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नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता

  • 8th June, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा, विषय- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन, प्रश्नपत्र-3: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध)

संदर्भ

पिछले सप्ताह नेपाल में राजनीतिक उठापटक, अनिश्चितता के दूसरे चरण में प्रवेश कर गई। नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने एक पक्षपातपूर्ण कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ‘ओली’ की सलाह पर प्रतिनिधि सभा (निम्न सदन) को भंग कर दिया, इसे संविधान की अवहेलना माना जा रहा है। निम्न सदन के लिये नवंबर में चुनाव प्रस्तावित किये गए हैं, तब तक के लिये प्रधानमंत्री ओली ने अपनी स्थिति को मज़बूत कर लिया है।

ओली की अवसरवादी राजनीति

  • वर्ष 2015 में संघीय गणराज्य नेपाल का संविधान लागू हुआ तथा वर्ष 2017 में ओली ने पहली बार पूर्ण-बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाई थी। ओली की पार्टी सी.पी.एन.(यू.एम.एल.) ने ‘माओवादी सेंटर’ को सरकार में अपना साझेदार बनाया।
  • वर्ष 2018 में, इन दोनों पार्टियों ने अपने गठबंधन को मज़बूत करने के लिये आपस में विलय कर लिया तथा नेपाल साम्यवादी पार्टी (NCP) का गठन किया।
  • वर्ष 2018 में भारत के साथ संबंधों में सकारात्मक प्रगति देखने को मिली, यहाँ तक कीभारत, ओली के ‘भारत-विरोधी बयानों’ को भी भुलाने के लिये तैयार था। इसी क्रम में ओली की यात्रा के तुरंत बाद ही भारतीय प्रधानमंत्री ने मई 2018 में नेपाल का दौरा किया था।
  • हालाँकि, प्रधानमंत्री ओली की निरंकुश प्रवृत्तिशीघ्र ही सामने आने लगी। पूर्व माओवादी नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के साथ सत्ता के बँटवारे की व्यवस्था बिगड़ने लगी।
  • ‘सत्ता के बँटवारे’ का मूल विचार यह था कि दोनों बारी-बारी से, प्रधानमंत्री के साथ-साथ एन.सी.पी. की सह-अध्यक्षता करेंगे। लेकिन ओली के लिये स्थिति अब दुविधापूर्ण हो गई है।
  • ओली ने एक-एक करके मुख्य माओवादी नेताओं को कैबिनेट से बाहर कर दिया। बाहर हुए नेता अब प्रचंड के पक्ष में होकर ‘एक व्यक्ति एक पद’ की नीति के सम्मान की माँग कर रहे हैं।
  • प्रचंड ने ओली को प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल पूरा करने का समर्थन इसशर्त पर किया थाकि उन्हें पार्टी के सह-अध्यक्ष के रूप में अपनी भूमिका का त्याग करना होगा। ओली ने इस शर्त को दरकिनार कर दिया।

कालापानी विवाद

  • ओली ने आतंरिक मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिये वर्ष 2019 के अंत में कालापानी सीमा मामले को उछाला। ओली ने ये कदम तब उठाया, जबभारत ने जम्मू और कश्मीर राज्य को विभाजित कर केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख के नए मानचित्र ज़ारी किये। गौरतलब है कि, 98 प्रतिशत भारत-नेपाल सीमा का सीमांकन किया जा चुका है, केवल दो क्षेत्र सुस्ता और कालापानी, लंबित थे।
  • यद्यपि नए भारतीय मानचित्र ने भारत-नेपाल सीमा को किसी भी भौतिक रूप से प्रभावित नहीं किया लेकिन इसने ओली को ‘नेपाली राष्ट्रवाद’ की भावनाओंको उत्तेजित करने का एक अवसर ज़रूर दे दिया।
  • ओली ने नेपाल के उत्तर-पश्चिमी सिरे पर उत्तराखंड और चीन के साथ सलंग्न लगभग 60 वर्ग किमी. को कवर करने वाले कालापानी क्षेत्र में अतिरिक्त 335 वर्ग किमी. की माँग को उठाकर विवाद को और बढ़ा दिया।
  • ये सीमाएँ वर्ष 1816 में अंग्रेज़ों द्वारा निर्धारित की गईं थी तथा भारत को वे क्षेत्र विरासत में मिले, जिन पर अंग्रेज़ों ने वर्ष 1947 तक क्षेत्रीय नियंत्रण बरकरार रखा था।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर हावी घरेलू राजनीति

  • भारत, पहली कोविड-19 लहर में उलझने के कारण द्विपक्षीय वार्ता को टालता रहा और शायद वह ओली पर पड़ रहे घरेलू राजनीतिक दबाव को महसूस नहीं कर पा रहा था।
  • मई 2020 में जब भारतीय रक्षा मंत्री ने कालापानी के रास्ते ‘कैलाश-मानसरोवर’ तीर्थ मार्ग से लिंक एक 75 किमी. सड़क का उद्घाटन किया, तो ओली ने राष्ट्रवादी भावनाओ को भड़काने के लिये एक संविधान संशोधन के द्वारा नेपाल का एक नया नक्शा ज़ारी किया।
  • हालाँकि, इससे ज़मीनी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ लेकिन इसने भारत के साथ किसी भी तरह की बातचीत की संभावनाओं को कम कर दिया। इसके अतिरिक्त, ओली के लिये यह एक तत्काल राहत थी क्योंकि उनकी राजनीतिक परेशानियाँ अभी समाप्त नहीं हुईं थी।
  • राष्ट्रपति भंडारी प्रधानमंत्री ओली की विश्वस्त रहीं हैं, जिसका लाभ उन्हें राष्ट्रपति पद के रूप में मिला। उन्होंने संवैधानिक औचित्य को दरकिनार कर संदिग्ध अध्यादेशों के द्वारा ओली के ‘वफादारों’ को संवैधानिक पदों पर नियुक्त किया।
  • सत्ताधारी पार्टी के सहयोगी नेताओं द्वारा ‘अविश्वास प्रस्ताव’ की ख़बरों के बीच ओली की सलाह पर राष्ट्रपति ने निम्न सदन को विघटित कर दिया। इस कदम की घोर आलोचना हुई क्योंकि एन.सी.पी. को सदन में पूर्ण बहुमत प्राप्त था।
  • भारत ने इसे नेपाल का ‘आंतरिक मामला’ बताते हुए इस अस्थिरता से बचने का प्रयासकिया, जबकि चीनी राजदूत ने सक्रिय रूप से सत्ताधारी गुटों के बीच समन्वय स्थापित करने पर ज़ोर देना जारी रखा।

राष्ट्रपति की अनौचित्यता

  • मई के मध्य में ओली को एक बार फिर से राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की शपथ दिलाई तथा उन्हें बहुमत साबित करने का मौका दिया। इससे स्पष्ट है की विपक्ष एक बारफिर से कोई विकल्प प्रस्तुत करने में विफल रहा।
  • एक सप्ताह के भीतर ओली ने विश्वास मत पेश करने से इनकार कर राष्ट्रपति को अन्य विकल्पतलाशने की सलाह दी। एक विपक्षी नेता द्वारा अपना दावा प्रस्तुत करने पर हरकत में आए ओली ने पुनः अपनी सरकार के विश्वास मत की बात कही।
  • हालाँकि, राष्ट्रपति ने दोनों में से किसी दावे की जाँच किये बिना एक बार फिर से निम्न सदन को भंग कर दिया तथा नए चुनावों की घोषणा कर दी। इस कदम की भी कठोर आलोचना हुई, क्योंकि राष्ट्रपति ने विपक्ष के दावे पर गौर नहीं किया।

भावी राह

  • संविधान तैयार करने के उद्देश्य से वर्ष 2008 में नई संविधान सभा के लिये कराए गए चुनावों के पश्चात् से, नेपाल ने तीन कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों (जी.पी. कोइराला, सुशील कोइराला तथा देउबा), दो माओवादी प्रधानमंत्रियों (दो बार, प्रचंड और बाबूराम भट्टराई) तथा तीन यू.एम.एल. प्रधानमंत्रियों (नेपाल, खनाल और तीन बार ओली) काकार्यकाल देखा है।
  • इसके अतिरिक्त, मुख्य न्यायाधीश ने वर्ष 2013 में कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में देश बागडोर संभाली थी। हालाँकि, उक्त में से किसी ने ओली और भंडारी के समान संविधान और राजनीतिक ताने-बाने को नुकसान नहीं पहुँचाया।
  • विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति द्वारा सदन भंग करने के निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, किंतु यहबेनतीजा रही। विशेषज्ञों का अनुमान है कि चुनाव होने की स्थिति में ओलीभारत-विरोधी राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़कानेका प्रयास करेंगे।

निष्कर्ष    

  • उक्त घटनाक्रम के आलोक में कहा जा सकता है कि नेपाल में अभी राजनीतिक अनिश्चितता बनी रहेगी। नेपाल के संबंध में भारत ने हमेशा से ही ‘संवैधानिकता और बहुदलीय लोकतंत्र’ का समर्थन किया है।
  • इस समय भारत को सभी राजनीतिक नेताओं के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहने की ज़रूरत है। हालाँकि, भारत को किसी भीप्रकार के पक्षपातपूर्ण रवैये से बचना होगा।
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