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क्यों आवश्यक है डिजिटल मीडिया का विनियमन?

  • 26th February, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3 : सूचना प्रौद्योगिकी, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका)

संदर्भ

हाल ही में, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 87(2) के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों का उपयोग करते हुए ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिये दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021’ तैयार किया गया है।

पृष्ठभूमि

  • इन नियमों को ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिये दिशा-निर्देश) नियम 2011’ के स्‍थान पर लाया गया है।
  • इन नियमों का भाग-II इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा संचा‍लित किया जाएगा, जबकि डिजिटल मीडिया के संबंध में आचार संहिता, प्रक्रिया एवं सुरक्षा उपायों से संबंधित भाग-III को सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा संचा‍लित किया जाएगा।

मुख्य विशेषताएँ

सोशल मीडिया से संबंधित दिशा-निर्देश-

  • सोशल मीडिया मध्यवर्ती इकाइयों द्वारा नए नियमों में सुझाई गई जाँच-परख का अनुपालन न किये जाने की स्थिति में ‘सेफ हार्बर’ का प्रावधान उन पर लागू नहीं होगा।
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 मध्यवर्ती इकाइयों को एक ‘सेफ हार्बर’ प्रदान करती है। यदि वे सरकार द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करती हैं तो उपयोगकर्ता-जनित सामग्री की ज़िम्मेदारी से उन्हें छूट प्राप्त होती है।
  • उपयोगकर्ताओं को सशक्त बनाने के लिये सोशल मीडिया मध्यवर्ती इकाइयों सहित मध्यस्थों (जैसे की प्रकाशक) के लिये शिकायतों के समाधान के लिये एक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना अनिवार्य कर दिया गया है। शिकायत प्राप्त होने के 24 घंटों के भीतर स्वीकार करना होगा और इसके 15 दिनों के अंदर इसका समाधान करना होगा।
  • किसी व्यक्ति की निजी बातों को उजागर करने, उसे पूर्ण या आंशिक रूप से निर्वस्त्र व यौन क्रिया में दिखाने वाले कंटेंट की शिकायत मिलने के 24 घंटों के भीतर मध्यस्थों को इसे हटाना होगा अथवा उस तक पहुँच निष्क्रिय करनी होगी।
  • साथ ही, उपयोगकर्ता को मध्यस्थों द्वारा की गई कार्रवाई का विरोध करने के लिये पर्याप्त और उचित अवसर भी दिया जाना चाहिये।
  • सोशल मीडिया मध्यस्थों की दो श्रेणियाँ- नवाचार को प्रोत्साहन देने और छोटे प्लेटफॉर्म्स को नियंत्रित किये बिना नए सोशल मीडिया मध्यस्थों के विकास के लिये ‘सोशल मीडिया मध्यस्थों’ और ‘प्रमुख सोशल मीडिया मध्यस्थों’ के बीच अंतर स्पष्ट किया गया है। यह अंतर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं की संख्या के आधार पर किया गया है।
  • नियमों के तहत, प्रमुख सोशल मीडिया मध्यस्थों को कुछ अतिरिक्त जाँच-पड़ताल करनी होगी। इसके लिये एकमुख्य अनुपालन अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी। साथ ही, कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ 24x7 समन्वयन के लिये एक नोडल संपर्क अधिकारी की नियुक्ति के अतिरिक्त एक रेज़ीडेंट शिकायत अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी। ये सभी भारत के निवासी होने चाहिये।
  • शिकायतों और कार्रवाईयों से संबंधित विवरण के लिये एक मासिक अनुपालन रिपोर्टप्रकाशित करनी होगी। स्वैच्छिक रूप से खातों का सत्यापन कराने के इच्छुक उपयोगकर्ताओं को अपने खातों के सत्यापन के लिये एक उचित तंत्र उपलब्ध कराया जाएगा। 
  • मध्यस्थों द्वारा ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित नहीं की जानी चाहिये जो भारत की संप्रभुता व अखंडता, सार्वजनिक आदेशदूसरे देशों के साथ मित्रवत संबंध आदि की दृष्टि से किसी कानून के तहत निषिद्ध हो।

डिजिटल मीडिया और ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म्स से संबंधित आचार संहिता-

  • डिजिटल मीडिया, ओ.टी.टी. व इंटरनेट पर आने वाले अन्य रचनात्मक कार्यक्रमों की देखरेख सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा की जाएगी। परंतु इस पूरी व्यवस्था का विनियम सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत किया जाएगा, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को नियंत्रित करता है।
  • विषयवस्तु का स्व-वर्गीकरण :ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म्स (जिन्हें ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट प्रकाशक कहा गया है) को आयु आधारित पाँच श्रेणियों- ‘यू (यूनिवर्सल)’‘यू/ए 7+‘यू/ए 13+‘यू/ए 16+’ और ‘ए’ (वयस्क) के आधार पर विषयवस्तु (Content) का वर्गीकरण स्वयं ही करना होगा।
  • साथ ही, ‘यू/ए 13+’ या इससे उच्च श्रेणी के रूप में वर्गीकृत कंटेंट के लिये अभिभावक लॉक की ज़रूरत होगी, जबकि ‘ए’श्रेणी विषयवस्तु के लिये एक विश्वसनीय आयु सत्यापन तंत्र विकसित करना होगा। 
  • डिजिटल मीडिया परसमाचार के प्रशासकों को भारतीय प्रेस परिषद के पत्रकारिता आचरण मानदंड और केबल टीवी नेटवर्क विनियमन अधिनियम के तहत कार्यक्रम संहिता पर नज़र रखनी होगी, जिससे ऑफलाइन (प्रिंटटीवी) और डिजिटल मीडिया को एकसमान वातावरण उपलब्ध कराया जा सके
  • ये नियम एक उदार स्व-नियामकीय तंत्र और एक आचार संहिता के साथ-साथ समाचार प्रकाशकोंओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म्स तथा डिजिटल मीडिया के लिये त्रि-स्तरीय समाधान तंत्र स्थापित करते हैं।
  • ये तंत्र ‘प्रकाशकों द्वारा स्व-विनियमन’, ‘प्रकाशकों की स्व-विनियमित संस्थाओं का स्व-विनियमन’ और ‘निगरानी तंत्र’ हैं।
  • प्रकाशकों की एक या अधिक स्व-विनियामकीय संस्थाएँ हो सकती हैं। ऐसी संस्था की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा एक प्रतिष्ठित व्यक्ति करेगा। इस संस्था का सूचना और प्रसारण मंत्रालय में पंजीकरण कराना होगा। यह उन शिकायतों का समाधान करेगी, जिनका समाधान प्रकाशकों द्वारा 15 दिनों के भीतर नहीं किया गया है।
  • सूचना और प्रसारण मंत्रालय एक निरीक्षण तंत्र विकसित करेगा। यह आचार संहिताओं सहित स्व-विनियमित संस्थाओं के लिये एक चार्टर प्रकाशित करेगा।

विनियमन का कारण

  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और सोशल मीडिया दुरुपयोग के संबंध में संसद में उठाई गई चिंताओं के चलते सरकार ने सोशल मीडिया, डिजिटल न्यूज़ मीडिया और ओवर-द-टॉप (OTT) सामग्री प्रदाताओं को विनियमित करने के लिये ये दिशा-निर्देश जारी किये हैं।
  • उल्लेखनीय है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने भारतीयों को अपनी रचनात्मकता दिखाने, सवाल पूछनेविभिन्‍न सूचनाओं सेअवगत होने और सरकार व उसके अधिकारियों की आलोचना करने सहित विचारों को खुलकर साझा करने में सक्षम बनाया है।
  • सोशल मीडिया का प्रसार जहाँ एक ओर नागरिकों को सशक्त बनाता है तो दूसरी ओर कुछ गंभीर चिंताओं और आशंकाओं को जन्म देता है, जोकि एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाने, अश्लील सामग्री का प्रसार, असहिष्णुता फैलानावित्तीय धोखाधड़ी, हिंसा भड़काना, कॉर्पोरेट प्रतिद्वंद्विता और बदले की भावना के लिये सोशल मीडिया का दुरुपयोग चिंता का विषय बन गया है। इसके लिये तथ्य-जाँच तंत्र बनाना आवश्यक हो गया है।
  • इसके अतिरिक्त, प्रायः यह देखा जाता है कि कोई उपयोगकर्ता, जिसने सोशल मीडिया प्रोफाइल विकसित करने में समय, ऊर्जा और धन का निवेश किया है, उसकी प्रोफ़ाइल को प्लेटफॉर्म द्वारा प्रतिबंधित कर दिया जाता है और उसे सुनवाई का मौका भी नहीं दिया जाता है। ऐसी स्थिति में उपयोगकर्ता के पास कोई विकल्प नहीं बचता है।

 

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