• Sanskriti IAS - अखिल मूर्ति के निर्देशन में

सागरीय जल में ऑक्सीजन अल्पता का मानचित्रण

  • 12th January, 2022

(प्रारंभिक परीक्षा- पर्यावरणीय पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन संबंधी सामान्य मुद्दे; मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान- अति महत्त्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताएँ)

संदर्भ 

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने विश्व के सबसे बड़े ‘ऑक्सीजन की कमी वाले जलीय क्षेत्रों’ का सर्वाधिक विस्तृत त्रि-आयामी एटलस तैयार किया है। यह उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में ऑक्सीजन की कमी वाले दो प्रमुख जल-निकायों का उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाला मानचित्र प्रदान करता है। यह मानचित्र ऑक्सीजन की कमी वाले प्रत्येक क्षेत्र में इसकी (ऑक्सीजन की) मात्रा, सीमा और अलग-अलग गहराई को प्रदर्शित करता है। यह अध्ययन ‘ग्लोबल बायोजियोकेमिकल साइकिल’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

किसे कहते हैं ऑक्सीजन की कमी वाले क्षेत्र?

  • महासागरों के लगभग प्रत्येक हिस्से में जीव रहते हैं। महासागरों में कुछ विशेष क्षेत्र ऐसे होते हैं, जहाँ ऑक्सीजन प्राकृतिक रूप से कम हो जाती है। ये क्षेत्र अधिकांश एरोबिक जीवों (ऑक्सीजन की आवश्यकता वाले) के रहने के लिये उपयुक्त नहीं होते। ऐसे क्षेत्रों को ‘ऑक्सीजन की कमी वाले क्षेत्र’ (Oxygen-Deficient Zones: ODZs) कहते हैं।
  • यद्यपि ये क्षेत्र महासागर के कुल आयतन के एक प्रतिशत से भी कम हैं, फिर भी ये नाइट्रस ऑक्साइड, जो कि एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है, के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। ये मत्स्य पालन और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के विस्तार को भी सीमित कर सकते हैं।

प्रमुख ओ.डी.जेड. क्षेत्र

  • वैज्ञानिकों ने 40 वर्षों से अधिक के समुद्री आँकड़ों का विश्लेषण किया। इन मानचित्रों से शोधकर्ताओं ने उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में दो प्रमुख ओ.डी.जेड. की कुल मात्रा या आयतन का अनुमान लगाया। 
  • पहला क्षेत्र, दक्षिण अमेरिका के तट से लगभग 600,000 क्यूबिक किमी. तक फैला हुआ है। दूसरा क्षेत्र, मध्य अमेरिका के तट से दूर है, जो कि इससे लगभग तीन गुना है।

ओ.डी.जेड. एटलस का लाभ

  • ओ.डी.जेड. एटलस एक संदर्भ के रूप में कार्य करता है। इससे इन क्षेत्रों में हुए परिवर्तनों का बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जलवायु के गर्म होने पर वे किस तरह के परिवर्तन प्रदर्शित कर सकते हैं। उष्णकटिबंधीय प्रशांत के ऑक्सीजन की कमी वाले क्षेत्रों का यह अवलोकन अभी तक की तुलना में अधिक विस्तृत है।
  • ऐसा माना जाता है कि जलवायु के गर्म होने से महासागरों में ऑक्सीजन की क्षति होगी। किंतु उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों, जहाँ ऑक्सीजन की कमी वाले बड़े क्षेत्र होते हैं, में अभी से ही स्थिति अधिक जटिल है। 
  • इन क्षेत्रों का विस्तृत मानचित्रण महत्त्वपूर्ण है ताकि भविष्य में होने वाले परिवर्तनों का  तुलनात्मक अध्ययन किया जा सके। यह ऑक्सीजन के बारे में एक रूपरेखा प्रदान करता है कि कैसे समुद्र की ऑक्सीजन आपूर्ति को नियंत्रित किया जाता है।

अध्ययन के निष्कर्ष 

  • ओ.डी.जेड. प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले समुद्र के विशाल और अपेक्षाकृत स्थायी क्षेत्र हैं। इसके परिणामस्वरूप समुद्री सूक्ष्म जीव आसपास के वातावरण में उपलब्ध संपूर्ण ऑक्सीजन के साथ-साथ डूबे हुए फाइटोप्लैंकटन को नष्ट कर देते हैं।
  • ये ज़ोन उन क्षेत्रों में स्थित होते हैं, जहाँ समुद्री धाराएँ प्रवाहित नहीं होती हैं, क्योंकि ये धाराएँ उस क्षेत्र में ऑक्सीजन युक्त जल की पुन:पूर्ति कर देंगी। फलत: ओ.डी.जेड. अपेक्षाकृत स्थायी ऑक्सीजन की कमी वाले जल क्षेत्र हैं, जो जल की सतह के नीचे लगभग 35 से 1,000 मीटर के बीच की मध्य-महासागरीय गहराई में मौज़ूद हो सकते हैं।
  • शोधकर्ताओं ने उष्णकटिबंधीय प्रशांत में दो प्रमुख ओ.डी.जेड. क्षेत्रों की सीमाओं, आयतन और आकार का मापन किया। इसमें से एक उत्तरी गोलार्ध में और दूसरा दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है। इन क्षेत्रों के सूक्ष्म अवलोकन से यह निष्कर्ष निकला कि ऑक्सीजन की कमी वाला जल अधिक ‘गाढ़ा’ या मध्य की ओर अधिक केंद्रित होता है, जबकि प्रत्येक क्षेत्र के किनारों की ओर यह पतला दिखाई देता है।
  • उथले क्षेत्रों में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक पाई जाती है। इन क्षेत्रों में ऑक्सीजन की अधिकता के लिये कुछ तंत्र (जैसे- प्रकाश संश्लेषण) उत्तरदायी हैं, जो इसे आसपास के जल की तुलना में अधिक ऑक्सीजन युक्त बनाते हैं।  
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