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 48वाँ G-7 शिखर सम्मेलन

(प्रारंभिक परीक्षा- राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 : महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश)

संदर्भ 

हाल ही में, 48वें G-7 शिखर सम्मेलन का आयोजन जर्मनी के बवेरियन आल्प्स के श्लॉस एल्मौ (Schloss Elmau) में किया गया। भारत की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्मेलन में शामिल हुए। इस सम्मेलन के दो सत्रों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण, ऊर्जा, जलवायु, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और लोकतंत्र जैसे विषयों को संबोधित किया। 

भाग लेने वाले देश 

  • जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ ने भारत, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, सेनेगल और दक्षिण अफ्रीका को इस शिखर सम्मेलन में भागीदार देशों के रूप में आमंत्रित किया। साथ ही, इस सम्मेलन में यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने वर्चुअल रूप से हिस्सा लिया।
  • कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, जैसे- संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने भी इस शिखर सम्मेलन में भाग लिया।
  • इस सम्मेलन का आदर्श वाक्य 'एक समान विश्व की ओर प्रगति' (Progress Towards an Equitable World) रखा गया।

48वें G-7 शिखर सम्मेलन के निहितार्थ

  • लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर : G-7 देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने सार्वभौमिक मानवाधिकारों एवं लोकतांत्रिक मूल्यों, नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था तथा लोकतांत्रिक समाजों के लचीलेपन की वकालत की।
  • रूस-यूक्रेन युद्ध : G-7 देशों के प्रमुखों ने रूस की आक्रामकता की निंदा की है। साथ ही, रूस पर सख्त कार्रवाई करने तथा यूक्रेन को 2.6 बिलियन यूरो की मानवीय सहायता एवं बजटीय सहायता में 28 बिलियन यूरो का प्रावधान किया है। अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण योजना के माध्यम से युद्ध के बाद यूक्रेन में पुनर्निर्माण की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की गई है।
  • चीन पर अंतर्राष्ट्रीय दवाब : इस बैठक में ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता कायम रखने पर बल दिया गया। चीन से आपसी विवादों के शांतिपूर्ण समाधान एवं संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुसरण करने का आह्वान किया गया। G-7 देशों ने पूर्वी और दक्षिण चीन सागर की स्थिति एवं चीन में मानवाधिकार  (हांगकांग, झिंजियांग और तिब्बत) को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की।
  • रूस पर कम ऊर्जा निर्भरता में कमी लाना : G-7 देशों ने रूस से ऊर्जा निर्भरता को समाप्त करने पर प्रतिबद्धता व्यक्त की है। साथ ही, ऊर्जा आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिये मूल्य वृद्धि को कम किया।
  • खाद्य सुरक्षा : G-7 देश खाद्य सुरक्षा पर वैश्विक गठबंधन के माध्यम से वैश्विक खाद्य और पोषण सुरक्षा को भी बढ़ावा देंगे।
  • आपूर्ति श्रृंखला में लचीलापन : G-7 देश नागरिकों के जीवनयापन की बढ़ती लागत से निपटने के दौरान आपूर्ति श्रृंखला में लचीलापन लाने के लिये प्रतिबद्ध हैं।
  • जलवायु सहयोग : G-7 देशों ने पेरिस समझौते के कार्यान्वयन में तीव्रता लाने के लिये एक अंतर्राष्ट्रीय जलवायु क्लब के लक्ष्यों का समर्थन किया है। साथ ही, वर्ष 2030 तक सड़क क्षेत्र को कार्बन रहित बनाने तथा वर्ष 2035 तक पूर्णतया या मुख्य रूप से बिजली क्षेत्र को कार्बन रहित बनाने के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त की।
  • लाइफ कैंपेन : भारत के प्रधानमंत्री ने ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर लाइफ (लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट) अभियान पर प्रकाश डाला। इस अभियान का लक्ष्य पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली को प्रोत्साहित करना है।
  • निवेश साझेदारी : G-7 देशों ने विकासशील देशों में बुनियादी ढाँचागत परियोजनाओं के लिये वैश्विक अवसंरचना एवं निवेश भागीदारी (Partnership for Global Infrastructure and Investment : PGII) शुरू की है। इसका लक्ष्य अगले पांच वर्षों में 600 बिलियन अमरीकी डॉलर एकत्रित करना है।

G-7 देशों की पृष्ठभूमि 

  • 1970  के दशक में वैश्विक तेल संकट के दौरान G-7 समूह का गठन किया गया था। इस संकट के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में भयंकर मंदी और मुद्रास्फीति का संकट उत्पन्न हो गया था। 
  • वर्ष 1975 में फ्रांस, इटली, जापान, यू.के., यू.एस. एवं पश्चिम जर्मनी ने आर्थिक संकट पर चर्चा करने के लिये G-6 समूह का गठन किया। इसके पश्चात 1976 में कनाडा इस समूह में शामिल हो गया। G-7 समूह की पहली बैठक प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) में हुई थी।
  • 1980 के दशक में विदेश और सुरक्षा नीति के मुद्दों को शामिलकर G-7 समूह के हितों का विस्तार किया गया।
  • गौरतलब है कि वर्ष 1998 में रूस इस समूह में शामिल हुआ, जिसके पश्चात इस समूह का नाम बदलकर G-8 कर दिया गया। हालाँकि, रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद उसे वर्ष 2014 में इस समूह से बाहर कर दिया गया और पुन: इस समूह का नाम G-7 हो गया।

G-7 देश

  • G-7 शिखर सम्मेलन वार्षिक तौर पर सदस्य देशों द्वारा रोटेशन के आधार पर आयोजित किये जाते हैं। मेजबान देश G-7 की अध्यक्षता एवं उस वर्ष के लिये एजेंडा निर्धारित करता है।
  • G-7 शिखर सम्मेलन G-20 देशों की भूमिका के पूरक के रूप में कार्य करता है, जिसे वैश्विक आर्थिक समन्वय कायम करने हेतु रूपरेखा तैयार करने के रूप में जाना जाता है। 
  • जी-7 समूह विश्व के सात सबसे विकसित देशों का समूह हैं। वर्तमान में जी-7 देशों की वैश्विक आबादी में 10%, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 31% और वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 21% की हिस्सेदारी है। 
  • सभी जी-7 देशों में सार्वजनिक क्षेत्र का वार्षिक व्यय वर्ष 2021 में राजस्व से अधिक रहा था। इसके अतिरिक्त, अधिकांश जी-7 देशों में भी सकल ऋण की स्थिति उच्च है, विशेषकर जापान (जी.डी.पी. का 263%), इटली (जी.डी.पी. का 151%) और अमेरिका (जी.डी.पी. का 133%) में।

वैश्विक चुनौतियाँ 

  • वर्तमान में इस समूह के समक्ष यूक्रेन में रूस की कार्रवाई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
  • साथ ही, चीन ने आर्थिक, वैचारिक और सामरिक स्तर पर G-7 देशों के लिये खतरा प्रस्तुत कर रहा है।
  • बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से विकासशील देशों पर चीन के बढ़ते व्यापक प्रभाव ने G-7 देशों के समक्ष चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं।
  • वर्ष 2021 में G-7 सम्मेलन में बी.आर.आई. का सामना करने के लिये ‘बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड’ की घोषणा की गई थी। हालाँकि, इस वर्ष अप्रत्यक्ष रूप से इसको पुनः वैश्विक अवसंरचना एवं निवेश भागीदारी योजना के रूप में शुरू किया गया है। 

निष्कर्ष 

G-7 के 48वें शिखर सम्मेलन में विशेष रूप से यूक्रेन संकट और यूरोप में रूसी ऊर्जा पर निर्भरता को कम करने की आवश्यकता पर ही ध्यान केंद्रित किया गया। इसके अलावा, रूस-यूक्रेन युद्ध से वैश्विक खाद्य संकट उत्पन्न हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप पहले से ही गेहूं और अन्य फसलों की कमी हो गई है। G-7 के सदस्य देश भी ऊर्जा की बढ़ती कीमतों, बढ़ती मुद्रास्फीति, जलवायु संबंधी चिंताओं और ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं। इस प्रकार, G-7 समूह अभी भी प्रासंगिक है, क्योंकि इसके सभी सदस्य देश लगभग एकसमान मुद्दों का सामना कर रहे हैं। यह सम्मेलन बहुपक्षीय मुद्दों को संबोधित करने एवं वैश्विक चुनौतियों को हल करने हेतु एक मंच है। 

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