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पीएम-कुसुम योजना : चुनौतियाँ एवं समाधान 

  • 12th October, 2021

संदर्भ

हाल ही में, केंद्रीय ऊर्जा, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री ने प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्‍थान महाभियान (पीएम कुसुम) की समीक्षा की। उन्होंने सरकार द्वारा कृषि संबंधी कार्यों के लिये सौर पंप अपनाने के वायदे की पुनः पुष्टि की।

पीएम-कुसुम

  • पीएम-कुसुम योजना वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य किसानों को सिंचाई के लिये सौर ऊर्जा का उपयोग करने में मदद करना है।
  • इस योजना के तहत किसानों को सौर ऊर्जा पंप और संयंत्र लगाने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। इसके तहत किसान निम्नलिखित तीन में से किसी एक ‘परिनियोजन मॉडल’ (Deployment Model) का उपयोग कर सकते हैं :
    1. ऑफ-ग्रिड सौर पंप
    2. सौरकृत कृषि फीडर
    3. ग्रिड से जुड़े पंप 
    • इनमे सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाने वाला परिनियोजन ऑफ-ग्रिड सौर पंप है।
    • अन्य दो मॉडल के उपयोग ना होने के कारणों में विनियामक, वित्तीय, परिचालन एवं तकनीकी चुनौतियाँ शामिल हैं। केवल कुछ ही राज्यों ने सौर फीडर या ग्रिड से जुड़े पंपों के लिये निविदाएँ या परियोजनाएँ शुरू की हैं।

     चुनौतियाँ और समाधान 

    • पीएम-कुसुम योजना की सफलता के लिये इसकी समयसीमा बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। अधिकांश भारतीय डिस्कॉम के पास अनुबंधित उत्पादन क्षमता का अधिशेष है, इसलिये वे निकट भविष्य में और बिजली खरीदने के इच्छुक नहीं हैं।
    • पीएम-कुसुम की समयसीमा वर्ष 2022 से आगे बढ़ाने से डिस्कॉम को आगे की रणनीति इस योजना के हिसाब से तय करने में आसानी होगी।
    • डिस्कॉम अक्सर योजना के तहत वितरित सौर ऊर्जा की तुलना में उपयोगिता-पैमाने पर सौर ऊर्जा सस्ता पाते हैं। इसके कारण मूलतः योजना के तहत वितरित सौर ऊर्जा का महँगा होना और अंतर-राज्यीय पारेषण प्रणाली (ISTS) प्रभारों में छूट के कारण स्थानीय लाभ की हानि होना है।
    • इस समस्या से निपटने के लिये वितरण सबस्टेशनों पर काउंटर-पार्टी जोखिमों और ग्रिड-अनुपलब्धता जोखिमों को संबोधित करने की आवश्यकता है। योजना के तहत वितरित बिजली संयत्र की उच्च लागत को रोकने के लिये प्रशुल्क निर्धारण को मानकीकृत करने और सौर संयंत्रों के लिये आई.एस.टी.एस. शुल्क में छूट को समाप्त करने की आवशयकता है
    • इसके अतिरिक्त, भूमि विनियमों को भी सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है, जिससे सौर ऊर्जा उत्पादन जैसे गैर-कृषि कार्यों के लिये कृषि भूमि पट्टे पर लेने में किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े।
    • इस योजना की आवश्यकताओं में अग्रिम अनुपालन लागत का 30-40% भुगतान करने में कई किसान असमर्थ हैं। इसके अलावा उन्हें बिना संपार्श्विक के बैंकों से ऋण प्राप्त करने में भी परेशानी होती है।
    • किसानों पर आर्थिक बोझ कम करने के लिये अलग रणनीति की ज़रूरत है, जैसा कि छत्तीसगढ़ और झारखंड के सामुदायिक स्वामित्व वाले मॉडल के रूप में किया गया है। इन क़दमों से सीमांत किसानों को सीमित अग्रिम योगदान के साथ-सात ऑफ-ग्रिड पंपों का स्वामित्व और उपयोग करने में मदद मिलेगी।
    • किसानों को अधिशेष ऊर्जा बनाने से अधिक उपयोगी पानी बेचना और अतिरिक्त भूमि पर सिंचाई करना लगता है।
    • ग्रिड से जुड़े मॉडल के लिये आवश्यक है कि पंपों की पैमाइश की जाए और लेखांकन उद्देश्यों के लिये बिल भेजा जाए जो कि किसानों और डिस्कॉम के बीच तालमेल न होने से बाधित हो जाता है।
    • किसानों से जुड़कर उनका विश्वास जीतना और ‘स्मार्ट मीटर और स्मार्ट ट्रांसफार्मर’ जैसे समाधान परिचालन संबंधी चुनौतियों को हल कर सकता है।

          निष्कर्ष

          उपरोक्त उपायों और जागरूकता अभियानों के संयोजन से पीएम-कुसुम योजना को बढ़ावा मिलेगा। यह योजना भारतीय कृषि में कार्बन फुटप्रिंट को कम करेगी, जो की अंततः तेल आयात में बचत करने में प्रभावशाली होगा। साथ ही, यह योजना कृषि लागत को कम करने के साथ-साथ रोज़गार सृजन में भी सहायक होगी।

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