की भारत सरकार की गारंटी एन.ए.आर.सी.एल. द्वारा जारी ‘प्रतिभूति रसीदों’ का समर्थन करेगी। यह गारंटी 5 वर्ष के लिये वैध होगी तथा गारंटी लागू होने के लिये पूर्ववर्ती शर्त ‘समाधान या परिसमापन’ (Resolution or Liquidation) होगी।
  • इसके अतिरिक्त, समाधान में देरी को हतोत्साहित करने के लिये एन.ए.आर.सी.एल. को गारंटी शुल्क का भुगतान भी करना पड़ेगा, जो समय बीतने के साथ बढ़ता जाएगा।
  • गारंटी, एस.आर. के ‘अंकित मूल्य और वास्तविक प्राप्ति’ के बीच की कमी को पूरा करेगी। भारत सरकार की गारंटी एस.आर. की तरलता को भी बढ़ाएगी क्योंकि ऐसे एस.आर. कारोबार के योग्य होंगे।
  • एन.ए.आर.सी.एल. लीड बैंक को प्रस्ताव देकर संपत्ति का अधिग्रहण करेगी। एक बार जब एन.ए.आर.सी.एल. का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाएगा तो आई.डी.आर.सी.एल. को प्रबंधन और मूल्यवर्द्धन के लिये नियुक्त किया जाएगा।

लाभ

  • उक्त संरचना तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान संबंधी त्वरित कार्रवाई को प्रोत्साहित करेगी, जिससे बेहतर मूल्य प्राप्ति में मदद मिलेगी।
  • इस दृष्टिकोण को अपनाने से बैंकों के पास व्यापार बढ़ाने और ऋण वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करने के लिये अतिरिक्त बैंककर्मी उपलब्ध होंगे।
  • इन तनावग्रस्त परिसंपत्तियों और एस.आर. धारकों से बैंकों को लाभ प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त, इससे बैंकिंग प्रणाली में सुधार आएगा तथा बाज़ार से पूँजी जुटाने की उनकी क्षमता में वृद्धि होगी।
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