• Sanskriti IAS - अखिल मूर्ति के निर्देशन में

डॉलर के आधिपत्य को समाप्त करने की रणनीति

  • 9th August, 2022

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3 : भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ

वर्तमान में भारत सहित अन्य कई देश अमेरिकी डॉलर के विकल्प के रूप में अन्य मुद्राओं के उपयोग और अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन के निपटान में इसकी भूमिका पर विचार कर रहे हैं।

वर्तमान परिदृश्य

  • हाल के दिनों में भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में तथा अन्य देशों के साथ भुगतान के निपटान में रुपए के उपयोग के लिये सक्रिय रहा है। रूस भी इसमें शामिल है।
  • खनिज, ईंधन एवं तेल आयात के साथ-साथ S-400 ट्रायम्फ वायु रक्षा प्रणाली के लिये भारत द्वारा रूस के साथ भुगतान निपटान भारत में रूसी बैंकों द्वारा बनाए गए वोस्ट्रो खातों का उपयोग कर रुपए के माध्यम से अर्ध-अनौपचारिक आधार पर किया जा रहा है। 
  • वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक रुपए में व्यापार निपटान के लिये काफी सक्रिय रहा है। वर्तमान परिपत्र का उद्देश्य भारत में रूसी बैंकों के साथ विशेष वोस्ट्रो खातों का संचालन करना है, ताकि व्यापार को बढ़ावा देने के लिये बोली लगाई जा सके और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में रुपए के लिये एक बेहतर स्थिति भी प्राप्त की जा सके।

संभावित लाभ 

  • इससे भारत उच्च कीमत वाले डॉलर के माध्यम से होने वाले लेनदेन से बच सकता है क्योंकि इसके कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति और पूंजी बहिर्प्रवाह (फेड तथा यूरोपीय संघ द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि से प्रभावित) में वृद्धि तथा सितंबर 2021 से विदेशी मुद्रा भंडार में 70 अरब डॉलर की गिरावट आई है।
  • भारत द्वारा अवमूल्यित रूबल और छूट पर तेल खरीदना न केवल लागत में कमी करता है बल्कि भूमि, समुद्र और हवाई मार्गों का उपयोग कर बहु-मॉडल मार्गों के माध्यम से परिवहन में लगने वाले समय की भी बचत करता है। इसके अतिरिक्त भारत अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों से प्रभावित रूस में भी व्यापार विस्तार की उम्मीद कर रहा है।
  • रूस के साथ भारत का व्यापार घाटा होने के साथ (जो विगत दो वित्तीय वर्षों में औसतन लगभग 3.52 बिलियन डॉलर रहा है) भारत से अतिरिक्त खरीद के लिये रूसी बैंकों में वोस्ट्रो रुपया खाते में अधिशेष का रूस द्वारा संभावित उपयोग शामिल है। 
  • इस तरह की खरीद में न केवल फार्मास्यूटिकल उत्पाद और विद्युत मशीनरी (जो वर्तमान में भारत द्वारा रूस को निर्यात की प्रमुख वस्तुएं हैं) शामिल हो सकती हैं बल्कि इनमें उन उत्पादों को भी शामिल किया जा सकता है, जिनकी आवश्यकता रूस को प्रतिबंधों के कारण हो सकती है।

चुनौतियाँ

  • रुपया और रूबल (R-R) दो अस्थिर मुद्राओं के मध्य एक सहमत विनिमय दर से संबंधित मुद्दों के अलावा निजी पार्टियों (कंपनियों, बैंकों) की व्यापार एवं भुगतान के लिये रुपए को स्वीकार करने की इच्छा का भी प्रश्न है।
  • यद्यपि रूस, भारत से निर्यात के लिये अपने दरवाजे खोलता है, तो 'आर-आर' मार्ग भारतीय निर्यातकों के लिये आकर्षक साबित हो सकता है।
  • रूस से S-400 की खरीद से भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों की भी आशंका है, यद्यपि अमेरिकी कांग्रेस ने चीन से निपटने के लिये भारत को विशेष स्थिति में रूस की हथियार प्रणाली (S-400) की खरीद की मंजूरी देने की बात कही है।
  • भारत और रूस के बीच सौदा (विशेष रूप से कच्चे तेल से संबंधित) पश्चिम के लिये  अप्रत्यक्ष रूप से सहायक माना जा सकता है, क्योंकि भारत 30% छूट पर रूस से कच्चे तेल का आयात करता है फिर उन्हें प्रसंस्कृत कर पश्चिमी देशों को निर्यात कर रहा है।
  • कोविड-19 महामारी से पहले भी ब्रिक्स प्लेटफॉर्म पर क्लियरिंग अकाउंट शुरू करने का प्रयास किया गया था।

पूर्ववर्ती प्रयोग 

  • वर्ष 1953 में सोवियत ब्लॉक के देशों के साथ भारत ने द्विपक्षीय व्यापार और भुगतान में रुपए का उपयोग करने के समझौते पर हस्ताक्षर किये थे।
  • इस व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में केवल राज्य-व्यापारिक इकाइयों की भागीदारी, व्यापार भागीदारों द्वारा सहमति के अनुसार निश्चित विनिमय दरें और  व्यापार अधिशेष वाले देशों द्वारा व्यापार घाटे वाले देशों के लिये ऋण की पेशकश आदि शामिल थे। 
  • सोवियत संघ के क्रेडिट ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा नियंत्रित भिलाई स्टील संयंत्र, अन्य औद्योगिक इकाइयों, तेल रिफाइनरियों और फार्मास्यूटिकल्स की स्थापना को सक्षम किया। 
  • वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद समझौता समाप्त हो गया।

निष्कर्ष 

विश्व के अधिकांश हिस्सों में बाजार अर्थव्यवस्थाएं आज राज्य या सार्वजनिक क्षेत्र को केंद्रीय स्तर पर रखने की संभावना को नकारती हैं। फिर भी, अतीत के भारत-सोवियत समझौते इस बात का प्रमाण दे सकते हैं कि वर्तमान 'आर-आर' व्यापार और रूस में भारतीय निर्यात को बढ़ावा देकर निश्चित रूप से डॉलर में होने वाले सौदों से बचा जा सकता है। यह दोनों व्यापारिक साझेदारों के साथ ही वैश्विक स्तर पर चल रहे मुद्रा पदानुक्रम का मुकाबला करने के प्रयासों में भी लाभकारी होगा।

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