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मुक्त और स्वतंत्र विश्व की आवश्यकता

  • 4th May, 2021

(निबंध तथा मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1 व 2 : विश्व के इतिहास में 18वीं सदी तथा बाद की घटनाएँ, विश्व युद्ध, राजनीतिक दर्शन जैसे साम्यवाद, पूंजीवाद, समाजवाद आदि, द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह)

संदर्भ

विगत कुछ समय से 'मुक्त और स्वतंत्र विश्व' (The Free World) जैसे विचार अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से गायब हैं। अमेरिका का राष्ट्रपति रहते हुए डोनाल्ड ट्रम्प की चर्चा ‘स्वतंत्र विश्व के सर्वमान्य नेता’ के रूप लगभग न के बराबर थी। 1950 और 1960 के दशक में ये शब्द अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सामान्य थे और वर्तमान में व्यवहार में न होने के बावजूद भी वे आज कम प्रासंगिक नहीं हैं।

मुक्त विश्व की परिकल्पना

  • द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने पर यूरोपीय, उत्तरी अमेरिकी और अन्य ‘लोकतांत्रिक देशों’ ने यह माना कि वे अपने पूर्व सहयोगी स्टालिन के सोवियत संघ से ‘सैन्य और राजनीतिक खतरे’ का सामना कर रहे थे।
  • इन लोकतांत्रिक देशों ने स्वयं को संक्षेप में 'पश्चिम' (The West) के रूप में वर्णित किया।प्रसिद्ध अमेरिकी राजनयिक जॉर्ज एफ. केनन ने वर्ष 1946 में मास्को से भेजे अपने प्रसिद्ध 'लॉन्ग टेलीग्राम' में इस शब्द का प्रयोग किया था। इसमें उन्होंने इन देशों की स्वतंत्रता और जीवन शैली के समक्ष एक ऐसी प्रणाली (देशों) द्वारा प्रस्तुत बुनियादी चुनौती को रेखांकित किया, जिसका वास्तविक दृष्टिकोण खुले व मुक्त पूंजीवादी समाज के साथ मेल नहीं खाता था।
  • ‘मुक्त विश्व’ एक अतिप्रचलित शब्द था। इसमें कभी-कभी उन देशों को भी शामिल किया जाता था जो किसी भी प्रकार से मुक्त थे- जैसे भूमध्यसागर के आसपास के कुछ देश जो गैर-निर्वाचित जनरलों द्वारा शासित किये जाते थे और इनका प्रयोग इस बात को प्रदर्शित करने के लिये किया जाता था कि कोई स्वतंत्रता का विरोध किस प्रकार से कर सकता है? हालाँकि, यह अवधारणा उन देशों के आपसी सहयोग को परिभाषित करने का एक उपयोगी तरीका था जो सामाजिक-बाजार अर्थव्यवस्थाओं के साथ सामान्यत: उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करते थे।

विशेषताएं

  • इन देशों की सरकारों को उनके नागरिक शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव के माध्यम से बदल सकते थे। राजनीतिक बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यक मतों का सम्मान किया गया।इस तरह के समाजों में संवैधानिक रूप से ‘जाँच और संतुलन’ तथा कानून के शासन के साथ-साथ प्रेस की स्वतंत्रता, प्रश्न करने, सभी धर्मों का पालन और असहमति के सम्मान को प्रोत्साहित किया गया।
  • निश्चित रूप से ये देश लोकतंत्र की पूर्णता से बहुत दूर थे और कभी-कभी वे स्वयं के मानदंडों और मूल्यों पर खरा नहीं उतर पाते थे परंतु शासन की इस धारणा के तहत कानून ने लोगों की रक्षा की। साथ ही, धीरे-धीरे समृद्धि का भी प्रसार हुआ।
  • साझा सिद्धांतों वाले देशों के इस गठबंधन के स्वीकृत नेता अमेरिकी राष्ट्रपति थे।अमेरिका ने फासीवाद, नाजीवाद और क्रूर राष्ट्रवाद पर जीत में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बाद एक अंतर्राष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया गया जिसमें सभी देश शांतिपूर्वक पनप सकते हैं। 
  • जब वर्ष 1989 में बर्लिन की दीवार गिराई गई तब उदारवादी लोकतंत्रों (मुक्त दुनिया) के भीतर इस बात को लेकर सहमति थी कि सोवियत साम्यवाद के पतन का मतलब उनकी जीत है।

वर्तमान चुनौतियाँ

  • वर्तमान में उदार लोकतंत्रों को फिर से अपने मूल्यों की रक्षा करने और एक वैश्विक व्यवस्था के पुनर्निर्माण में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें चीन और रूस से उत्पन्न चुनौतियाँ प्रमुख है।
  • पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कथित तौर पर एक व्यापारी और अति-राष्ट्रवादी नेता थे जो न तो अपने सहयोगियों और न ही सार्वभौमिक मानवाधिकारों में विश्वास करते थे। हालांकि, उन्होंने चीन के कुछ बुरे व्यवहार को सही ढंग से उजागर किया परंतु अमेरिका के पारंपरिक दोस्तों का तिरस्कार किया और सामान्य तौर पर रूस की बर्बरता को भी नजरअंदाज किया।
  • इसके अतिरिक्त, वे अंतर्राष्ट्रीय सहमति के लिये स्वतंत्रता और लोकतंत्र का कोई भी दृष्टिकोण प्रस्तुत करने में विफल रहे। यह अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन के समक्ष आने वाली कई चुनौतियों में से एक है।

उपाय

  • अमेरिका जिस तरह की दुनिया को देखना चाहता है, उसी के अनुसार ही उसको और अधिक सकारात्मक व रचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिये। साथ ही, अपने तौर-तरीकों और मानव समाज की धारणाओं पर अडिग रहने का साहस व आत्मविश्वास भी होना चाहिये।
  • बिडेन को इस वैश्विक एजेंडे के लिये प्रयास अमेरिका से ही प्रारंभ करना होगा। कोरोनोवायरस महामारी पर काबू पाना, अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाना, नस्लीय विभाजन को खत्म करना और शालीनता तथा गरिमा को बहाल करना व ‘अमेरिकी सार्वजनिक बहस’ की आगे ले जाने की आवश्यकता है।
  • जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिये वे चीन और यहां तक ​​कि रूस के साथ काम करने के लिये तैयार है परंतु वे अमेरिका को एक निवेदक की भूमिका में नहीं लाना चाहते है।
  • चीन, गरीब देशों में संदिग्ध परियोजनाओं के वित्तीयन के लिये भारी ऋण जाल के द्वारा उन पर दबाव बना रहा है। इसके विपरीत, बिडेन प्रशासन दुनिया के गरीब हिस्सों में कोविड वैक्सीन और सतत विकास सहायता प्रदान करने के लिये मुक्त गठबंधन के अन्य विकसित देशों के साथ सहयोग कर सकते हैं। साथ ही, इन देशों को भी यह स्पष्ट करना चाहिये कि वे असमानताओं से निपटना चाहते हैं और व्यापार व मानवाधिकारों पर वैश्विक नियम को निष्पक्ष रूप से लागू करना चाहते हैं।
  • इसके अलावा, उदार लोकतांत्रिक देशों को उन देशों को आर्थिक और सुरक्षा संरक्षण प्रदान करना चाहिये, जिन पर चीन और रूस दबाव बनाते हैं।स्वतंत्रता को सार्वभौमिक रूप से लागू किया जाना चाहिये। इस प्रकार, यह मानव स्वतंत्रता की अवधारणा को मजबूत करने का एक अच्छा प्रयास है।
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