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सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये प्री-पैक समाधान प्रक्रिया

  • 8th April, 2021

संदर्भ

  • हाल ही में, केंद्र सरकार ने दिवाला संबंधी समस्याओं के समाधान के लिये एक अध्यादेश प्रख्यापित किया है। इसका उद्देश्य ‘प्री-पैक प्रक्रिया’ के माध्यम से ऐसे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को राहत प्रदान करना है, जिन्हें ‘दिवाला एवं दिवालियापन संहिता’ (Insolvency and Bankruptcy Code–IBC) के तहत 1 करोड़ रुपए तक का डिफॉल्टर घोषित किया गया है।
  • उल्लेखनीय है कि कोविड-19 महामारी के कारण भारत सरकार ने आई.बी.सी. के कुछ प्रावधानों को निलंबित कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप 25 अप्रैल, 2020 के बाद से इंसॉल्वेंसी की कोई भी नई प्रक्रिया आरंभ नहीं की जा सकती थी। लगभग एक वर्ष तक जारी रहे इस निलंबन को समाप्त करने के लिये सरकार ने यह अध्यादेश प्रख्यापित किया है। इसके अतिरिक्त, सरकार ने पिछले वर्ष इंसॉल्वेंसी कार्यवाही शुरू करने के लिये न्यूनतम डिफॉल्ट सीमा को एक लाख रुपए से बढ़ाकर एक करोड़ रुपए कर दिया था।

प्री-पैक क्या हैं?

  • ‘प्री-पैक’ से तात्पर्य किसी संकटग्रस्त कंपनी के ऋण समाधान के लिये ‘सार्वजनिक बोली प्रक्रिया’ के स्थान पर ‘लेनदार एवं निवेशकों के बीच होने वाले समझौते’ से है। पिछले एक दशक में यह प्रक्रिया यूरोप में इंसॉल्वेंसी समस्याओं के समाधान का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरी है।
  • प्री-पैक प्रक्रिया के अंतर्गत लेनदार व निवेशक आपस में कुछ निश्चित शर्तों पर सहमत होंगे तथा इस प्रक्रिया का अनुसरण करने से पूर्व दोनों पक्षों को ‘राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण’ (National company Law Tribunal – NCLT) से अनुमति प्राप्त करनी होगी।
  • इस समाधान योजना के अंतर्गत एन.सी.एल.टी. के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करने से पूर्व संबंधित इकाई को अपने कम से कम 66% लेनदारों की सहमति लेनी आवश्यक होगी।
  • राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) को यह अधिकार होगा कि वह अपने समक्ष कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रक्रिया (CIRP) के तहत कार्यवाही के लिये प्रस्तुत किये गए किसी आवेदन को स्वीकृत या अस्वीकृत कर सकेगा।

प्री-पैक इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के लाभ

  • कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी समाधान प्रक्रिया में लगने वाला अधिक समय इसकी सबसे बड़ी सीमा है। दिसंबर 2020 के अंत तक इस प्रक्रिया के लिये प्राप्त हुए लगभग 86% प्रस्तावों ने 270 दिनों की सीमा को पार कर लिया था।
  • इसमें होने वाले विलंब का प्रमुख कारण कंपनी के प्रवर्तकों एवं बोली लगाने वालों के मध्य होने वाली मुकदमेबाजी है, जबकि प्री-पैक समाधान प्रक्रिया के लिये लाए गए अध्यादेश में यह प्रावधान किया गया है कि इस प्रक्रिया को 120 दिनों के भीतर पूर्ण कर लिया जाएगा।
  • कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी समाधान प्रक्रिया में कोई संकल्पित व्यवसायी वित्तीय लेनदारों के प्रतिनिधि के रूप में ऋणी व्यक्तियों को नियंत्रित करता है, जबकि प्री-पैक के मामले में मौजूदा प्रबंधन को ही नियंत्रण की शक्ति प्राप्त होती है।
  • अर्थात प्री-पैक समाधान के संदर्भ में मौजूदा प्रबंधन ही समाधान होने तक नियंत्रण एवं संचालन जारी रखता है, परिणामस्वरूप इसके संचालन में सी.आई.आर.पी. की अपेक्षा न्यूनतम व्यवधान की संभावना होती है।

प्री-पैक इनसाल्वेंसी प्रक्रिया में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को वरीयता

  • देश की अर्थव्यवस्था में एम.एस.एम.ई. क्षेत्र के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए सरकार ने इस क्षेत्र के लिये प्री-पैक इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया को प्रारंभ किया है।
  • देश की जी.डी.पी. में महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करने के साथ ही यह क्षेत्र देश के बड़ी जनसंख्या को विशेषकर असंगठित क्षेत्र में रोज़गार प्रदान करता है।
  • प्री-पैक समाधान प्रक्रिया सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को उनकी देनदारियों के पुनर्गठन एवं पुनः नए सिरे से प्रारंभ किये जाने का अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई है।

प्रवर्तकों द्वारा दुरुपयोग से लेनदारों की सुरक्षा

  • यह पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है। इसके प्रावधानों में यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि गलत प्रस्तावकों एवं फर्मों द्वारा लेनदारों को भुगतान करने से बचने के लिये प्रणाली का दुरुपयोग न किया जाए।
  • प्री-पैक्स कॉर्पोरेट देनदारों को ऋणदाताओं के साथ सहमति से ऋणों के पुनर्गठन करने के साथ कंपनी की संपूर्ण देयता को ध्यान में रखते हैं।
  • प्री-पैक प्रणाली उन संकल्प योजनाओं के समक्ष कड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है, जिनके माध्यम से परिचालन लेनदारों को ऋण की पूर्ण राशि प्राप्त नहीं हो सकी है।
  • स्विस चैलेंज क्रियाविधि के अंतर्गत किसी तीसरे पक्ष को भी संकटग्रस्त कंपनी के लिये संकल्प प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति होगी। ऐसी स्थिति में मूल आवेदक या तो बेहतर प्रस्ताव के समरूप प्रस्ताव प्रस्तुत करेंगे अथवा अपने निवेश को वापस लेंगे।

स्विस चैलेंज क्रियाविधि

  • स्विस चैलेंज, बोली लगाने की एक विधि है, जिसका उपयोग अक्सर सार्वजनिक परियोजनाओं में किया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2009 में अनुबंध पुरस्कार की इस पद्धति को मंजूरी प्रदान की थी।
  • इसके तहत इच्छुक पार्टी किसी अनुबंध या परियोजना के लिये बोली लगाने हेतु प्रस्ताव प्रस्तुत करती है।
  • इसके पश्चात् सरकार परियोजना का विवरण जनता के समक्ष प्रस्तुत करती है तथा इसे क्रियान्वित करने हेतु इच्छुक लोगों से प्रस्ताव आमंत्रित करती है।
  • इन बोलियों की प्राप्ति पर वास्तविक अनुबंधकर्ता को सर्वश्रेष्ठ बोली के चयन का अवसर प्रदान किया जाता है।
  • इस पद्धति को सार्वजनिक-निजी-भागीदारी के आधार पर शामिल परियोजनाओं पर लागू किया जा सकता है, किंतु इसका उपयोग उन क्षेत्रों में जो पी.पी.पी. ढाँचे के अंतर्गत नहीं आते हैं, पी.पी.पी. के पूरक के रूप में भी किया जा सकता है।
  • ‘अनुबंध पुरस्कार’ खरीद के दौरान भाग लेने वाले प्रस्तावों (निविदा प्रस्ताव) का मूल्यांकन करने तथा संबंधित अनुबंध को पुरस्कृत करने के लिये उपयोग की जाने वाली एक विधि है। सामान्यतः इस स्तर पर प्रस्तावों की पात्रता समाप्त कर दी गई है। इसलिये यह पद्धति सबसे बेहतर प्रस्ताव के चयन हेतु उपयुक्त विकल्प बनी हुई है।
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